आज के 79वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर भुवनेश्वर में आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने राष्ट्रध्वज फहराया और उपस्थित लोगों को संबोधित किया. इस अवसर पर उन्होंने भारत की अद्वितीय आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हमारा देश दुनिया में शांति और सुख फैलाने के मार्ग पर अग्रणी भूमिका निभा सकता है.
डॉ. भागवत ने सभा में उपस्थित लोगों से कहा कि भारतीयों को स्वतंत्रता को लेकर आत्मसंतुष्ट नहीं होना चाहिए. उन्होंने जोर देकर कहा कि स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए हमें कठिन परिश्रम और त्याग की आवश्यकता है. उन्होंने याद दिलाया कि हमारे पूर्वजों ने सर्वोच्च बलिदान देकर हमें स्वतंत्रता दिलाई, और अब हमारी जिम्मेदारी है कि हम इसे बनाए रखें, देश को आत्मनिर्भर बनाएं और दुनिया में ‘विश्व गुरु’ के रूप में उभरें.
स्व और तंत्र: स्वतंत्रता की कुंजी
अपने भाषण में डॉ. भागवत ने कहा, “स्वतंत्रता में स्व और तंत्र का संतुलन महत्वपूर्ण है. स्व के आधार पर तंत्र चलता है, तभी सच्ची स्वतंत्रता संभव है. भारत एक विशिष्ट राष्ट्र है, जो दुनिया में सुख और शांति फैलाने, धर्म देने और सभी को जोड़कर उन्नति की राह दिखाने के लिए जीवित है. हमारे राष्ट्रध्वज के केंद्र में धर्मचक्र इसीलिए है. यह धर्म सभी को जोड़ता है और लोक एवं परलोक में सुख प्रदान करता है. इसे बनाए रखने के लिए तंत्र और स्व की जागरूकता अनिवार्य है.”
भारत का वैश्विक संदेश
डॉ. भागवत ने कहा कि आज भारत न केवल अपने नागरिकों के लिए बल्कि विश्व के लिए भी सद्भाव और मार्गदर्शन का केंद्र बन सकता है. उन्होंने सभी से आह्वान किया कि वे अपने देश की विरासत को समझें और स्वतंत्रता के संरक्षण के लिए हर संभव योगदान दें.
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