नई दिल्ली: भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंधों में खटास बढ़ती जा रही है. अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों खासकर स्टील और एल्युमिनियम पर भारी-भरकम टैरिफ लगाए जाने के बाद भारत ने अब पलटवार की ठोस योजना बना ली है. हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों के तहत भारत कुछ अमेरिकी उत्पादों पर 50% तक आयात शुल्क (टैरिफ) लगाने पर गंभीरता से विचार कर रहा है. अगर ऐसा होता है, तो यह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति के खिलाफ भारत की पहली बड़ी औपचारिक प्रतिक्रिया होगी.
वर्ष 2024 की शुरुआत से ही अमेरिका ने भारतीय स्टील और एल्युमिनियम पर 25% का टैरिफ लगाया था, जिसे जून में बढ़ाकर 50% कर दिया गया. इसके अतिरिक्त, अगस्त में रूस से कच्चा तेल आयात करने को लेकर भी भारत पर अतिरिक्त 25% टैरिफ लगा दिया गया. इन निर्णयों का कुल असर करीब 7.6 बिलियन डॉलर यानी ₹66,500 करोड़ के भारतीय निर्यात पर पड़ा है.
इन टैरिफ्स को अमेरिका "नेशनल सिक्योरिटी" के नाम पर उचित ठहराता रहा है, लेकिन भारत का मानना है कि यह WTO के नियमों के उलट सीधे-सीधे सेफगार्ड ड्यूटी की श्रेणी में आते हैं. भारत ने इस मुद्दे पर WTO में अपनी शिकायत दर्ज कर दी है और अब कानूनी और कूटनीतिक दोनों स्तरों पर जवाब की तैयारी कर रहा है.
भारत का जवाबी कदम: अमेरिकी उत्पाद निशाने पर
हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत सरकार अब उन अमेरिकी प्रोडक्ट्स की पहचान कर रही है जिन पर जवाबी टैरिफ लगाया जा सकता है. ये टैरिफ भी अमेरिका द्वारा लगाए गए शुल्क के अनुपात में होंगे और इसकी ऊपरी सीमा 50% तक हो सकती है.
एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि भारत अमेरिका के इस एकतरफा रवैये से निराश है. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जब बातचीत के रास्ते बंद हो जाते हैं, तो देश की आर्थिक और व्यापारिक सुरक्षा के लिए ठोस जवाब देना जरूरी हो जाता है.
भारत फिलहाल उन अमेरिकी उत्पादों की सूची तैयार कर रहा है जिनका भारत में आयात बड़े पैमाने पर होता है. इसमें कृषि उत्पाद, वाइन, इलेक्ट्रॉनिक आइटम्स, और कुछ हाई-एंड कंज़्यूमर गुड्स शामिल हो सकते हैं.
व्यापारिक घाटा और बढ़ता तनाव
अमेरिका भारत को हर साल लगभग 45 बिलियन डॉलर से अधिक का निर्यात करता है, जबकि भारत अमेरिका को करीब 86 बिलियन डॉलर का एक्सपोर्ट करता रहा है. यदि भारत जवाबी टैरिफ लागू करता है, तो इससे दोनों देशों के बीच व्यापार संतुलन और अधिक प्रभावित हो सकता है.
गौरतलब है कि साल 2025 की शुरुआत में जब ट्रंप और मोदी ने मुलाकात की थी, तब दोनों नेताओं ने बाइलैटरल ट्रेड को 500 बिलियन डॉलर तक ले जाने की बात कही थी. लेकिन अमेरिका की यह मांग कि भारत अपने कृषि और संवेदनशील क्षेत्रों में रियायत दे, भारत के लिए स्वीकार्य नहीं थी. इसी असहमति के चलते ट्रेड डील की बातचीत भी ठप पड़ गई.
ट्रंप का सख्त रुख: बातचीत की संभावना खत्म
हाल ही में व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया कि जब तक भारत व्यापारिक मोर्चे पर अमेरिका की चिंताओं को स्वीकार नहीं करता, तब तक ट्रेड डील पर कोई बात नहीं होगी. उनके बयान से यह संकेत साफ है कि अमेरिका भारत पर दबाव बनाने की नीति पर कायम है.
भारत, जो अब तक संयम के साथ व्यापारिक तनाव को सुलझाने की कोशिश करता रहा है, अब खुद को बचाव नहीं बल्कि जवाबी कार्रवाई की मुद्रा में ला रहा है.
व्यापार सिर्फ मेटल्स तक सीमित नहीं
हालांकि विवाद की शुरुआत स्टील और एल्युमिनियम से हुई थी, लेकिन दोनों देशों का व्यापार इससे कहीं ज्यादा व्यापक है. अमेरिका ने वर्ष 2024-25 में भारत को 13.6 बिलियन डॉलर की ऊर्जा सामग्री निर्यात की. इसके अतिरिक्त इलेक्ट्रॉनिक्स, कैमिकल्स, और विभिन्न उद्योगों से जुड़े अन्य सामान का भी भारत में बड़ा बाज़ार है.
सर्विस सेक्टर भी इस रिश्ते का महत्वपूर्ण हिस्सा है. 2024 में दोनों देशों के बीच बाइलैटरल सर्विस ट्रेड 83.4 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया. इसमें अमेरिका ने 102 मिलियन डॉलर का ट्रेड सरप्लस दर्ज किया. अमेरिका से भारत को सर्विसेज एक्सपोर्ट में 16% की वृद्धि दर्ज की गई, जो 41.8 बिलियन डॉलर तक पहुंच गई, जबकि भारत का भी सर्विस एक्सपोर्ट लगभग समान रहा 41.6 बिलियन डॉलर.
आगे क्या हो सकता है?
अगर भारत 50% तक का टैरिफ लगाता है, तो यह न केवल एक बड़ा आर्थिक संदेश होगा, बल्कि वैश्विक व्यापार के नियमों में शक्ति संतुलन के नए संकेत भी देगा. भारत यह संदेश देना चाहता है कि वह किसी भी देश की दबाव की नीति के आगे नहीं झुकेगा, चाहे वह अमेरिका ही क्यों न हो.
WTO की भूमिका, G20 की साझेदारी, और मल्टी-लैटरल डिप्लोमेसी के जरिए भारत इस मामले को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने की तैयारी कर रहा है. आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अमेरिका इस बढ़ते टकराव को सुलझाने के लिए कोई कदम उठाता है, या फिर यह तनाव किसी और बड़ी व्यापारिक जंग की ओर बढ़ता है.
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