ड्रैगन से पंगा ले रहे ट्रंप? चीन के खिलाफ युद्ध के लिए अमेरिका ने इन दो देशों की मदद की मांग; शुरू होगी नई जंग!

अमेरिका ने अपने दो प्रमुख सहयोगियों, ऑस्ट्रेलिया और जापान से एक सवाल पूछा है, जिसका जवाब वैश्विक भू-राजनीतिक स्थिति को पूरी तरह से बदल सकता है. अमेरिका ने यह पूछा है कि अगर ताइवान पर चीन और अमेरिका के बीच युद्ध की स्थिति बनती है.

America ask for help from these two countries to start war know whats the plan
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अमेरिका ने अपने दो प्रमुख सहयोगियों, ऑस्ट्रेलिया और जापान से एक सवाल पूछा है, जिसका जवाब वैश्विक भू-राजनीतिक स्थिति को पूरी तरह से बदल सकता है. अमेरिका ने यह पूछा है कि अगर ताइवान पर चीन और अमेरिका के बीच युद्ध की स्थिति बनती है, तो इन दोनों देशों की भूमिका क्या होगी? यह सवाल अमेरिका के रणनीतिक दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है और यह भी संकेत करता है कि ताइवान संकट पर अमेरिका की गंभीरता अब बढ़ गई है.

ताइवान संकट: अमेरिका का बढ़ता हस्तक्षेप

ताइवान के मुद्दे पर अमेरिका और चीन के बीच लंबे समय से तनाव बना हुआ है. 1979 में ताइवान रिलेशंस एक्ट के तहत, अमेरिका ने ताइवान को सैन्य सहायता देने का वचन दिया था, ताकि वह अपनी सुरक्षा सुनिश्चित कर सके. हालांकि, अमेरिका ने ताइवान को लेकर अपनी नीति में हमेशा "रणनीतिक अस्पष्टता" बनाए रखी है, यानी वह यह स्पष्ट नहीं करता कि चीन द्वारा ताइवान पर हमले की स्थिति में वह सैन्य हस्तक्षेप करेगा या नहीं. इस नीति का उद्देश्य तनाव को नियंत्रित करना और चीन को रोकना था.

लेकिन हाल के वर्षों में, अमेरिका ने ताइवान को हथियारों की बिक्री बढ़ा दी है और क्वाड (QUAD) जैसे गठबंधनों के माध्यम से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने की कोशिश की है. अब, अमेरिका ने ऑस्ट्रेलिया और जापान से खुलकर यह सवाल किया है कि वे ताइवान संघर्ष में क्या भूमिका निभाएंगे. फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका इन देशों से रक्षा खर्च बढ़ाने और संभावित संघर्ष के लिए ठोस रणनीतियों की मांग कर रहा है.

ऑस्ट्रेलिया और जापान का रुख

ऑस्ट्रेलिया और जापान, दोनों ही अमेरिका के करीबी सैन्य सहयोगी हैं, लेकिन दोनों देशों ने ताइवान मुद्दे पर स्पष्ट प्रतिक्रिया देने से बचने की कोशिश की है. इन देशों की सरकारें और जनता युद्ध में फंसने से बचना चाहती हैं. यही कारण है कि ऑस्ट्रेलिया ने "काल्पनिक सवालों" पर कोई जवाब देने से इनकार कर दिया है, और जापान ने भी कहा है कि भविष्य में परिस्थितियों के आधार पर ऐसे सवालों का उत्तर देना कठिन है. इस बीच, ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज चीन दौरे पर हैं, और उन्होंने कहा है कि चीन ऑस्ट्रेलिया का सबसे बड़ा निर्यात साझेदार है, और यह व्यापारिक रिश्ते भविष्य में और मजबूत हो सकते हैं.

ताइवान संकट: क्या युद्ध की संभावना बढ़ी है?

ताइवान का मुद्दा इस समय दुनिया का सबसे बड़ा सैन्य "फ्लैशपॉइंट" माना जाता है, जहां पारंपरिक या परमाणु युद्ध की संभावना सबसे अधिक मानी जाती है. विशेषज्ञों के मुताबिक, भले ही युद्ध की आशंका बढ़ी है, लेकिन फिलहाल इसकी संभावना कम है. अमेरिका और चीन दोनों ही जानते हैं कि ताइवान पर युद्ध का मतलब वैश्विक अर्थव्यवस्था और स्थिरता के लिए विनाशकारी होगा.

चीन के दृष्टिकोण से क्या कहना है?

चीन के थिंक टैंक ने अमेरिका की इस मांग को दबाव की रणनीति और ज़बरदस्ती बताया है. चाइनीज एकेडमी ऑफ सोशल साइंसेज के रिसर्च फेलो लू जियांग का कहना है कि अमेरिका की कोशिश इन देशों को चीन के खिलाफ उकसाने की है, जिससे चीन-जापान और चीन-ऑस्ट्रेलिया संबंधों में और अधिक तनाव पैदा हो सकता है. उनका मानना है कि अमेरिका की इस रणनीति से इन सहयोगियों के साथ रिश्ते कमजोर हो सकते हैं.

ताइवान का विवाद: एक ऐतिहासिक और भू-राजनीतिक संघर्ष

ताइवान विवाद एक लंबा और जटिल भू-राजनीतिक मुद्दा है. 1949 में चीनी गृहयुद्ध के बाद माओ की कम्युनिस्ट पार्टी ने चीन पर कब्जा किया, और पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (PRC) की स्थापना की. इस गृह युद्ध में हारने वाली नेशनलिस्ट सरकार ताइवान भाग गई और वहां रिपब्लिक ऑफ चाइना (ROC) की स्थापना की. तब से ही ताइवान और चीन के बीच अधिकार की लड़ाई चल रही है. चीन ताइवान को अपने क्षेत्र का हिस्सा मानता है और "वन चाइना" नीति के तहत इसे फिर से अपने नियंत्रण में लेने की धमकी देता है. वहीं, ताइवान खुद को एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक देश मानता है, हालांकि उसने औपचारिक स्वतंत्रता की घोषणा नहीं की है. वर्तमान में अधिकांश देश चीन के "वन चाइना" नीति को स्वीकार करते हैं, लेकिन ताइवान के साथ अनौपचारिक रिश्ते बनाए रखते हैं. हाल के वर्षों में ताइवान के स्वतंत्रता-समर्थक नेताओं और चीन की आक्रामक सैन्य गतिविधियों ने इस मुद्दे को और भी संवेदनशील बना दिया है.

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