नई दिल्ली: आम आदमी पार्टी (AAP) के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने पार्टी से नाता तोड़ने का ऐलान करते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि वह और उनके साथ दो तिहाई सांसद अब भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हो रहे हैं. इस घोषणा के बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या राघव चड्ढा और उनके साथी सांसदों की राज्यसभा सदस्यता प्रभावित होगी या नहीं. दरअसल, इस सवाल का जवाब भारतीय दल-बदल कानून में छिपा है, जो ऐसे मामलों में मार्गदर्शन करता है.
दल-बदल कानून और राज्यसभा सदस्यता
भारतीय संविधान में दल-बदल कानून का प्रावधान सांसदों और विधायकों के लिए किया गया है, ताकि उन्हें पार्टी के खिलाफ जाने से रोका जा सके. आमतौर पर, अगर कोई सांसद अपनी पार्टी छोड़ता है, तो उसे अयोग्य ठहराया जा सकता है, और उसकी सदस्यता समाप्त हो सकती है. लेकिन राघव चड्ढा के मामले में यह नियम लागू नहीं होता. दल-बदल कानून यह भी कहता है कि यदि पार्टी के दो तिहाई सदस्य पार्टी छोड़ते हैं तो उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता.
कब नहीं लागू होता है दल-बदल कानून?
इस कानून में एक महत्वपूर्ण प्रावधान है जिसके तहत अगर एक पार्टी के दो तिहाई सदस्य पार्टी छोड़ते हैं, तो उन पर दल-बदल कानून नहीं लागू होता. यही कारण है कि राघव चड्ढा और उनके साथ दो तिहाई सांसदों का बीजेपी में विलय करने पर उनकी सदस्यता पर कोई खतरा नहीं है. इसके अलावा, अगर कोई पार्टी अपनी पहचान बदलकर दूसरी पार्टी में विलय कर लेती है, तो भी दल-बदल कानून नहीं लागू होता है.
कानूनी संरक्षण और दल-बदल की प्रक्रिया
राघव चड्ढा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्पष्ट रूप से कहा कि उनके साथ पार्टी के दो तिहाई सांसद हैं. इसका मतलब है कि उनकी राज्यसभा सदस्यता पर कोई असर नहीं पड़ेगा. अगर एक पार्टी का एक बड़ा हिस्सा किसी अन्य पार्टी में विलय करता है, तो यह दल-बदल कानून से बचाव का तरीका बन जाता है. यह कानूनी रूप से सही है, और ऐसे मामलों में संसद के स्पीकर अंतिम निर्णय लेते हैं.
#WATCH | Delhi: Addressing a press conference with Sandeep Pathak and Ashok Mittal, AAP MP Raghav Chadha says, "We have decided that we, the 2/3rd members belonging to the AAP in Rajya Sabha, exercise the provisions of the Constitution of India and merge ourselves with the BJP." pic.twitter.com/K3IK4TPXml
— ANI (@ANI) April 24, 2026
स्पीकर का अंतिम निर्णय
अगर कोई पार्टी अपने सदस्यों के दल-बदल पर विवाद करती है या पार्टी का विलय होता है, तो स्पीकर इस पर अंतिम निर्णय लेते हैं. राघव चड्ढा का यह कदम भी राजनीतिक लिहाज से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसे स्पीकर के पास अंतिम फैसला देने का अधिकार होता है.
ये भी पढ़ें: AAP सांसदों के पार्टी छोड़ने पर आई अन्ना हजारे की प्रतिक्रिया, कहा - 'पार्टी सही चलती तो...'