Asim Munir in US: वाशिंगटन की ओर पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की बार-बार की जा रही यात्राओं को भले ही कूटनीतिक पहल बताया जा रहा हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों की नजर में यह कोई साधारण दौरा नहीं है. हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, इस यात्रा को द्विपक्षीय संबंधों को मज़बूत करने की दिशा में उठाया गया कदम कम और अमेरिका से आर्थिक, सैन्य और राजनीतिक संसाधनों की पुनः प्राप्ति का प्रयास ज़्यादा माना जा रहा है.
ग्लोबल ऑर्डर द्वारा जारी रिपोर्ट में स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि पाकिस्तान की सेना दशकों से अमेरिका की नीतियों को अपने हित में मोड़ती आई है. शीत युद्ध के समय से लेकर आज तक, वॉशिंगटन द्वारा दी गई वित्तीय सहायता, हथियार और राजनयिक समर्थन को पाकिस्तान ने अपने तथाकथित “सैन्य-औद्योगिक आतंकवाद परिसर” को मज़बूत करने के लिए इस्तेमाल किया है.
1980 के दशक में अफगानिस्तान में सोवियत प्रभाव को रोकने के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान में अरबों डॉलर खर्च किए. लेकिन उस समय पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI ने वही जिहादी नेटवर्क खड़े किए, जिन्होंने आगे चलकर तालिबान और अल-कायदा जैसे खतरनाक संगठनों को जन्म दिया. ओसामा बिन लादेन का एबटाबाद में छिपा होना और वो भी सेना की प्रमुख अकादमी के पास, यह बताने के लिए काफी है कि समस्या कितनी गहरी है.
अमेरिका का 'मित्र', आतंकियों का 'सरपरस्त'
2000 के दशक में अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में प्रमुख गैर-नाटो सहयोगी का दर्जा दिए जाने के बावजूद, तालिबानी नेतृत्व पाकिस्तान की धरती से न सिर्फ़ बचकर चलता रहा, बल्कि खुलेआम अपनी गतिविधियां भी चलाता रहा. रिपोर्ट के अनुसार, यह सब एक सुनियोजित रणनीति थी, न कि कोई चूक.
आज भी पाकिस्तान में लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठन खुलेआम काम कर रहे हैं. ये न सिर्फ़ भारत और अफगानिस्तान जैसे पड़ोसी देशों को निशाना बना रहे हैं, बल्कि चरमपंथी विचारधारा को वैश्विक स्तर पर भी फैलाने का काम कर रहे हैं. इन संगठनों को पाकिस्तानी सरकार और सेना का प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन प्राप्त है.
सेंटकॉम की साझेदारी और सुरक्षा पर संकट
रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के साथ पाकिस्तान की बढ़ती नजदीकी भविष्य में अमेरिकी हितों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है. पाकिस्तानी सेना के चरमपंथी नेटवर्क्स के साथ गहरे संबंध, खुफिया जानकारी के लीक होने के पुराने रिकॉर्ड और रणनीतिक सूचनाओं का दुरुपयोग, ये सभी कारक मध्य पूर्व की स्थिरता को खतरे में डाल सकते हैं.
क्या अमेरिका फिर से वही गलती दोहराएगा?
रिपोर्ट में यह सवाल प्रमुखता से उठाया गया है कि क्या अमेरिकी नेतृत्व, चाहे वह ट्रंप हो या कोई अन्य प्रशासन, पाकिस्तान की “बदलाव” की कहानी पर फिर से भरोसा करेगा? जबकि आज भी पाकिस्तान UN द्वारा घोषित आतंकियों को सुरक्षित पनाह देता है, अपने पड़ोसियों में कट्टरपंथी विचारधारा का निर्यात करता है, और घरेलू कट्टरता को नज़रअंदाज़ करता है.
जनरल आसिम मुनीर की वॉशिंगटन यात्रा, जो एक महीने में दूसरी बार हो रही है, को कुछ लोग दोस्ती की निशानी मान रहे हैं. लेकिन रिपोर्ट इसे चेतावनी के रूप में देखती है, यह वही रास्ता है जो पहले भी धोखे और अस्थिरता की ओर ले गया था.
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