Iran US Talks: अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान में शुरू हुई शांति वार्ता पहले ही चरण में बेनतीजा खत्म हो गई. करीब 21 घंटे तक चली बातचीत के बावजूद दोनों पक्ष किसी समझौते पर नहीं पहुंच सके. अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने साफ कहा कि अमेरिका ने अपनी “रेड लाइन” स्पष्ट कर दी थी, लेकिन ईरान ने उन्हें स्वीकार नहीं किया. वहीं ईरान का आरोप है कि अमेरिका ने जरूरत से ज्यादा शर्तें रखकर बातचीत को असंतुलित बना दिया.
हालांकि इस पूरे घटनाक्रम के दौरान सिर्फ कूटनीतिक बातचीत ही नहीं, बल्कि सैन्य गतिविधियों ने भी हालात को और संवेदनशील बना दिया है.
बातचीत के साथ-साथ बढ़ीं सैन्य गतिविधियां
जब एक ओर इस्लामाबाद में बातचीत चल रही थी, उसी दौरान अमेरिका ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज क्षेत्र में अपनी गतिविधियां तेज कर दीं. अमेरिकी सेंटकॉम के अनुसार, उसके दो डेस्ट्रॉयर- USS फ्रैंक ई. पीटरसन और USS माइकल मर्फी इस अहम समुद्री मार्ग को पार कर चुके हैं.
इन जहाजों को बारूदी सुरंगों को हटाने के मिशन में लगाया गया है, जिसे अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार की सुरक्षा के लिए जरूरी कदम बताया.
हालांकि ईरान ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य पर उसका नियंत्रण है और बिना अनुमति किसी भी विदेशी सैन्य गतिविधि को स्वीकार नहीं किया जाएगा.
वार्ता फेल, लेकिन तनाव बरकरार
इस्लामाबाद में हुई बातचीत से यह उम्मीद थी कि दोनों देशों के बीच तनाव कम होगा, लेकिन नतीजा इसके उलट रहा.
जेडी वेंस के मुताबिक, अमेरिका समझौते के लिए तैयार था, लेकिन ईरान ने मुख्य शर्तों को मानने से इनकार कर दिया. दूसरी ओर, ईरान का कहना है कि अमेरिका ने बातचीत के दौरान अपनी मांगें बढ़ा दीं, जिससे सहमति बनना मुश्किल हो गया.
पाकिस्तान की भूमिका और बढ़ी जटिलता
इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान की भूमिका भी चर्चा में रही. एक तरफ वह अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा था, वहीं दूसरी तरफ उसने सऊदी अरब में अपने फाइटर जेट तैनात कर दिए.
यह तैनाती दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग का हिस्सा बताई गई, लेकिन इसे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है. इससे यह धारणा मजबूत हुई कि कूटनीति के साथ-साथ रणनीतिक दबाव भी बनाया जा रहा है.
दोहरी रणनीति के संकेत?
विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम में कूटनीतिक बातचीत और सैन्य गतिविधियां एक साथ चलती नजर आईं. एक ओर वार्ता के जरिए समाधान की कोशिश दिखाई गई, तो दूसरी ओर समुद्री क्षेत्र में सैन्य उपस्थिति बढ़ाकर दबाव बनाने की रणनीति अपनाई गई.
इसी वजह से यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या बातचीत केवल औपचारिकता थी या इसके पीछे कोई व्यापक रणनीतिक उद्देश्य भी था.
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