Dark Eagle hypersonic missile: हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती दावेदारी और सैन्य दबदबे को चुनौती देने के लिए अमेरिका ने अब एक निर्णायक कदम उठाया है. हाल ही में ऑस्ट्रेलिया में हुए टैलिसमैन सेबर सैन्य अभ्यास के दौरान अमेरिकी सेना ने अपनी लंबी दूरी की हाइपरसोनिक मिसाइल सिस्टम ‘डार्क ईगल’ तैनात की. खास बात यह है कि यह पहली बार है जब इस घातक हथियार को अमेरिकी धरती से बाहर किसी देश में उतारा गया है.
अमेरिका का यह कदम न केवल चीन के लिए एक सीधा संदेश है, बल्कि अपने सहयोगियों को यह भरोसा भी दिलाता है कि वॉशिंगटन हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर किसी भी समझौते के मूड में नहीं है.
‘डार्क ईगल’ की ताकत
स्पीड: मैक-5 से अधिक (ध्वनि की गति से पाँच गुना तेज)
रेंज: लगभग 1,725 मील तक सटीक प्रहार
मोबाइल लॉन्चर: 4 (हर लॉन्चर में 2 मिसाइलें)
कंट्रोल सिस्टम: कमांड, कंट्रोल और सपोर्ट वाहन जो टारगेटिंग को शार्प रखते हैं
सबसे बड़ी बात यह है कि पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइलों के मुकाबले हाइपरसोनिक मिसाइलें उड़ान के दौरान अपना रास्ता बदल सकती हैं. यही वजह है कि इन्हें रोकना लगभग असंभव हो जाता है.
चीन और रूस के साथ हाइपरसोनिक रेस
अमेरिका ने यह तैनाती उस समय की है, जब चीन और रूस पहले ही इस तकनीक में बढ़त हासिल करने का दावा कर रहे हैं.
चीन: 2019 में पेश की थी DF-17 हाइपरसोनिक सिस्टम
रूस: आगे बढ़ा रहा है Avangard Glide Vehicle
इन परिस्थितियों में ‘डार्क ईगल’ को विदेश में तैनात करना अमेरिका की रणनीति का हिस्सा है ताकि तकनीकी अंतर को कम किया जा सके और हिंद-प्रशांत में शक्ति संतुलन बनाए रखा जा सके.
बीजिंग के लिए सख्त संदेश
ऑस्ट्रेलिया का उत्तरी इलाका अमेरिकी मिसाइलों को ऐसी पोजीशन देता है, जहां से वे चीन के कई अहम ठिकानों को ऑपरेशनल रेंज में ला सकती हैं, जैसे दक्षिण चीन सागर के ठिकाने और ताइवान की ओर जाने वाले रणनीतिक मार्ग शामिल है. इससे अमेरिका को आक्रामक बढ़त मिलती है और चीन की एंटी-एक्सेस/एरिया डिनायल (A2/AD) रणनीति को सीधी चुनौती मिलती है. साफ है कि यह तैनाती सिर्फ एक सैन्य अभ्यास नहीं, बल्कि बीजिंग को दिया गया एक रणनीतिक चेतावनी संदेश भी है.
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