Pakistan Israel News: पाकिस्तान सरकार जल्द ही गाजा पट्टी में लगभग 20 हजार सैनिकों की तैनाती करने की तैयारी कर रही है. यह कदम गाजा क्षेत्र में पश्चिमी देशों की निगरानी में शुरू होने वाले स्थिरीकरण और पुनर्वास कार्यक्रम का हिस्सा बताया जा रहा है.
हालांकि, इस फैसले ने पाकिस्तान के भीतर ही भारी विवाद खड़ा कर दिया है, क्योंकि कई पूर्व राजनयिकों, सैन्य विशेषज्ञों और पत्रकारों ने इस कदम को “राजनीतिक रूप से आत्मघाती” और “इस्लामी दुनिया के साथ विश्वासघात” बताया है.
गुप्त समझौते का खुलासा
एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह निर्णय उस समय लिया गया जब पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने मिस्र में इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद और अमेरिकी केंद्रीय खुफिया एजेंसी (CIA) के वरिष्ठ अधिकारियों से कई गुप्त मुलाकातें कीं. बताया जा रहा है कि इन बैठकों में गाजा में पाकिस्तानी सैनिकों की संभावित भूमिका को लेकर चर्चा हुई.
चौंकाने वाली बात यह है कि पाकिस्तान अब तक इजरायल को औपचारिक रूप से मान्यता नहीं देता, फिर भी उसकी सेना के शीर्ष अधिकारी मोसाद और सीआईए के संपर्क में हैं. यह स्थिति पाकिस्तान की विदेश नीति और उसके “मुस्लिम राष्ट्रवाद” के दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती है.
पाकिस्तान के अंदर बढ़ा विरोध
पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार मोइद पीरजादा ने सोशल मीडिया पर सवाल उठाते हुए लिखा, “तो क्या इसका मतलब है कि पाकिस्तानी सेना की ‘मुस्लिम पहचान’ और ‘राष्ट्रवाद’ केवल दिखावा था? असल में यह एक औपनिवेशिक ढांचे में बनी सेना है, जिसका मकसद बाहरी शक्तियों के हित साधना है.”
इसी तरह जानी-मानी विश्लेषक आएशा सिद्धीकी ने भी सेना पर तीखा हमला किया. उन्होंने लिखा कि पाकिस्तान ने अतीत में भी फिलिस्तीनियों के खिलाफ कार्रवाई की थी और हजारों लोगों की जान ली थी. उनके अनुसार, सेना का यह इतिहास “फिलिस्तीन के समर्थन” के सभी दावों को झूठा साबित करता है.
पुनर्वास के नाम पर सैन्य कार्रवाई का आरोप
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तानी सैनिकों को औपचारिक रूप से “पुनर्वास और राहत कार्य” के नाम पर गाजा भेजा जाएगा, लेकिन उनकी असली जिम्मेदारी हमास के बचे हुए लड़ाकों को खत्म करना होगी. कहा जा रहा है कि पाकिस्तान को यह काम अमेरिका और पश्चिमी देशों की योजना के तहत दिया गया है, ताकि गाजा क्षेत्र को उनकी रणनीति के अनुसार स्थिर किया जा सके.
इस योजना में इंडोनेशिया और अज़रबैजान की सीमित भूमिका भी बताई जा रही है. माना जा रहा है कि ये देश गाजा के अस्थायी प्रशासनिक ढांचे में शामिल होकर “शांति स्थापना बल” के रूप में काम करेंगे.
असीम मुनीर की मध्य-पूर्वी कूटनीति
इस बीच, जनरल असीम मुनीर ने जॉर्डन के शाह किंग अब्दुल्ला और जॉर्डन के सैन्य प्रमुख मेजर जनरल यूसुफ हुनेती के साथ अम्मान में अहम बैठक की. जॉर्डन, गाजा पट्टी के बेहद करीब है और पाकिस्तानी सेना की किसी भी तैनाती के लिए उसका सहयोग आवश्यक माना जा रहा है.
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह पूरी कूटनीति अमेरिकी प्रभाव में हो रही है. यही कारण है कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और मौजूदा प्रशासन दोनों ने असीम मुनीर की “सुरक्षा नीति” की खुलकर तारीफ की थी.
इजरायल को लेकर नरम पड़ता पाकिस्तान?
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पाकिस्तान अपने पासपोर्ट से “इजरायल के लिए मान्य नहीं” वाली लाइन हटाने की तैयारी कर रहा है. यदि ऐसा होता है, तो यह पाकिस्तान की विदेश नीति में ऐतिहासिक बदलाव होगा.
इजरायली मीडिया ने इस संभावित कदम को “संवेदनशील लेकिन रणनीतिक रूप से फायदेमंद” बताया है. हालांकि, इस बदलाव ने ईरान, तुर्की और कतर जैसे देशों में नाराजगी पैदा कर दी है, जो हमास के खुले समर्थक हैं.
अरब देशों का विरोध
ईरान, तुर्की और कतर ने संकेत दिए हैं कि वे गाजा में पाकिस्तानी सैनिकों की तैनाती का कड़ा विरोध करेंगे. उनका कहना है कि यह कदम इजरायल और अमेरिका के हितों को साधने के लिए उठाया जा रहा है, न कि मानवीय सहायता के लिए.
विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से पाकिस्तान के अरब जगत के साथ रिश्ते और भी खराब हो सकते हैं, खासकर ऐसे समय में जब उसकी अर्थव्यवस्था पहले से ही खस्ताहाल है.
इतिहास दोहराने की आशंका: ‘ब्लैक सितंबर’ की याद
यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान फिलिस्तीनी क्षेत्र से जुड़ी किसी सैन्य कार्रवाई में शामिल हो रहा है. वर्ष 1970 में जॉर्डन के किंग हुसैन के शासन के दौरान, पाकिस्तान ने अपने सैन्य अधिकारी जिया-उल-हक़ के नेतृत्व में फिलिस्तीनी लड़ाकों के खिलाफ कार्रवाई की थी.
उस समय पाकिस्तान की सेना ने जॉर्डन के साथ मिलकर केवल 11 दिनों में 20 से 25 हजार फिलिस्तीनियों को मौत के घाट उतार दिया था. इस घटना को इतिहास में “ब्लैक सितंबर” के नाम से जाना जाता है. न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान ने जॉर्डन में पैदल सेना और एंटी-एयरक्राफ्ट यूनिट भेजी थी, जिसने अमान की सड़कों पर फिलिस्तीनी शरणार्थियों पर भीषण हमला किया था.
‘फिलिस्तीनियों का कातिल’ कहा गया पाकिस्तान को
पूर्व इजरायली मंत्री मोशे दयान ने एक बार कहा था कि “पाकिस्तान ने 11 दिनों में जितने फिलिस्तीनियों को मारा, उतने इजरायल ने 20 वर्षों में भी नहीं मारे.” पाकिस्तानी पत्रकार शेख अजीज ने लिखा कि जिया-उल-हक को अपने देश में “फिलिस्तीनियों का कातिल” कहा जाने लगा था.
इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि पाकिस्तान की सेना अक्सर विदेशी पैसों और राजनीतिक गठबंधनों के लिए काम करती है, चाहे वह अपने ही धार्मिक या क्षेत्रीय साझेदारों के खिलाफ क्यों न हो.
देश के अंदर से उठती आवाजें
पाकिस्तान के सीनेटर अल्लामा राजा नासिर ने सेना के इस नए फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि यह कदम “इजरायल की मदद के लिए उठाया गया है.” उन्होंने कहा कि वही सेना जिसने पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में लाखों लोगों की हत्या की और हजारों महिलाओं के साथ अत्याचार किए, उससे मानवता की उम्मीद करना बेकार है.
विश्लेषकों का कहना है कि यदि पाकिस्तान वाकई गाजा में सैनिक भेजता है, तो यह न केवल उसकी “इस्लामी एकजुटता” की छवि को खत्म करेगा बल्कि उसे पश्चिमी शक्तियों के कठपुतली राष्ट्र के रूप में भी दिखाएगा.
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