ट्वीट से भी बड़ा फर्क पड़ता है... जयशंकर ने ट्रंप को दिया करारा संदेश, बोले- भारत ऐसी नीति नहीं मानेगा

भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA 80) के दौरान आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में वैश्विक नीतियों और आर्थिक अनिश्चितताओं को लेकर गहरी चिंता जताई.

Jaishankar gave a strong message to Trump on tariff
प्रतिकात्मक तस्वीर/ ANI

नई दिल्ली/न्यूयॉर्क: भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA 80) के दौरान आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में वैश्विक नीतियों और आर्थिक अनिश्चितताओं को लेकर गहरी चिंता जताई. उन्होंने अपने भाषण में भले ही अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का नाम न लिया हो, लेकिन उनके बयान स्पष्ट रूप से ट्रंप की एकतरफा और आक्रामक नीतियों की ओर इशारा कर रहे थे, जिन्होंने वैश्विक व्यापार तंत्र में अस्थिरता और अविश्वास को जन्म दिया.

डॉ. जयशंकर ने कहा कि आज की दुनिया में अब एक "महीना, हफ्ता या यहां तक कि एक ट्वीट भी बड़ा फर्क डाल सकता है." इस टिप्पणी को विश्लेषकों ने सीधा ट्रंप की उस राजनीतिक शैली से जोड़ा है, जहां उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान ट्वीट्स के माध्यम से नीतिगत फैसले लिए थे, जिनका असर न केवल अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर, बल्कि वैश्विक बाजारों और कूटनीतिक संतुलन पर भी पड़ा.

जयशंकर ने बाजार अस्थिरता को बताया चुनौती

विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि आज का वैश्विक परिदृश्य बेहद अस्थिर, अनिश्चित और जोखिमों से भरा हुआ है. उन्होंने कहा कि, "दुनिया अधिक से अधिक अनिश्चितता, अस्थिरता और अप्रत्याशित घटनाओं की ओर बढ़ रही है. वैश्विक आर्थिक आपूर्ति श्रृंखलाएं पहले से कहीं अधिक जोखिमपूर्ण हो गई हैं. ऐसे में यह सभी देशों की जिम्मेदारी बनती है कि वे मिलकर इस जोखिम को कम करें."

उन्होंने यह भी कहा कि अगर अंतरराष्ट्रीय व्यापार को राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया, तो इससे वैश्विक व्यापार तंत्र में असंतुलन पैदा होगा और सबसे अधिक नुकसान उन देशों को होगा जो अभी विकास की राह पर हैं.

अमेरिका की ‘प्रोटेक्शनिस्ट नीतियों’ पर सवाल

हालांकि डॉ. जयशंकर ने किसी देश का नाम नहीं लिया, लेकिन उन्होंने “गैर-बाजारी तरीकों” और “राजनीतिक रूप से नियंत्रित व्यापार” का विरोध करते हुए उन देशों की नीतियों पर सवाल उठाए जो वैश्विक व्यापार के नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं.

जयशंकर ने कहा, "व्यापारिक व्यवहार अगर कुछ ही बड़े बाजारों पर निर्भर हो जाएं, तो वह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को असंतुलित कर देते हैं. यह न केवल व्यापार के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है, बल्कि इससे छोटे और विकासशील देश गंभीर आर्थिक संकट में आ सकते हैं."

विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयान स्पष्ट रूप से अमेरिकी प्रशासन की ट्रेड वार्स, टैरिफ नीतियों और चीन के साथ आर्थिक तनावों पर आधारित है, जिसमें भारत को भी अप्रत्यक्ष रूप से निशाना बनाया गया था.

भारत का ‘De-Risking’ मॉडल

डॉ. जयशंकर ने भारत की भूमिका को एक संतुलनकारी शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया और कहा कि भारत न केवल अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत कर रहा है, बल्कि वैश्विक स्तर पर जोखिमों को कम करने (De-risking) के लिए नीति-निर्माण में सक्रिय भूमिका निभा रहा है.

उन्होंने कहा, "हम नीतिगत बदलावों के माध्यम से बाजार जोखिमों को कम कर रहे हैं. भारत न केवल उत्पादन केंद्रों को विविध और लचीला बना रहा है, बल्कि एक ऐसे वैश्विक तंत्र की दिशा में काम कर रहा है, जो भरोसेमंद, पारदर्शी और निष्पक्ष हो."

उन्होंने आगे कहा कि De-risking केवल एक रणनीति नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक दृष्टिकोण है, जहां निर्माण और आपूर्ति स्रोतों की विविधता को बढ़ाया जा रहा है ताकि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं किसी एक बाजार पर अत्यधिक निर्भर न रहें.

बदलते टैरिफ की अनिश्चितता पर भी जताई चिंता

जयशंकर ने यह भी कहा कि अब वैश्विक व्यापार में टैरिफ में निरंतर बदलाव हो रहे हैं, जिससे बाजारों तक पहुंच सुनिश्चित करना कठिन होता जा रहा है. ऐसे में "De-risking" की रणनीति और भी आवश्यक हो जाती है. उन्होंने यह स्पष्ट किया कि भारत किसी भी एक देश या बाजार पर निर्भर नहीं रहेगा और "अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखेगा."

जयशंकर ने कहा, "हमारी नीति साफ है- भारत हमेशा अपने निर्णयों में स्वतंत्र रहेगा और किसी भी प्रकार के एकतरफा दबाव को स्वीकार नहीं करेगा."

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