इस्लामाबाद में अचानक कूटनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं, जहां ईरान और अमेरिका के बीच रुकी हुई बातचीत को फिर से शुरू करने की कोशिशें चल रही हैं. ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची पाकिस्तान पहुंच चुके हैं, जहां उनका स्वागत सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने किया. इस दौरे का मुख्य उद्देश्य अमेरिका के साथ ठप पड़ी वार्ता को दोबारा पटरी पर लाना है.
हालांकि इस बार की कोशिशों में एक बड़ा बदलाव साफ नजर आ रहा है, अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस इस प्रक्रिया का हिस्सा नहीं हैं. पिछले दौर की तुलना में यह बदलाव संकेत देता है कि इस बार अमेरिका अपनी रणनीति में कुछ अलग तरीका अपना रहा है.
पिछली बातचीत से क्या बदला?
पहले दौर की वार्ता के दौरान अमेरिका ने जेडी वेंस को आगे कर यह संदेश देने की कोशिश की थी कि वह इस समझौते को लेकर बेहद गंभीर है. लेकिन बातचीत किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच सकी और यह पहल सफल नहीं रही.
इसी अनुभव को देखते हुए इस बार अमेरिका ने शीर्ष स्तर के प्रतिनिधित्व को थोड़ा पीछे रखते हुए कूटनीतिक टीम में बदलाव किया है.
इस बार अमेरिका की ओर से कौन?
इस बार डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और ट्रंप के करीबी सहयोगी जारेड कुश्नर को पाकिस्तान भेजने का फैसला किया है.
व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट के अनुसार, हालिया संकेतों से यह पता चलता है कि ईरान बातचीत के लिए तैयार है और आमने-सामने चर्चा चाहता है. ऐसे में इन दूतों का मकसद सीधे संवाद के जरिए गतिरोध को तोड़ना है.
ईरान के अंदरूनी समीकरण भी वजह
सूत्रों के मुताबिक, इस बार ईरान के भीतर भी राजनीतिक मतभेद उभरकर सामने आए हैं. खासतौर पर संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर कालिबाफ इस दौर में शामिल नहीं हुए, जो इस बात का संकेत है कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व में एकराय नहीं है.
बताया जा रहा है कि पिछली वार्ता के बाद अंदरूनी असहमति बढ़ गई थी, जिससे बातचीत की दिशा प्रभावित हुई.
पाकिस्तान क्यों बना अहम मंच?
पाकिस्तान इस पूरी प्रक्रिया में एक मध्यस्थ की भूमिका निभाता नजर आ रहा है. दोनों देशों के बीच सीधे संवाद की कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन इस्लामाबाद को बातचीत के लिए एक सुरक्षित और सुविधाजनक मंच माना जा रहा है.
क्या संकेत देता है वेंस का बाहर रहना?
जेडी वेंस को इस बार बातचीत से दूर रखना कई संकेत देता है—
हालिया घटनाक्रम से यह साफ है कि अमेरिका और ईरान दोनों ही कूटनीतिक रास्ता खुला रखना चाहते हैं. हालांकि बातचीत कितनी आगे बढ़ेगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों पक्ष अपने मतभेदों को कितना कम कर पाते हैं.
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