तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है. इसी बीच होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ईरान की ओर से बड़ा बयान सामने आया है. ईरान ने संकेत दिया है कि वह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के मौजूदा कार्यकाल के खत्म होने तक किसी बड़े समझौते के लिए तैयार नहीं है. ट्रंप का कार्यकाल 20 जनवरी 2029 को खत्म होना है.
ईरानी पक्ष की ओर से कहा गया है कि तेहरान अमेरिका के दबाव में आकर कोई समझौता नहीं करेगा. इस बयान के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर स्थिति और गंभीर हो गई है. यह समुद्री रास्ता दुनिया की तेल आपूर्ति के लिए बेहद अहम माना जाता है.
2029 तक इंतजार की बात क्यों?
ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाकेर गालिबाफ के करीबी सलाहकार माजिद शाकेरी ने सोशल मीडिया पर ईरान की रणनीति को लेकर बयान दिया है. उन्होंने कहा कि ट्रंप के साथ किसी समझौते की उम्मीद नहीं है और ईरान उनके कार्यकाल के खत्म होने तक इंतजार कर सकता है.
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि ईरान फिलहाल सीधे युद्ध या जल्दबाजी में किसी समझौते के पक्ष में नहीं है. इसके बजाय वह अमेरिका के साथ तनाव को लंबे समय तक बनाए रखते हुए अपनी रणनीति पर आगे बढ़ना चाहता है.
शाकेरी के मुताबिक, ईरान की मौजूदा नीति का मकसद अनिश्चितता बनाए रखना और जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं लेना है. उनका कहना है कि अमेरिका के साथ बातचीत को लेकर सार्वजनिक तौर पर कोई बड़ा संकेत देना ईरान के हित में नहीं होगा.
ईरान की तीन बड़ी मांगें
ईरान ने अमेरिका के सामने अपनी कुछ पुरानी मांगों को फिर से रखा है. तेहरान का कहना है कि इन मुद्दों पर समाधान के बिना दोनों देशों के बीच तनाव कम करना मुश्किल होगा.
पहली मांग आर्थिक नुकसान के मुआवजे से जुड़ी है. ईरान अमेरिका से करीब 300 अरब डॉलर के मुआवजे की मांग कर रहा है. उसका दावा है कि अमेरिकी प्रतिबंधों और सैन्य कार्रवाई से उसकी अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हुआ है.
दूसरी मांग विदेशों में जमा ईरान की संपत्तियों को लेकर है. ईरान चाहता है कि अमेरिका और उसके सहयोगियों द्वारा रोकी या फ्रीज की गई उसकी संपत्तियों को वापस किया जाए.
तीसरी मांग पश्चिम एशिया से अमेरिकी सेना की वापसी की है. ईरान चाहता है कि अमेरिका मध्य पूर्व के देशों और समुद्री क्षेत्रों से अपनी सैन्य मौजूदगी कम करे और पूरी तरह बाहर निकल जाए.
होर्मुज दुनिया के लिए क्यों जरूरी है?
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में से एक है. दुनिया के कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर दूसरे देशों तक पहुंचता है.
सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और कतर जैसे बड़े तेल और गैस उत्पादक देश इस समुद्री मार्ग का इस्तेमाल करते हैं. यहां किसी भी तरह की रुकावट का असर सिर्फ पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है.
अगर लंबे समय तक होर्मुज से तेल और गैस की आवाजाही प्रभावित होती है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ सकती है. इसका असर पेट्रोल, डीजल और गैस की कीमतों पर भी पड़ सकता है. इससे कई देशों में महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो सकता है.
ईरान की ‘न युद्ध, न शांति’ वाली रणनीति
ईरान के ताजा रुख को उसकी लंबी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. तेहरान न तो सीधे बड़े युद्ध में जाना चाहता है और न ही अमेरिकी दबाव में आकर समझौता करने के लिए तैयार दिख रहा है.
ईरान फिलहाल तनाव के बीच रणनीतिक धैर्य बनाए रखना चाहता है. उसकी कोशिश अमेरिका पर दबाव बनाए रखने और अपनी स्थिति मजबूत करने की है.
अगर ईरान इसी रुख पर आगे बढ़ता है तो अमेरिका के लिए आने वाले समय में चुनौती बढ़ सकती है. खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर किसी भी तरह का लंबा गतिरोध वैश्विक तेल बाजार और दुनिया की अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर डाल सकता है.
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