Anti Defection Law: AAP में बगावत के बाद चर्चा में आया दल-बदल कानून, क्या है दो-तिहाई फॉर्मूले का गणित?

राजनीतिक हलचल के बीच आम आदमी पार्टी (AAP) में सामने आई अंदरूनी खींचतान ने एक बार फिर दल-बदल विरोधी कानून को सुर्खियों में ला दिया है.

Anti Defection Law Dal Badal Kanoon after the rebellion in AAP Raghav Chadha
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Anti Defection Law: राजनीतिक हलचल के बीच आम आदमी पार्टी (AAP) में सामने आई अंदरूनी खींचतान ने एक बार फिर दल-बदल विरोधी कानून को सुर्खियों में ला दिया है. यह कानून भारतीय लोकतंत्र में सरकारों की स्थिरता बनाए रखने और चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा बार-बार पाला बदलने पर रोक लगाने के उद्देश्य से बनाया गया था.

दरअसल, 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए इस प्रावधान को संविधान की 10वीं अनुसूची में शामिल किया गया था. इसका मूल मकसद यही था कि कोई सांसद या विधायक जिस पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतकर आता है, वह बाद में निजी या राजनीतिक फायदे के लिए पार्टी न बदले.

क्या कहता है दल-बदल कानून?

इस कानून के तहत यदि कोई जनप्रतिनिधि स्वेच्छा से अपनी पार्टी छोड़ देता है या सदन में पार्टी व्हिप के खिलाफ मतदान करता है, तो उसकी सदस्यता खत्म की जा सकती है. यानी पार्टी लाइन से हटकर कदम उठाने पर सीधे तौर पर अयोग्यता का खतरा होता है.

‘दो-तिहाई फॉर्मूले’ का क्या मतलब है?

साल 2003 में इस कानून में अहम बदलाव किया गया. संशोधन के बाद यह प्रावधान जोड़ा गया कि अगर किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सांसद या विधायक एक साथ दूसरी पार्टी में विलय का फैसला लेते हैं, तो इसे दल-बदल नहीं माना जाएगा.

यही कारण है कि कई बार बड़े स्तर पर टूट होने के बावजूद सदस्य अयोग्यता से बच जाते हैं, क्योंकि वे ‘दो-तिहाई’ संख्या पूरी कर लेते हैं.

स्पीकर की भूमिका क्यों अहम?

ऐसे मामलों में सबसे अहम भूमिका सदन के स्पीकर या चेयरपर्सन की होती है. वही यह तय करते हैं कि संबंधित सदस्य ने कानून का उल्लंघन किया है या नहीं. हालांकि उनका फैसला अंतिम नहीं होता, क्योंकि इसे अदालत में चुनौती दी जा सकती है. यही वजह है कि कई बार यह प्रक्रिया लंबी कानूनी लड़ाई में बदल जाती है.

चुनाव आयोग कब करता है दखल?

अगर विवाद सिर्फ किसी सदस्य के दल बदलने का नहीं बल्कि पार्टी के अंदर टूट और ‘असली पार्टी’ के दावे का हो, तब चुनाव आयोग की भूमिका सामने आती है. आयोग यह देखता है कि किस गुट के पास संगठनात्मक समर्थन, निर्वाचित प्रतिनिधियों की संख्या और पार्टी संविधान के आधार पर मजबूत दावा है. चुनाव चिह्न से जुड़ा फैसला भी इसी स्तर पर होता है.

इस्तीफा बनाम अयोग्यता

दल-बदल और इस्तीफे के बीच भी बड़ा फर्क है. अगर कोई सदस्य स्वेच्छा से इस्तीफा देता है और वह स्वीकार हो जाता है, तो स्थिति अलग होती है. लेकिन अगर उसे दल-बदल कानून के तहत अयोग्य घोषित किया जाता है, तो वह तुरंत मंत्री नहीं बन सकता और उसे दोबारा चुनाव जीतकर आना पड़ता है. साथ ही, वह फ्लोर टेस्ट जैसी अहम प्रक्रियाओं में हिस्सा भी नहीं ले सकता.

सुप्रीम कोर्ट ने भी जताई चिंता

इस कानून को लेकर न्यायपालिका भी समय-समय पर सवाल उठाती रही है. 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया था कि अयोग्यता से जुड़े मामलों का फैसला स्पीकर के बजाय किसी स्वतंत्र ट्रिब्यूनल को सौंपने पर विचार होना चाहिए. कोर्ट का मानना था कि रिटायर्ड जजों वाला एक स्थायी तंत्र ज्यादा निष्पक्ष हो सकता है.

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