'भारत ट्रंप के दबाव में नहीं आएगा और जरूरत पड़ी तो...' अजीत डोभाल ने रूबियो को मीटिंग में सुनाया!

भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से चल रही व्यापारिक तनातनी अब धीरे-धीरे सुलझती हुई नजर आ रही है.

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India-US Trade Deal: भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से चल रही व्यापारिक तनातनी अब धीरे-धीरे सुलझती हुई नजर आ रही है. दोनों देशों के बीच ट्रेड डील पर सहमति बन चुकी है और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय उत्पादों पर लगाए गए भारी टैरिफ में बड़ी कटौती का ऐलान किया है. हालांकि, अभी तक इस समझौते पर कोई औपचारिक दस्तावेज़ सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन कूटनीतिक हलकों में इसे भारत के लिए एक बड़ी रणनीतिक जीत के तौर पर देखा जा रहा है.

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जो डोनाल्ड ट्रंप भारत पर ऊंचे टैरिफ लगाने और रूस से तेल खरीद को लेकर लगातार दबाव बना रहे थे, वे अचानक भारत के साथ समझौते के लिए कैसे राजी हो गए? इसके पीछे भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल और अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो के बीच हुई एक अहम और गोपनीय बैठक को निर्णायक मोड़ माना जा रहा है.

वॉशिंगटन में हुई थी अहम बैकडोर डिप्लोमेसी

सूत्रों के अनुसार, सितंबर की शुरुआत में अजीत डोभाल वॉशिंगटन के दौरे पर गए थे. यह दौरा ऐसे वक्त हुआ जब भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव बढ़ चुका था. इससे पहले अगस्त में अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर 50 फीसदी तक टैरिफ लगा दिया था. इसके अलावा रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर भी भारत पर 25 फीसदी का अतिरिक्त दंडात्मक शुल्क लगाया गया था. सार्वजनिक मंचों पर ट्रंप प्रशासन की ओर से भारत की व्यापार नीतियों की तीखी आलोचना की जा रही थी.

इसी पृष्ठभूमि में डोभाल और रूबियो की मुलाकात को रिश्तों में जमी बर्फ तोड़ने की एक कोशिश के तौर पर देखा गया. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस बैठक में अजीत डोभाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संदेश लेकर पहुंचे थे. संदेश साफ था- भारत किसी भी देश, चाहे वह अमेरिका ही क्यों न हो, के दबाव में अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करेगा.

“भारत ट्रंप के प्रेशर में नहीं आएगा”

बैठक में डोभाल ने अमेरिकी पक्ष को यह स्पष्ट रूप से बताया कि भारत डोनाल्ड ट्रंप या उनके वरिष्ठ सहयोगियों के दबाव में फैसले नहीं करेगा. भारत इससे पहले भी अलग-अलग अमेरिकी प्रशासनों के साथ मुश्किल दौर में काम करता रहा है और जरूरत पड़ी तो मौजूदा अमेरिकी प्रशासन के कार्यकाल खत्म होने तक इंतजार करने को भी तैयार है.

साथ ही, यह संकेत भी दिया गया कि नई दिल्ली पुराने मतभेदों को पीछे छोड़ते हुए व्यापार वार्ता को दोबारा पटरी पर लाने के लिए इच्छुक है. भारत अमेरिका को एक दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदार मानता है और रिश्तों को स्थायी नुकसान नहीं पहुंचने देना चाहता.

रिश्तों में क्यों आई थी कड़वाहट?

दरअसल, इस साल की शुरुआत से ही दोनों देशों के रिश्तों में तल्खी बढ़ने लगी थी. मई में डोनाल्ड ट्रंप ने भारत और पाकिस्तान के बीच हुए चार दिन के सैन्य टकराव को सुलझाने का श्रेय खुद ले लिया था. इस दावे को भारतीय सेना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खारिज कर दिया था. इसके बाद अमेरिका द्वारा पाकिस्तानी नेतृत्व को व्हाइट हाउस में आमंत्रित किए जाने को भी भारत में नकारात्मक रूप से देखा गया.

इतना ही नहीं, ट्रंप ने जब पीएम मोदी को व्हाइट हाउस आने का न्योता दिया, तो भारत की ओर से उस आमंत्रण को ठुकरा दिया गया. इन घटनाओं से दोनों देशों के बीच राजनयिक दूरी और बढ़ गई थी.

डोभाल के संदेश का दिखा असर

डोभाल की इस कूटनीतिक पहल का असर कुछ ही दिनों में दिखने लगा. 16 सितंबर को डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनके जन्मदिन पर फोन कर “शानदार काम” के लिए उनकी तारीफ की. इसके बाद साल के अंत तक दोनों नेताओं के बीच कई बार बातचीत हुई. धीरे-धीरे व्यापार समझौते को लेकर भी सकारात्मक माहौल बनने लगा.

कूटनीतिक सूत्रों का कहना है कि वॉशिंगटन में दिए गए संदेश ने अमेरिकी प्रशासन को यह समझा दिया कि भारत को दबाव की राजनीति से नहीं, बल्कि बराबरी के साझेदार के तौर पर बातचीत करके ही साथ लाया जा सकता है.

टैरिफ में बड़ी कटौती, रूस से तेल पर पेनल्टी खत्म

हालिया घोषणा में डोनाल्ड ट्रंप ने बताया कि पीएम मोदी के साथ व्यापार समझौते के तहत भारतीय उत्पादों पर अमेरिकी टैरिफ घटाकर 18 फीसदी कर दिया गया है. इसके साथ ही रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत पर लगाया गया 25 फीसदी का अतिरिक्त शुल्क भी हटा लिया गया है. यह कदम भारत के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, क्योंकि ऊंचे टैरिफ से भारतीय निर्यातकों को भारी नुकसान हो रहा था.

अमेरिका का दावा, भारत ने अभी पत्ते नहीं खोले

अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह भी दावा किया कि भारत ने 500 अरब डॉलर के अमेरिकी उत्पाद खरीदने, वेनेजुएला से तेल आयात करने और अमेरिकी सामानों पर अपने टैरिफ को शून्य तक लाने पर सहमति जताई है. हालांकि, अभी तक इन दावों पर दोनों देशों के बीच कोई औपचारिक समझौता सार्वजनिक नहीं हुआ है. भारत की ओर से भी रूस से तेल खरीद को लेकर अपना अंतिम रुख स्पष्ट नहीं किया गया है.

चीन फैक्टर और 2047 का विजन

सूत्रों के मुताबिक, डोभाल ने बैठक में यह भी बताया कि भारत के दीर्घकालिक रणनीतिक लक्ष्य अमेरिका के साथ मजबूत साझेदारी से जुड़े हैं. चीन की बढ़ती ताकत का मुकाबला करने और 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के प्रधानमंत्री मोदी के लक्ष्य को हासिल करने के लिए अमेरिकी पूंजी, तकनीक और सैन्य सहयोग अहम भूमिका निभा सकता है.

भारतीय अधिकारियों का मानना है कि किसी एक अमेरिकी राष्ट्रपति का कार्यकाल अस्थायी होता है, लेकिन भारत-अमेरिका संबंधों का महत्व दीर्घकालिक है. इसलिए तात्कालिक राजनीतिक दबावों के बजाय दीर्घकालिक हितों को प्राथमिकता देना जरूरी है.

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