वॉशिंगटन: ईरान को लेकर अमेरिका की राजनीति और कूटनीति में बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. अमेरिकी खुफिया एजेंसी की प्रमुख तुलसी गबार्ड की ताज़ा रिपोर्ट ने डोनाल्ड ट्रंप के उस दावे पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसमें उन्होंने ईरान को “तत्काल परमाणु खतरा” बताया था.
खुफिया रिपोर्ट में क्या खुलासा हुआ?
सीनेट इंटेलिजेंस कमिटी को दी गई अपनी लिखित गवाही में तुलसी गबार्ड ने बताया कि साल 2025 में अमेरिका और इजरायल द्वारा चलाए गए ऑपरेशन मिडनाइट हैमर के बाद ईरान की परमाणु संवर्धन क्षमता पूरी तरह तबाह हो गई थी.
रिपोर्ट के मुताबिक, इसके बाद ईरान ने अपने न्यूक्लियर प्रोग्राम को दोबारा शुरू करने की कोई ठोस कोशिश नहीं की. यानी खुफिया आकलन यह संकेत देता है कि ईरान तत्काल परमाणु हथियार बनाने की स्थिति में नहीं था.
ट्रंप के दावों से टकराव
यह निष्कर्ष डोनाल्ड ट्रंप के उस दावे से बिल्कुल उलट है, जिसमें उन्होंने कहा था कि ईरान तेजी से अपना परमाणु कार्यक्रम फिर से खड़ा कर रहा है और कुछ ही हफ्तों में परमाणु हथियार बना सकता है.
इसी आधार पर उन्होंने “तत्काल खतरे” का हवाला देते हुए सैन्य कार्रवाई को सही ठहराया था. अब खुफिया रिपोर्ट सामने आने के बाद उस दावे की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं.
सीनेट में तेज हुई बहस
इस मुद्दे को लेकर अमेरिकी सीनेट में भी तीखी बहस देखने को मिली. डेमोक्रेट नेताओं ने तुलसी गबार्ड से सवाल किया कि उन्होंने अपनी मौखिक गवाही में इस अहम जानकारी का जिक्र क्यों नहीं किया.
इस पर गबार्ड ने सफाई दी कि समय की कमी के कारण वह अपने पूरे लिखित बयान को पढ़ नहीं पाईं, लेकिन लिखित रिपोर्ट ही विस्तृत और आधिकारिक आकलन है.
IAEA का भी बड़ा बयान
इस बीच अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने भी राहत भरी जानकारी दी है. एजेंसी के प्रमुख के अनुसार, ईरान इस समय किसी सक्रिय परमाणु हथियार कार्यक्रम पर काम नहीं कर रहा है.
IAEA का कहना है कि ईरान न तो तत्काल परमाणु बम बनाने की स्थिति में था और न ही उसने हाल के समय में ऐसी कोई तेजी दिखाई है.
20 दिन से जारी जंग, दुनिया पर असर
ईरान को लेकर शुरू हुआ यह संघर्ष अब 20 दिन से ज्यादा समय से जारी है और इसके असर पूरी दुनिया में दिख रहे हैं.
होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हुई है. कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं, जिससे कई देशों में महंगाई बढ़ गई है. भारत समेत कई देशों में ईंधन और जरूरी वस्तुओं की कीमतों पर इसका सीधा असर देखा जा रहा है.
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