मिस्र के लोकप्रिय शहर शर्म अल शेख में सोमवार, 13 अक्टूबर 2025 को अंतरराष्ट्रीय शांति सम्मेलन आयोजित हुआ, जहां दुनिया भर के कई शीर्ष नेताओं ने भाग लिया. यह सम्मेलन मुख्यतः गाजा क्षेत्र में संघर्ष विराम और स्थायी शांति स्थापना के प्रयासों को लेकर बुलाया गया था. इस मंच पर जहां वैश्विक राजनीति की बड़ी हलचलें देखी गईं, वहीं भारत की सीमित भागीदारी ने कुछ सवाल खड़े कर दिए.
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस सम्मेलन के दौरान एक चौंकाने वाला बयान देते हुए कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध को रोकने का श्रेय पूरी तरह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को जाता है. इस वक्तव्य के दौरान शरीफ और ट्रंप के बीच मंच पर काफी सौहार्दपूर्ण माहौल देखने को मिला. यह बयान भारत के प्रति उनकी नीति और अमेरिका से करीबी को दर्शाने वाला था.
डोनाल्ड ट्रंप बने शांति प्रयासों के केंद्र
इस सम्मेलन के सह आयोजक रहे अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा के लिए शांति योजना प्रस्तुत की. सम्मेलन से पूर्व उन्होंने इज़रायली संसद (नेसेट) में भाषण देते हुए प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की खुलकर सराहना की और हमास को हिंसा के विरुद्ध सख्त चेतावनी भी दी. मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल सीसी ने भी ट्रंप के साथ सह आयोजन में अहम भूमिका निभाई.
भारत की भागीदारी पर उठे सवाल
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस सम्मेलन में आमंत्रण मिला था, लेकिन उन्होंने स्वयं उपस्थित न होकर विदेश राज्यमंत्री कीर्ति वर्धन सिंह को भारत का प्रतिनिधित्व करने भेजा. प्रधानमंत्री मोदी ने गाजा में युद्धविराम और बंधकों की रिहाई पर प्रतिक्रिया देते हुए 'X' (पूर्व ट्विटर) पर लिखा:
"हम दो वर्षों से अधिक समय से बंदी बनाए गए सभी बंधकों की रिहाई का स्वागत करते हैं. यह उनके परिवारों की दृढ़ता, राष्ट्रपति ट्रंप की अथक कोशिशों और नेतन्याहू के संकल्प का प्रतीक है. भारत इस क्षेत्र में शांति स्थापना के लिए किए जा रहे हर प्रयास का समर्थन करता है."हालांकि, भारत की ओर से शीर्ष स्तर की भागीदारी न होने पर कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सवाल उठाया. उन्होंने 'X' पर लिखा,
"यह रणनीतिक संयम है या एक खोया हुआ अवसर?"
उन्होंने यह स्पष्ट किया कि यह कीर्ति वर्धन सिंह की योग्यता पर प्रश्न नहीं है, परंतु इतने उच्च स्तरीय वैश्विक मंच पर भारत की कमजोर उपस्थिति “रणनीतिक दूरी” को दर्शा सकती है. उनके अनुसार, भारत की आवाज उस ऊंचाई तक नहीं पहुंच पाएगी जो पहुंच सकती थी.
विश्व के कई प्रमुख नेता हुए शामिल
इस सम्मेलन में करीब 20 से अधिक देशों के राष्ट्राध्यक्ष या प्रमुख नेता शरीक हुए. इसमें कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल थानी, फिलिस्तीनी प्राधिकरण के महमूद अब्बास, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर, स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज़, इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी, यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा, संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस, अरब लीग महासचिव अहमद अबूल ग़ैत, और जॉर्डन के राजा अब्दुल्ला द्वितीय जैसे कई अहम नाम शामिल रहे.
साथ ही कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी, इराक के प्रधानमंत्री मोहम्मद शिया अल सूदानी और पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई. वहीं इज़राइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने सम्मेलन में शिरकत नहीं की, लेकिन उनकी भूमिका को ट्रंप के वक्तव्यों में विशेष स्थान मिला.
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