पाकिस्तान इन दिनों सिर्फ आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता या अंतरराष्ट्रीय दबाव से ही नहीं जूझ रहा है, बल्कि उसके भीतर गहराती दरारें देश की एकता पर ही सवाल खड़े कर रही हैं. भले ही प्रशासनिक रूप से पाकिस्तान चार प्रमुख प्रांतों- पंजाब, सिंध, ख़ैबर पख़्तूनख़्वा (KPK) और बलूचिस्तान में बंटा हुआ है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि इन सभी क्षेत्रों में लंबे समय से असंतोष, नाराज़गी और विद्रोह की भावनाएं पनप रही हैं. 2026 की शुरुआत में हालात और ज्यादा तनावपूर्ण नजर आए हैं. अलग-अलग प्रांतों में अलग कारणों से केंद्र सरकार के खिलाफ आवाज़ तेज हो रही है और कुछ जगहों पर अलगाव की मांग खुलकर सामने आने लगी है.
बलूचिस्तान: दशकों पुराना संघर्ष अब निर्णायक मोड़ पर
बलूचिस्तान में हालात सबसे अधिक विस्फोटक माने जा रहे हैं. यह इलाका प्राकृतिक संसाधनों, गैस भंडार, खनिज और ग्वादर जैसे रणनीतिक बंदरगाह के कारण पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम है. बावजूद इसके, स्थानीय आबादी लंबे समय से यह आरोप लगाती रही है कि संसाधनों से मिलने वाला लाभ उन्हें नहीं मिलता, जबकि बदले में उन्हें बेरोजगारी, पिछड़ापन और सैन्य कार्रवाइयों का सामना करना पड़ता है.
स्थानीय संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का दावा है कि पिछले कई वर्षों में हजारों लोग “लापता” हुए हैं. परिवारों का कहना है कि सुरक्षा एजेंसियों द्वारा उठाए गए कई लोग आज तक वापस नहीं लौटे. इसी नाराज़गी और पीड़ा ने बलूच युवाओं को सशस्त्र संघर्ष की ओर धकेला है.
2026 की शुरुआत में बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) द्वारा चलाए गए अभियानों ने हालात की गंभीरता को और उजागर किया. जनवरी के आखिरी और फरवरी के शुरुआती दिनों में कई शहरों और कस्बों में समन्वित हमलों की खबरें सामने आईं, जिनमें सुरक्षा प्रतिष्ठानों, पुलिस चौकियों और सरकारी ढांचे को निशाना बनाया गया. इन घटनाओं में सुरक्षा बलों और आम नागरिकों के हताहत होने की सूचनाएं भी आईं.
स्थानीय विद्रोही समूह इसे “आज़ादी की अंतिम लड़ाई” की तरह पेश कर रहे हैं. वहीं, पाकिस्तान सरकार इन हमलों के पीछे बाहरी साजिशों का आरोप लगाती रही है. लेकिन ज़मीनी स्तर पर यह साफ है कि असंतोष की जड़ें स्थानीय लोगों की लंबे समय से चली आ रही शिकायतों में हैं. कई विश्लेषकों का मानना है कि अगर यही हालात बने रहे तो बलूचिस्तान पाकिस्तान से अलगाव की दिशा में सबसे पहले आगे बढ़ सकता है.
सिंध: पहचान, संसाधन और अधिकारों की लड़ाई
सिंध प्रांत में विद्रोह की प्रकृति बलूचिस्तान से अलग है, लेकिन असंतोष कम गंभीर नहीं है. यहां के कई सामाजिक और राजनीतिक समूह मानते हैं कि सिंधी समुदाय अपने ही प्रांत में धीरे-धीरे हाशिए पर जा रहा है. कराची जैसे बड़े शहरों में बाहरी आबादी के बढ़ते दबाव और औद्योगिक-व्यापारिक नियंत्रण के कारण स्थानीय लोगों में अपनी पहचान खोने का डर बढ़ा है.
इसके अलावा, सिंध के लोगों में यह भावना भी मजबूत है कि सिंधु नदी के जल बंटवारे में उन्हें उचित हिस्सा नहीं मिल रहा और अधिकांश पानी पंजाब की ओर मोड़ दिया जाता है. इससे कृषि और आजीविका पर सीधा असर पड़ता है.
इन्हीं मुद्दों के बीच “सिंधुदेश” की मांग को लेकर अलगाववादी विचारधारा ने एक संगठित रूप लेना शुरू कर दिया है. विभिन्न संगठन और समूह सांस्कृतिक अधिकारों, राजनीतिक स्वायत्तता और “लापता लोगों” के मुद्दे को लेकर प्रदर्शन करते रहे हैं. जनवरी 2026 में भी सांस्कृतिक और राजनीतिक कार्यक्रमों के दौरान कई जगहों पर स्वतंत्रता समर्थक नारे सुनाई दिए. फिलहाल यह आंदोलन प्रतीकात्मक विरोध और सीमित गतिविधियों तक सीमित है, लेकिन हालात बिगड़ने पर सिंध में अलगाव की मांग और तेज हो सकती है.
ख़ैबर पख़्तूनख़्वा: पश्तून अस्मिता और सुरक्षा संकट
ख़ैबर पख़्तूनख़्वा (KPK) में असंतोष का आधार पश्तून पहचान, मानवाधिकारों से जुड़े सवाल और सुरक्षा कार्रवाइयों से उपजी नाराज़गी है. पश्तून तहफ्फुज मूवमेंट (PTM) लंबे समय से जबरन गुमशुदगियों, सैन्य चेकपोस्टों और कथित अत्याचारों के खिलाफ आवाज़ उठाता रहा है. हालांकि सरकार की ओर से इस पर प्रतिबंध और दबाव भी लगाए गए हैं, लेकिन आंदोलन से जुड़ी गतिविधियां देश और विदेश में अलग-अलग रूपों में सामने आती रही हैं.
दूसरी ओर, क्षेत्र में हिंसक गतिविधियों में सक्रिय उग्रवादी संगठनों की मौजूदगी भी हालात को और जटिल बनाती है. सीमावर्ती इलाकों में सुरक्षा बलों और उग्रवादियों के बीच झड़पें होती रहती हैं. इस माहौल में स्थानीय आबादी खुद को दो पाटों के बीच फंसा हुआ महसूस करती है- एक तरफ सैन्य कार्रवाइयों का दबाव और दूसरी तरफ हिंसक समूहों की धमकी.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर पश्तून क्षेत्रों में असंतोष को शांतिपूर्ण ढंग से संबोधित नहीं किया गया, तो यहां भी स्वायत्तता या अलग पहचान की मांग और तेज हो सकती है.
पंजाब भी अलगाव की आहटों से अछूता नहीं
पंजाब को पाकिस्तान का राजनीतिक और सैन्य केंद्र माना जाता है. सेना, प्रशासन और अर्थव्यवस्था में इस प्रांत का प्रभाव सबसे अधिक है. इसी वजह से अन्य प्रांतों में यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि संसाधनों और सत्ता का बड़ा हिस्सा पंजाब के हाथ में केंद्रित है.
फिलहाल पंजाब में कोई बड़ा अलगाववादी आंदोलन नहीं दिखता, लेकिन अगर बाकी तीन प्रांतों में अस्थिरता और अलगाव की प्रक्रिया तेज होती है, तो पंजाब भी राजनीतिक दबाव और आंतरिक असंतोष से प्रभावित हो सकता है. कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे हालात में पंजाब के भीतर भी क्षेत्रीय असंतोष और नई मांगें उभर सकती हैं.
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