देशभर में साइबर ठगों का जाल! रोज 1700 शिकायतें, 5 साल में 32 लाख सिम से फ्रॉड, जानें बचाव के तरीके

भारत में डिजिटल लेनदेन जितनी तेजी से बढ़ा है, साइबर अपराधियों के हौसले भी उसी रफ्तार से बुलंद हुए हैं. एक फर्जी कॉल, किसी अनजान लिंक पर क्लिक या निवेश के नाम पर किया गया झूठा वादा लोगों की वर्षों की मेहनत की कमाई कुछ ही मिनटों में गायब कर देता है.

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भारत में डिजिटल लेनदेन जितनी तेजी से बढ़ा है, साइबर अपराधियों के हौसले भी उसी रफ्तार से बुलंद हुए हैं. एक फर्जी कॉल, किसी अनजान लिंक पर क्लिक या निवेश के नाम पर किया गया झूठा वादा लोगों की वर्षों की मेहनत की कमाई कुछ ही मिनटों में गायब कर देता है. हालांकि अब ऐसे मामलों में पीड़ितों के लिए राहत की उम्मीद पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हुई है. केंद्र सरकार ने संसद में बताया है कि यदि साइबर ठगी की शिकायत समय रहते दर्ज कराई जाए तो रकम को आगे ट्रांसफर होने से रोका जा सकता है और उसे वापस दिलाने की प्रक्रिया भी तेज की जा रही है. सरकार के अनुसार, नई तकनीक, डिजिटल प्लेटफॉर्म और 1930 हेल्पलाइन की मदद से अब तक हजारों करोड़ रुपये लोगों के खातों से निकलने से बचाए जा चुके हैं.

समय पर शिकायत बनी सबसे बड़ा हथियार

लोकसभा में गृह मंत्रालय ने जानकारी दी कि साइबर अपराधों से निपटने के लिए स्थापित इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) लगातार राज्यों के साथ मिलकर काम कर रहा है. मंत्रालय के अनुसार, 1930 हेल्पलाइन और अन्य डिजिटल सिस्टम की मदद से अब तक 32.80 लाख शिकायतों में 11,158 करोड़ रुपये से अधिक की रकम साइबर ठगों तक पहुंचने से बचाई गई है. सरकार का कहना है कि कानून-व्यवस्था और अपराध की जांच राज्यों का विषय है, लेकिन केंद्र सरकार आधुनिक तकनीक, डिजिटल नेटवर्क और प्रशिक्षण के जरिए राज्यों को हर संभव सहायता उपलब्ध करा रही है.

I4C बना साइबर अपराध के खिलाफ सबसे बड़ा डिजिटल नेटवर्क

साइबर ठगी को रोकने के लिए I4C को एक साझा प्लेटफॉर्म के रूप में विकसित किया गया है, जहां बैंक, टेलीकॉम कंपनियां, पेमेंट सेवा प्रदाता और जांच एजेंसियां एक साथ मिलकर काम करती हैं. इसका उद्देश्य केवल शिकायत दर्ज करना नहीं, बल्कि संदिग्ध लेनदेन को तुरंत रोकना, अपराधियों की पहचान करना और उनके खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित करना भी है. गृह मंत्रालय के मुताबिक, इस व्यवस्था के जरिए लाखों फर्जी सिम कार्ड, मोबाइल डिवाइस और बैंक खातों की पहचान कर उन पर कार्रवाई की जा चुकी है.

संसद में सरकार ने साझा किए बड़े आंकड़े

सरकार ने संसद में बताया कि साइबर अपराध के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के तहत अब तक 15.75 लाख से अधिक सिम कार्ड और 5.77 लाख IMEI नंबर ब्लॉक किए जा चुके हैं. इसके अलावा 30.48 लाख संदिग्ध डिजिटल पहचान और 32.08 लाख म्यूल बैंक खातों की पहचान कर संबंधित एजेंसियों के साथ साझा किया गया. इस कार्रवाई के चलते लगभग 25,698 करोड़ रुपये के संदिग्ध वित्तीय लेनदेन रोके गए. वहीं इन प्रयासों के परिणामस्वरूप 29,837 से अधिक आरोपियों की गिरफ्तारी में भी सहायता मिली है.

1930 हेल्पलाइन कैसे बचाती है आपकी रकम

गृह मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2021 में सिटीजन फाइनेंशियल साइबर फ्रॉड रिपोर्टिंग एंड मैनेजमेंट सिस्टम (CFCFRMS) की शुरुआत की गई थी. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जैसे ही किसी व्यक्ति के साथ ऑनलाइन ठगी हो, वह बिना देरी किए 1930 हेल्पलाइन या राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत दर्ज करा सके. शिकायत मिलते ही संबंधित बैंक, पेमेंट कंपनियां और अन्य एजेंसियां मिलकर उस रकम को आगे ट्रांसफर होने से रोकने की कोशिश करती हैं. यही वजह है कि समय पर दर्ज की गई शिकायतें कई मामलों में लोगों की रकम बचाने में सफल रही हैं.

फर्जी सिम और म्यूल खातों पर सरकार की सख्ती

साइबर अपराधी अक्सर नकली दस्तावेजों से लिए गए सिम कार्ड और दूसरे लोगों के बैंक खातों का इस्तेमाल करते हैं. इस चुनौती से निपटने के लिए सरकार ने सस्पेक्ट रजिस्ट्री तैयार की है, जिसके माध्यम से संदिग्ध खातों और पहचान की जानकारी विभिन्न एजेंसियों के बीच साझा की जाती है. इससे साइबर अपराधियों के नेटवर्क को तेजी से चिन्हित करने और उनके आर्थिक लेनदेन पर रोक लगाने में मदद मिल रही है.

ठगी की रकम लौटाने की प्रक्रिया हुई आसान

साइबर ठगी के मामलों में सबसे बड़ी चिंता पीड़ित की रकम वापस मिलने को लेकर होती है. इसे ध्यान में रखते हुए गृह मंत्रालय ने शिकायतों के निपटारे के लिए एक नया स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) लागू किया है. इस प्रक्रिया में शिकायत दर्ज होने से लेकर बैंक के साथ समन्वय, खातों पर लगी रोक हटाने और सही व्यक्ति को रकम लौटाने तक के सभी चरण तय किए गए हैं. अप्रैल 2026 से शुरू किए गए मनी रेस्टोरेशन मॉड्यूल का उद्देश्य यही है कि पीड़ितों को उनका पैसा पहले की तुलना में अधिक तेजी से वापस मिल सके. साथ ही ग्रिवेंस रिड्रेसल मॉड्यूल बैंक खाते फ्रीज होने या अन्य बैंकिंग शिकायतों का भी त्वरित समाधान उपलब्ध करा रहा है.

पुलिस और जांच एजेंसियों को मिल रही आधुनिक ट्रेनिंग

सरकार केवल तकनीकी सिस्टम विकसित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि साइबर अपराध की जांच को मजबूत बनाने के लिए पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को भी लगातार प्रशिक्षित कर रही है. CyTrain पोर्टल के माध्यम से 1.63 लाख से अधिक अधिकारियों का पंजीकरण किया जा चुका है और 1.61 लाख से अधिक प्रमाणपत्र जारी किए गए हैं. वहीं साइबर कमांडो कार्यक्रम के तहत सैकड़ों विशेषज्ञ तैयार किए जा चुके हैं, जो जटिल साइबर अपराधों की जांच में राज्यों की पुलिस की मदद कर रहे हैं.

Pratibimb और Samanvaya प्लेटफॉर्म से तेज हुई जांच

गृह मंत्रालय ने बताया कि प्रतिबिम्ब (Pratibimb) और समन्वय (Samanvaya) जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म राज्यों की पुलिस को विभिन्न राज्यों में सक्रिय साइबर अपराधियों तक पहुंचने और उनके नेटवर्क का पता लगाने में मदद कर रहे हैं. इन प्लेटफॉर्म की सहायता से हजारों मामलों में जांच को गति मिली है और 29 हजार से अधिक गिरफ्तारियां संभव हो सकी हैं.

डिजिटल फॉरेंसिक जांच को मिला नया आधार

साइबर अपराधों की वैज्ञानिक जांच के लिए I4C के तहत नेशनल-डिजिटल इन्वेस्टिगेशन सपोर्ट सेंटर की स्थापना नई दिल्ली और असम में की गई है. यह केंद्र राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की पुलिस को डिजिटल फॉरेंसिक विश्लेषण और तकनीकी सहायता प्रदान करता है. 30 जून 2026 तक नई दिल्ली स्थित केंद्र 14 हजार से अधिक साइबर अपराध मामलों की जांच में विभिन्न कानून प्रवर्तन एजेंसियों की मदद कर चुका है. इससे जांच की गुणवत्ता और गति दोनों में सुधार देखने को मिला है.

जागरूकता अभियान पर भी सरकार का विशेष फोकस

सरकार का मानना है कि साइबर अपराध से लड़ाई केवल तकनीक या कानून के सहारे नहीं जीती जा सकती, बल्कि लोगों को जागरूक बनाना भी उतना ही जरूरी है. इसी उद्देश्य से 1930 हेल्पलाइन, CyberDost सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, SMS अलर्ट, टीवी और रेडियो अभियान, स्कूलों में जागरूकता कार्यक्रम, सिनेमा हॉल, IPL, MyGov, मेट्रो स्टेशन, रेलवे स्टेशन और एयरपोर्ट जैसे कई माध्यमों से लोगों को लगातार साइबर सुरक्षा के प्रति जागरूक किया जा रहा है.

समय पर शिकायत ही सबसे बड़ी सुरक्षा

सरकार के ताजा आंकड़े यह संकेत देते हैं कि यदि साइबर ठगी का शिकार होने के तुरंत बाद शिकायत दर्ज करा दी जाए तो रकम बचने की संभावना काफी बढ़ जाती है. नई तकनीकी व्यवस्था, बैंकों के बीच बेहतर समन्वय और डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम की वजह से अब साइबर अपराधियों के लिए ठगी की रकम को तुरंत गायब करना पहले जितना आसान नहीं रह गया है. ऐसे में किसी भी ऑनलाइन धोखाधड़ी की स्थिति में बिना देर किए 1930 हेल्पलाइन या राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराना सबसे महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.

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