'कश्मीर की जीत गजवा-ए-हिंद का दरवाजा बनेगी', लश्कर आतंकी ने फिर उगला जहर, पाक सेना का है करीबी, Video

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में पिछले दो महीने से ज्यादा समय से विरोध प्रदर्शन जारी हैं. यहां के लोग पाकिस्तानी सरकार और सेना के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं.

Lashkar terrorist Saifullah Kasuri On Kashmir And Ghazwa E Hind Video
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इस्लामाबाद: पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में पिछले दो महीने से ज्यादा समय से विरोध प्रदर्शन जारी हैं. यहां के लोग पाकिस्तानी सरकार और सेना के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं. इसी बीच लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े सैफुल्लाह कसूरी का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें वह भारत के खिलाफ भड़काऊ बातें करता नजर आ रहा है.

वीडियो में कसूरी कश्मीर को लेकर भारत के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की बात करता है. वह दावा करता है कि कश्मीर की जीत के बाद गजवा-ए-हिंद का रास्ता खुलेगा. उसके इस बयान को लेकर एक बार फिर सवाल उठ रहे हैं कि पाकिस्तान में आतंकी संगठन किस तरह भारत विरोधी प्रचार कर रहे हैं.

पाकिस्तानी सेना का करीबी माना जाता है कसूरी

सैफुल्लाह कसूरी को लश्कर-ए-तैयबा के प्रमुख हाफिज सईद का करीबी और पाकिस्तानी सेना से जुड़ा हुआ माना जाता है. कुछ समय पहले कसूरी ने खुद पाकिस्तानी सेना के कार्यक्रमों में शामिल होने की बात कही थी. उसने बताया था कि उसे सेना के कार्यक्रमों में जाने के लिए निमंत्रण मिलता रहा है.

कसूरी पर जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले की साजिश में शामिल होने के आरोप भी लगे हैं. 22 अप्रैल को हुए इस हमले में 26 नागरिकों की मौत हुई थी. इसके बाद भारत ने 7 मई को ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान और पीओके में मौजूद आतंकी ठिकानों पर कार्रवाई की थी.

ऑपरेशन सिंदूर में लश्कर के ठिकाने भी बने निशाना

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान बहावलपुर और मुरीदके में मौजूद जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के ठिकानों को भी निशाना बनाया गया था. कार्रवाई के बाद कसूरी ने माना था कि इससे पाकिस्तान में मौजूद आतंकी ढांचे को बड़ा नुकसान हुआ. उसने यह भी कहा था कि संगठन के कई अहम लोग इन हमलों में मारे गए.

हाफिज सईद के राजनीतिक संगठन से भी जुड़ा रहा

सैफुल्लाह कसूरी को 2017 में मिल्लत मुस्लिम लीग के अध्यक्ष के तौर पर पेश किया गया था. इस संगठन को हाफिज सईद के लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा राजनीतिक संगठन माना जाता है. आरोप रहा है कि इसके जरिए लश्कर से जुड़े लोगों को आम लोगों के बीच राजनीतिक गतिविधियों में उतारने की कोशिश की गई.

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