कभी "हाउडी मोदी" और "नमस्ते ट्रंप" जैसी ऐतिहासिक रैलियों के ज़रिए वैश्विक मंच पर दोस्ती का उदाहरण बने भारत और अमेरिका के रिश्ते, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में खटास से भर गए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ट्रंप के बीच पहले दौर में जो आपसी तालमेल दिखाई दिया था, वह धीरे-धीरे गायब होता चला गया.
आइए एक-एक करके समझते हैं कि किन सात बड़ी घटनाओं और कारणों ने दोनों नेताओं के बीच बनी गर्मजोशी को ठंडा कर दिया और रिश्तों में तल्खी ला दी:
1. ट्रंप के सीजफायर के दावे को भारत ने इनकार कियैा
ट्रंप ने एक बार दावा किया कि भारत और पाकिस्तान के बीच सीजफायर उन्हीं की पहल पर हुआ. जबकि भारत की ओर से साफ कर दिया गया था कि इस समझौते में अमेरिका की कोई भूमिका नहीं थी.
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप इस बात को अब तक 40 से अधिक बार दोहरा चुके हैं, जबकि प्रधानमंत्री मोदी पहले ही इस दावे को गलत बता चुके हैं. ट्रंप की ज़िद और बार-बार खुद को श्रेय देने की आदत ने भारतीय कूटनीति को असहज कर दिया.
2. नोबेल के लिए नामांकन नहीं मिलने से नाराज़ हुए ट्रंप
उसी बातचीत के दौरान ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी से यह अपेक्षा जताई कि भारत उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित करे, जैसा कि पाकिस्तान, इज़राइल और अजरबैजान जैसे देश कर चुके थे.
भारत ने इस पर कोई कदम नहीं उठाया, जिससे ट्रंप आहत हुए. उन्होंने यह महसूस किया कि भारत उनके वैश्विक महत्व को मान्यता नहीं दे रहा. यह बात उनके और मोदी के बीच अविश्वास का कारण बनी.
3. मोदी ने ट्रंप से मिलने से इनकार किया, तनाव और बढ़ा
G7 सम्मेलन के दौरान, जो जून 2025 में कनाडा में हुआ, ट्रंप और मोदी की मुलाकात तय मानी जा रही थी. हालांकि, ट्रंप पहले ही दिन सम्मेलन से चले गए और मोदी से मुलाकात नहीं हो पाई. इसके बाद ट्रंप ने मोदी से अनुरोध किया कि वे अमेरिका होकर भारत जाएं, लेकिन मोदी ने क्रोएशिया की आधिकारिक यात्रा का हवाला देते हुए इनकार कर दिया.
इस घटना को ट्रंप ने अपनी अनदेखी के रूप में लिया, खासकर उस समय जब पाकिस्तानी आर्मी चीफ आसिम मुनीर अमेरिका दौरे पर थे. ट्रंप की यह इच्छा थी कि मोदी और मुनीर के बीच कोई बातचीत हो, लेकिन भारत ने इससे पूरी तरह परहेज़ किया.
4. कश्मीर पर तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को भारत ने ठुकराया
कश्मीर एक संवेदनशील मुद्दा है और भारत हमेशा यह स्पष्ट करता रहा है कि इसमें किसी तीसरे देश की मध्यस्थता स्वीकार्य नहीं है. ट्रंप ने एक बार फिर इस मामले पर "मध्यस्थ" बनने की पेशकश की, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने इस प्रस्ताव को पूरी तरह खारिज कर दिया.
विदेश सचिव विक्रम मिस्री के मुताबिक, ट्रंप को स्पष्ट रूप से बता दिया गया कि यह भारत और पाकिस्तान के बीच का द्विपक्षीय मुद्दा है और किसी भी बाहरी ताकत की भूमिका यहां नहीं हो सकती. इस ठुकराहट ने ट्रंप की छवि को नुकसान पहुंचाया और रिश्ते और बिगड़े.
5. ट्रंप ने 'डेड इकोनॉमी' कहकर आलोचना की
सीजफायर और कश्मीर को लेकर उपजी नाराज़गी के बाद ट्रंप ने सार्वजनिक मंचों से भारत पर तीखे हमले शुरू कर दिए. उन्होंने भारत की अर्थव्यवस्था को "डेड इकोनॉमी" कहकर उसकी नीतियों की आलोचना की. इसके साथ ही उन्होंने भारतीय उत्पादों पर 50% तक टैरिफ लगाने का एलान कर दिया.
यह बयान उस ट्रंप से आया था, जो कभी अहमदाबाद में "नमस्ते ट्रंप" कार्यक्रम के दौरान भारत की तारीफों के पुल बांध रहे थे. इस तेज़ बदलाव ने दोनों देशों के संबंधों में गिरावट को और तेज़ कर दिया.
6. कृषि उत्पादों पर भारत का कड़ा रुख
अमेरिका लंबे समय से चाहता था कि भारत अपने कृषि और डेयरी सेक्टर को अमेरिकी कंपनियों के लिए खोले और इन उत्पादों पर टैरिफ घटाए. लेकिन भारत ने घरेलू किसानों के हितों को प्राथमिकता देते हुए इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया.
जर्मन समाचार पत्र FAZ की रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता का छठा दौर रद्द कर दिया और अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का दौरा भी टाल दिया. अमेरिकी जीएम फसलों और डेयरी उत्पादों पर बनी असहमति के चलते पहले ही पांचवां दौर विफल हो चुका था. इससे ट्रंप प्रशासन भारत के प्रति और कठोर हो गया.
7. रूस से तेल खरीदने पर अमेरिका ने लगाया टैरिफ
जब दुनिया रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से रूसी तेल से दूरी बना रही थी, तब भारत ने राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा का हवाला देते हुए रूस से तेल खरीद जारी रखी. अमेरिका इससे बेहद नाराज हुआ और भारत पर 27 अगस्त से 50% टैरिफ लागू कर दिया.
इसमें से 25% टैरिफ को पेनल्टी माना गया क्योंकि भारत, अमेरिका के बार-बार कहने के बावजूद, रूस के साथ तेल व्यापार बंद करने को तैयार नहीं हुआ. अमेरिका ने यूरोपीय देशों से भी भारत पर दबाव डालने को कहा, लेकिन यूरोपीय संघ ने इस मुद्दे पर तटस्थ रुख अपनाया.
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