नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार और असम राज्य को उन याचिकाओं पर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया, जो अगस्त 2019 में प्रकाशित नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटिज़न्स (NRC) लिस्ट में शामिल लोगों को NRC पहचान पत्र जारी करने से संबंधित हैं. ये याचिकाएं क्रमशः जमीयत उलेमा-ए-हिंद, ऑल असम माइनॉरिटी स्टूडेंट्स यूनियन (AAMSU) और असम अल्पसंख्यक संग्राम परिषद द्वारा दायर की गई हैं.
याचिकाकर्ताओं ने जवाब दाखिल करने की अनुमति मांगी
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच के सामने जमीयत की ओर से सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने कहा कि नोटिस जारी किया जा चुका है, लेकिन केंद्र और राज्य ने अभी तक जवाब दाखिल नहीं किया है. सिब्बल ने यह भी अनुरोध किया कि उन्हें रजिस्ट्रार जनरल ऑफ़ इंडिया द्वारा दाखिल जवाब पर अपना जवाब दाखिल करने की अनुमति दी जाए.
सीनियर एडवोकेट मनीष गोस्वामी ने पूर्व NRC कोऑर्डिनेटर हितेश देव शर्मा द्वारा दायर याचिका के संबंध में एक अंतरिम अर्जी का ज़िक्र किया. उन्होंने कहा कि इसमें की गई मांगें मौजूदा याचिकाओं में की गई मांगों के बिल्कुल विपरीत हैं और अनुरोध किया कि इस मामले को अन्य दो याचिकाओं के साथ जोड़ दिया जाए.
पूर्व NRC कोऑर्डिनेटर की याचिका भी साथ जोड़ने का निर्देश
शर्मा की याचिका में NRC लिस्ट के दोबारा सर्टिफिकेशन या वेरिफिकेशन की मांग की गई है, क्योंकि इसमें कई गलतियां हैं. केंद्र और असम सरकार से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी को संक्षेप में सुनने के बाद कोर्ट ने निर्देश दिया कि शर्मा की याचिका को जोड़ा जा सकता है और जवाब दाखिल होने के बाद उस पर सुनवाई की जा सकती है. याचिकाकर्ताओं ने मुख्य रूप से यह मांग की है कि 2019 में NRC लिस्ट प्रकाशित होने के बावजूद अधिकारी कानून के तहत ज़रूरी कदम उठाने में विफल रहे हैं.
3.11 करोड़ नागरिकों के पहचान पत्र जारी करने की मांग
यह कदम है नागरिकता (नागरिकों का पंजीकरण और राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी करना) नियम, 2003 के नियम 13 के तहत योग्य पाए गए 3.11 करोड़ नागरिकों को राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी करना. और NRC से बाहर किए गए 19ई लाख लोगों के लिए उक्त नियमों के नियम 4A की अनुसूची के पैरा 8 के तहत रिजेक्शन स्लिप जारी करने और अपील की प्रक्रिया शुरू करने का काम नहीं किया गया. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इन कदमों को न उठाने से अंतिम NRC एक अधूरी प्रक्रिया बन गई है — जो असंवैधानिक, मनमानी और संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करने वाली है.
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