सिंधु जल समझौते की सुनवाई में शामिल नहीं होगा भारत, कहा- 'हम इस अवैध कोर्ट के आदेशों को नहीं मानते'

भारत ने सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty – IWT) से जुड़े विवाद में गठित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (CoA) की कार्यवाही में शामिल होने से इनकार कर दिया है.

India will not attend the hearing of Indus water agreement
प्रतिकात्मक तस्वीर/ AI

Indus Water Treaty: भारत ने सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty – IWT) से जुड़े विवाद में गठित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (CoA) की कार्यवाही में शामिल होने से इनकार कर दिया है. भारत सरकार का कहना है कि वह इस अदालत को कानूनी रूप से वैध नहीं मानती और इसलिए इसके किसी भी आदेश या प्रक्रिया को स्वीकार नहीं करेगी. सरकार के मुताबिक, जब सिंधु जल संधि को ही भारत ने स्थगित कर रखा है, तब उसके तहत बनी किसी संस्था के सामने जवाब देने की बाध्यता भी नहीं बनती.

सरकारी सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि भारत का रुख साफ है- संधि के प्रावधानों पर अस्थायी रोक लगाने के बाद उससे जुड़े मंचों पर कार्यवाही में भाग लेना देश के रुख के विपरीत होगा. इसी वजह से भारत ने नीदरलैंड्स के हेग स्थित पीस पैलेस में प्रस्तावित सुनवाई में भाग न लेने का फैसला किया है, जो 2 और 3 फरवरी को निर्धारित की गई है.

बगलिहार और किशनगंगा प्रोजेक्ट्स पर मांगे गए दस्तावेज

कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने सुनवाई के दौरान भारत से जम्मू-कश्मीर स्थित बगलिहार और किशनगंगा हाइड्रो पावर परियोजनाओं से संबंधित ‘पोंडेज लॉगबुक’ और ऑपरेशनल रिकॉर्ड प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था. यह दस्तावेज जलाशयों में पानी के भंडारण और उसके उपयोग से जुड़े तकनीकी विवरण से संबंधित हैं. भारत ने इन कागजातों को सौंपने से इनकार कर दिया है और कहा है कि वह अदालत के आदेशों को मान्यता नहीं देता.

कोर्ट की ओर से यह भी कहा गया है कि अगर जरूरी दस्तावेज पेश नहीं किए जाते हैं, तो यह माना जा सकता है कि जानबूझकर जानकारी छिपाई जा रही है. ऐसी स्थिति में अदालत अपने स्तर पर उपलब्ध तथ्यों के आधार पर निर्णय ले सकती है. हालांकि, भारत का कहना है कि अदालत के पास इस मामले में अधिकार क्षेत्र ही नहीं है, इसलिए ऐसे किसी भी निष्कर्ष को वह स्वीकार नहीं करेगा.

भारत की गैरमौजूदगी में पाकिस्तान रखेगा पक्ष

कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने 24 जनवरी 2026 को जारी आदेश में स्पष्ट किया था कि अगर भारत सुनवाई में उपस्थित नहीं होता है, तो पाकिस्तान को अकेले ही अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाएगा. इसके बाद 29 जनवरी को अदालत ने भारत से दोनों जलविद्युत परियोजनाओं के संचालन से जुड़े रिकॉर्ड उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे. कोर्ट का यह भी कहना है कि भारत द्वारा संधि को स्थगित करने के फैसले से अदालत के अधिकार क्षेत्र पर कोई असर नहीं पड़ता.

भारत सरकार इस दावे से सहमत नहीं है. उसका तर्क है कि मौजूदा विवाद प्रकृति में तकनीकी है और इसे संधि के तहत तय प्रक्रिया के अनुसार ‘न्यूट्रल एक्सपर्ट’ (निष्पक्ष विशेषज्ञ) के माध्यम से सुलझाया जाना चाहिए, न कि किसी अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत के जरिए.

न्यूट्रल एक्सपर्ट की भूमिका क्या होती है?

सिंधु जल संधि में यह प्रावधान किया गया है कि जब दोनों देशों के बीच बांध या जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े तकनीकी मुद्दों पर मतभेद हों, तो उन्हें निष्पक्ष तकनीकी विशेषज्ञ के पास भेजा जाए. यह विशेषज्ञ कोई अदालत नहीं होता, बल्कि एक स्वतंत्र और तटस्थ व्यक्ति होता है, जो तकनीकी तथ्यों के आधार पर राय देता है.

न्यूट्रल एक्सपर्ट आम तौर पर इन सवालों पर निर्णय देता है:

  • बांध या परियोजना की ऊंचाई तय मानकों के अनुसार है या नहीं
  • जलाशय में पानी जमा करने की क्षमता संधि के दायरे में है या नहीं
  • बांध के गेट और डिजाइन तकनीकी नियमों के अनुरूप हैं या नहीं
  • पानी के बहाव और उसके प्रबंधन से जुड़े तकनीकी आंकड़ों की सही गणना

भारत का कहना है कि बगलिहार और किशनगंगा परियोजनाओं से जुड़े विवाद भी इसी श्रेणी में आते हैं और इन्हें न्यूट्रल एक्सपर्ट के जरिए सुलझाया जाना चाहिए.

भारत ने क्यों स्थगित की सिंधु जल संधि?

भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर हुए थे. यह समझौता दोनों देशों के बीच सिंधु नदी प्रणाली की नदियों के पानी के बंटवारे से जुड़ा है. अप्रैल में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने इस संधि को स्थगित करने का फैसला किया था. सरकार का कहना है कि सुरक्षा हालात और सीमा पार आतंकवाद के मद्देनज़र यह कदम उठाया गया.

सिंधु नदी प्रणाली में कुल छह नदियां शामिल हैं- सिंधु, झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलुज. इन नदियों का बेसिन करीब 11.2 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है. इसमें लगभग 47 प्रतिशत हिस्सा पाकिस्तान में, 39 प्रतिशत भारत में, 8 प्रतिशत चीन में और 6 प्रतिशत अफगानिस्तान में आता है. इन क्षेत्रों में लगभग 30 करोड़ लोग रहते हैं, जिनकी आजीविका प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इन नदियों पर निर्भर है.

पानी के बंटवारे का पुराना विवाद

1947 में भारत-पाकिस्तान के विभाजन के बाद से ही दोनों देशों के बीच नदियों के पानी को लेकर विवाद शुरू हो गया था. उस समय भारत के पंजाब और पाकिस्तान के सिंध प्रांत के बीच जल वितरण को लेकर तनाव बना रहता था. लंबे अंतरराष्ट्रीय प्रयासों और मध्यस्थता के बाद 19 सितंबर 1960 को कराची में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर किए. इसके तहत दोनों देशों के लिए नदियों के उपयोग से जुड़े नियम तय किए गए.

पाकिस्तान पर संभावित असर

भारत द्वारा संधि को स्थगित करने और जल परियोजनाओं को लेकर सख्त रुख अपनाने से पाकिस्तान पर व्यापक प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है. पाकिस्तान की करीब 90 प्रतिशत खेती योग्य जमीन सिंधु नदी प्रणाली से मिलने वाले पानी पर निर्भर है. लगभग 4.7 करोड़ एकड़ कृषि भूमि की सिंचाई इसी जल प्रणाली के जरिए होती है. पाकिस्तान की राष्ट्रीय आय में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी करीब 23 प्रतिशत मानी जाती है और देश के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले करीब 68 प्रतिशत लोगों की आजीविका खेती से जुड़ी हुई है.

इसके अलावा, जलविद्युत परियोजनाओं पर निर्भर पाकिस्तान की बिजली उत्पादन क्षमता पर भी असर पड़ सकता है. कुछ आकलनों के अनुसार, पानी की उपलब्धता में कमी होने पर देश के वार्षिक बिजली उत्पादन में 30 से 50 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है. इसका सीधा असर उद्योग, कृषि और आम जनता की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ने की आशंका है.

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