नई दिल्ली: पिछले कुछ वर्षों में भारत ने वैश्विक मंच पर अपने रुख में एक स्पष्ट और ठोस परिवर्तन दिखाया है. आर्थिक, सामरिक और रणनीतिक मोर्चों पर अब भारत केवल प्रतिक्रिया नहीं देता, बल्कि सक्रिय रूप से अपने हितों की रक्षा करता हुआ दिखाई देता है. यही बात अब भारत और अमेरिका के संबंधों में भी देखने को मिल रही है.
जहां पहले भारत को अक्सर ‘सॉफ्ट डिप्लोमेसी’ की नीति पर चलते हुए देखा जाता था, वहीं अब सरकार का रुख कहीं अधिक स्पष्ट, आत्मविश्वासपूर्ण और आक्रामक हुआ है खासकर तब जब बात देश के आर्थिक स्वाभिमान, किसानों के अधिकार और रणनीतिक स्वतंत्रता की हो.
हालिया घटनाक्रम और भारतीय नेताओं की टिप्पणियों से यह स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि भारत अब किसी भी वैश्विक ताकत की ‘दादागिरी’ स्वीकार करने को तैयार नहीं है चाहे वह अमेरिका जैसा महाशक्ति देश ही क्यों न हो.
पीएम मोदी: किसानों के हित से समझौता नहीं होगा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में एक जनसभा में अपने स्पष्ट रुख को दोहराते हुए कहा कि भारत अपने किसानों, पशुपालकों और मछुआरों के हितों से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेगा.
उनका यह बयान ऐसे समय पर आया जब अमेरिका की ओर से भारत पर व्यापार से जुड़ी कई शर्तें लगाई जा रही थीं. इनमें रूस से तेल खरीद बंद करने का दबाव, कृषि सब्सिडी पर आपत्ति, और अमेरिकी वस्तुओं के लिए भारत में बाजार खोलने जैसी शर्तें शामिल थीं.
प्रधानमंत्री का यह स्पष्ट कहना कि "मैं जानता हूं कि इसकी कितनी बड़ी कीमत चुकानी होगी, लेकिन मैं इसके लिए तैयार हूं", न केवल भारत की रणनीतिक दृढ़ता को दर्शाता है, बल्कि यह संकेत भी देता है कि अब भारत के राष्ट्रीय हित किसी बाहरी दबाव में नहीं झुकेंगे.
राजनाथ सिंह: कुछ लोग खुद को बॉस समझते हैं
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी अमेरिका का नाम लिए बिना उसी विषय पर अपनी बात रखी. उन्होंने कहा कि कुछ ताकतें खुद को दुनिया का ‘बॉस’ समझती हैं और भारत का तेज़ विकास उन्हें स्वीकार नहीं हो रहा.
उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ वैश्विक शक्तियां यह चाहती हैं कि भारत में बनी वस्तुएं इतनी महंगी हो जाएं कि वे अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में प्रतिस्पर्धा न कर सकें. यह, उनके अनुसार, भारत को कमजोर करने की एक रणनीति का हिस्सा है.
लेकिन उन्होंने आत्मविश्वास के साथ यह भी कहा कि "अब दुनिया की कोई भी ताकत भारत को एक बड़ी शक्ति बनने से नहीं रोक सकती." यह एक स्पष्ट संदेश है कि भारत अब वैश्विक पावर समीकरणों में एक निर्णायक भूमिका चाहता है.
ताकत और तकनीक नहीं, नीति और नीयत भी जरूरी
केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने भी इस विषय पर अपनी राय रखते हुए कहा कि वैश्विक ‘दादागिरी’ अक्सर उन देशों द्वारा की जाती है जो आर्थिक रूप से संपन्न और तकनीकी रूप से सक्षम हैं. लेकिन उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारत की संस्कृति "वसुधैव कुटुम्बकम" की है, हम शक्ति का उपयोग वर्चस्व के लिए नहीं, बल्कि कल्याण के लिए करते हैं.
गडकरी ने नागपुर में विश्वेश्वरैया नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (VNIT) के एक कार्यक्रम में कहा कि अगर भारत को ‘विश्वगुरु’ बनना है, तो आत्मनिर्भरता की दिशा में गंभीर प्रयास करने होंगे.
उन्होंने यह भी जोड़ा, "सबसे बड़ी राष्ट्रभक्ति यह हो सकती है कि हम आयात को कम करें और निर्यात को बढ़ाएं. हमें किसी के आगे झुकने की जरूरत नहीं है, दुनिया झुकती है, बस झुकाने वाला होना चाहिए."
उनका यह संदेश स्पष्ट है: तकनीक, विज्ञान और ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था के निर्माण से भारत वैश्विक मंच पर एक स्वतंत्र और आत्मनिर्भर राष्ट्र के रूप में उभरेगा.
अमेरिका से रिश्ते: सहयोग या नियंत्रण?
पिछले कुछ वर्षों में भारत और अमेरिका के संबंध कई आयामों से गुज़रे हैं. रक्षा सौदे, रणनीतिक साझेदारी, इंटेलिजेंस सहयोग और संयुक्त सैन्य अभ्यासों के बावजूद अमेरिका ने कई बार भारत पर प्रत्यक्ष या परोक्ष दबाव बनाने की कोशिश की है.
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