एक दौर था जब भारत रक्षा तकनीक के मामले में विदेशों पर पूरी तरह निर्भर था. चाहे बात फाइटर जेट्स की हो, युद्धपोतों की या फिर टैंकों की – सबसे अहम हिस्सा यानी इंजन हमें बाहर से मंगाना पड़ता था. लेकिन अब हालात बदल रहे हैं. आत्मनिर्भर भारत की दिशा में रक्षा क्षेत्र में एक बड़ा कदम उठाया गया है. भारत अब खुद अपने लड़ाकू विमान, युद्धपोत और टैंकों के लिए इंजन विकसित कर रहा है, और यह सिर्फ तकनीकी मजबूती की बात नहीं है, बल्कि रणनीतिक स्वतंत्रता की भी शुरुआत है.
सरकार का पूरा फोकस इंजन निर्माण पर
ऑपरेशन सिंदूर की सफलता ने भारत को अपनी स्वदेशी ताकत पर फिर से भरोसा दिलाया. इस ऑपरेशन में भारत के बने हथियारों ने जो प्रभाव दिखाया, उसने न केवल दुश्मन को चौंकाया बल्कि यह भी साबित कर दिया कि हम तकनीक के मामले में पिछड़े नहीं हैं. 'आकाश' मिसाइल सिस्टम और IACCS जैसे सिस्टम्स ने हमारी हवाई सुरक्षा को और भी मजबूत बना दिया है. अब सरकार का पूरा फोकस इंजन निर्माण पर है, क्योंकि यही वो हिस्सा है जो अब तक सबसे बड़ी कमजोरी बना हुआ था.
एयरो इंजन के मामले में भारत की सबसे बड़ी उम्मीद ‘कावेरी 2.0’ है. यह प्रोजेक्ट DRDO के तहत काम कर रहे GTRE द्वारा विकसित किया जा रहा है. पहले कावेरी इंजन में कई तकनीकी बाधाएं आईं, लेकिन अब इसमें नई जान फूंकी गई है. यह इंजन 90kN से अधिक थ्रस्ट देने के लिए तैयार किया जा रहा है, जिससे यह तेजस, AMCA जैसे फाइटर जेट्स को शक्ति देगा. इसका प्रदर्शन अमेरिकी F-404 और F-414 इंजन के बराबर करने का लक्ष्य रखा गया है. इससे भारत को अमेरिका या फ्रांस से इंजन टेक्नोलॉजी लेने की जरूरत नहीं रह जाएगी.
रूस के साथ 24.8 करोड़ डॉलर का समझौता
भारत-रूस रक्षा साझेदारी ने इस दिशा में और रफ्तार दी है. रूस के साथ 24.8 करोड़ डॉलर का समझौता हुआ है, जिसके तहत भारत अपने T-72 टैंकों को 1,000 HP इंजन से लैस करेगा. इसके अलावा, AL-31FP इंजन की असेंबली भी भारत में ही होगी, जिससे न केवल लागत में कमी आएगी, बल्कि तकनीकी आत्मनिर्भरता को भी बढ़ावा मिलेगा. भारत अब कावेरी इंजन का परीक्षण रूस में भी कर रहा है, ताकि इसके प्रदर्शन को और बेहतर बनाया जा सके.
जहां एयरो इंजन पर तेजी से काम हो रहा है, वहीं मरीन इंजन की दिशा में भी भारत ने कमर कस ली है. भारतीय नौसेना के प्रमुख युद्धपोत अभी तक यूक्रेन और अमेरिका से आयातित गैस टरबाइन इंजन पर निर्भर हैं. लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते यूक्रेन के ज़ोर्या माशप्रोक्ट संयंत्र पर हुए हमलों ने भारत को झकझोर कर रख दिया. यही वो संयंत्र है जो भारतीय नौसेना को इंजन सप्लाई करता रहा है. अब भारत की योजना है कि वह कावेरी मरीन गैस टरबाइन के जरिए 2035 तक अपने युद्धपोतों के लिए पूरी तरह स्वदेशी इंजन बनाए. 2008 में इसका पहला परीक्षण हो चुका है और अब इसके उन्नत संस्करण पर तेजी से काम चल रहा है.
भारत की वैश्विक ताकत बनने की दिशा में सबसे निर्णायक कदम
भारतीय थलसेना की जरूरतों को देखते हुए टैंक इंजनों के क्षेत्र में भी भारत बड़ी छलांग लगाने की तैयारी में है. रेगिस्तान, पहाड़ और मैदानी इलाकों में ऑपरेशन के लिए टैंकों की शक्ति बहुत मायने रखती है. इसी सोच के साथ DATRAN 1500 HP इंजन पर परीक्षण चल रहा है, जो अर्जुन टैंक, फ्यूचर रेडी कॉम्बैट व्हीकल और K-9 वज्र जैसे सिस्टम्स को ताकत देगा. इस इंजन के अलग-अलग संस्करण T-90 टैंकों में भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं. इसकी सफलता भारतीय सेना को विदेशी इंजनों से छुटकारा दिला सकती है.
तीनों मोर्चों पर आत्मनिर्भरता हासिल करना भारत को एक नई रणनीतिक स्थिति में लाकर खड़ा करेगा. अब हमें न तो राफेल के इंजन के कोड के लिए फ्रांस से मिन्नतें करनी पड़ेंगी, न ही अमेरिकी F-414 इंजन की टेक्नोलॉजी की आस लगाए बैठना होगा. इससे न केवल भारत तेजी से अपने रक्षा प्रोजेक्ट्स को आगे बढ़ा पाएगा, बल्कि दुनिया को यह भी दिखा देगा कि हम अब किसी के मोहताज नहीं हैं.
भारत अब उस मुकाम की ओर बढ़ रहा है, जहां एयरो, मरीन और टैंक – तीनों तरह के इंजन अपने दम पर बनाए जाएंगे. यह केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत की वैश्विक ताकत बनने की दिशा में सबसे निर्णायक कदम साबित हो सकता है. चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी जब भारत को इंजन सुपरपावर बनते देखेंगे, तो यकीनन उनके भी होश उड़ जाएंगे. यह वो भारत होगा, जो अब न किसी पर निर्भर है, न किसी से डरता है.
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