ईरान, तेल और अमेरिका-चीन संबंध... कितना अहम है डोनाल्ड ट्रंप का बीजिंग दौरा, क्या हैं मायने?

डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा अब सिर्फ व्यापार, टैरिफ, AI और ताइवान जैसे मुद्दों तक सीमित नहीं रह गई है. ईरान युद्ध ने इस यात्रा को एक बड़े वैश्विक रणनीतिक मोड़ में बदल दिया है.

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लेखक- मोहम्मद आरिफ खान, मध्य पूर्व मामलों के विशेषज्ञ

डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा अब सिर्फ व्यापार, टैरिफ, AI और ताइवान जैसे मुद्दों तक सीमित नहीं रह गई है. ईरान युद्ध ने इस यात्रा को एक बड़े वैश्विक रणनीतिक मोड़ में बदल दिया है. अब अमेरिका चीन का इस्तेमाल करना चाहता है, क्योंकि चीन ही ऐसा देश है जिसके पास ईरान पर सबसे ज्यादा आर्थिक दबाव बनाने की क्षमता है.

ईरान पर दबाव बनाने में अमेरिका की चुनौती

पिछले कई महीनों से अमेरिका ने ईरान को घेरने के लिए सैन्य दबाव, आर्थिक प्रतिबंध, खाड़ी देशों के साथ गठबंधन और इजरायल की ताकत का इस्तेमाल किया. लेकिन परमाणु ठिकानों पर हमले, समुद्री नाकेबंदी और लेबनान तक बढ़ते तनाव के बावजूद ईरान न तो झुका और न ही पीछे हटा. अब यह संघर्ष एक खतरनाक स्थिति में पहुंच गया है, जिसका सबसे बड़ा केंद्र स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बन गया है. यहां थोड़ी सी भी रुकावट दुनिया के तेल बाजार को हिला रही है और वैश्विक महंगाई का डर बढ़ा रही है.

क्या है ट्रंप का उद्देश्य?

अब ट्रंप बीजिंग पहुंचे हैं और उनका साफ उद्देश्य है कि चीन ईरान पर दबाव बनाए. यह दुनिया की राजनीति में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है. कई दशकों तक अमेरिका चीन को अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी मानता रहा. लेकिन आज वही अमेरिका चीन से उम्मीद कर रहा है कि वह पश्चिम एशिया में स्थिरता लाने में मदद करे. अमेरिका को अब यह समझ आ गया है कि न सऊदी अरब, न कतर और न ही सीधे सैन्य हमले ईरान के फैसलों को पूरी तरह बदल पाए हैं.

क्यों अहम है चीन?

चीन ईरान से बड़ी मात्रा में तेल खरीदता है और दोनों देशों के बीच गहरे आर्थिक संबंध हैं. चीन उन गिने-चुने देशों में शामिल है जो बिना सीधे टकराव के ईरान पर असर डाल सकते हैं. यही वजह है कि ट्रंप की चीन यात्रा सिर्फ अमेरिका-चीन संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर पूरे विश्व की राजनीति और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है.

मजबूत स्थिति में दिख रहा बीजिंग

हालांकि इस बार बातचीत में चीन मजबूत स्थिति में नजर आ रहा है. चीन दूतावास की तरफ से जारी “चीन-अमेरिका संबंधों की चार लाल रेखाएं” केवल एक बयान नहीं, बल्कि एक रणनीतिक चेतावनी मानी जा रही हैं. इन चार मुद्दों पर चीन किसी भी तरह का समझौता नहीं करना चाहता. इनमें ताइवान, मानवाधिकार और लोकतंत्र को लेकर बाहरी बयानबाजी, चीन की राजनीतिक व्यवस्था और उसके विकास के अधिकार शामिल हैं. चीन का साफ संदेश है कि इन सीमाओं को चुनौती नहीं दी जानी चाहिए.

बदलता हुआ शक्ति संतुलन

इससे ट्रंप की यात्रा का पूरा शक्ति संतुलन बदल गया है. एक तरफ अमेरिका ईरान और होर्मुज संकट को शांत करने के लिए चीन की मदद चाहता है, वहीं दूसरी तरफ चीन अपने रणनीतिक हितों को और मजबूत तरीके से सामने रख रहा है. अमेरिका एक संघर्ष को कम करने के लिए ऐसे देश से मदद मांग रहा है, जो दूसरे मुद्दों पर और ज्यादा सख्त रुख अपना रहा है.

अब सिर्फ मध्य पूर्व का मुद्दा नहीं रहा ईरान

ईरान का संघर्ष अब केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहा. यह अब दुनिया की बड़ी ताकतों के बीच प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बन चुका है. ट्रंप चाहते हैं कि चीन ईरान को नियंत्रित करने में मदद करे. वहीं चीन इस स्थिति का इस्तेमाल व्यापार, तकनीकी प्रतिबंधों और वैश्विक राजनीति में अपने फायदे के लिए करना चाहता है. “चार लाल रेखाएं” यह साफ करती हैं कि चीन बिना किसी रणनीतिक लाभ के अमेरिका का सहयोग नहीं करेगा.

क्या चीन पूरी तरह सहयोग करेगा?

यह अभी साफ नहीं है कि चीन अमेरिका की कितनी मदद करेगा. बीजिंग एक तरफ वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता चाहता है, लेकिन दूसरी तरफ उसे यह फायदा भी है कि अमेरिका लंबे समय तक संघर्षों में उलझा रहे. यही कारण है कि चीन इस समय एक संभावित मध्यस्थ भी है और एक रणनीतिक दर्शक भी.

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