Iran on America Tariff: भारत पर लगाए गए भारी-भरकम आयात शुल्क को लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आलोचना अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी होने लगी है. भारत के पुराने मित्र देशों में से एक, ईरान, इस फैसले पर खुलकर भारत के समर्थन में सामने आया है. नई दिल्ली स्थित ईरानी राजदूत डॉ. इराज इलाही ने इस फैसले को अमेरिका की लंबे समय से चली आ रही "आर्थिक युद्धनीति" का हिस्सा बताया है.
ईरानी राजदूत डॉ. इलाही ने स्पष्ट कहा कि अमेरिका अक्सर उन देशों पर आर्थिक दबाव बनाता है जो अपने स्वाभिमान और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए खड़े होते हैं. एनडीटीवी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "आर्थिक नीतियों को हथियार में बदलना अमेरिका की कोई नई आदत नहीं है. बीते कई दशकों से अमेरिका स्वतंत्र राष्ट्रों के विकास की राह में रोड़ा बनता रहा है."
अमेरिका बना रहा अर्थव्यवस्था को ‘हथियार’
उन्होंने ये भी कहा कि जो राष्ट्र आत्मनिर्भरता और विकास के रास्ते पर चलते हैं, उन्हें अमेरिका अक्सर टारगेट करता है और इस समय भारत इसका ताजा उदाहरण है.
ईरान का अपना अनुभव भी उदाहरण
डॉ. इलाही ने अमेरिका की "इकोनॉमिक वारफेयर" रणनीति की पोल खोलते हुए ईरान का उदाहरण भी दिया. उन्होंने बताया कि “ईरान बीते 40 वर्षों से अमेरिका के आर्थिक प्रतिबंधों का सामना कर रहा है. यह इस रणनीति की सबसे स्पष्ट मिसाल है.” उन्होंने ये भी जोड़ा कि ट्रंप प्रशासन के तहत यह प्रवृत्ति और अधिक आक्रामक और खुले तौर पर अपनाई जा रही है, जो अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिए खतरनाक संकेत है.
भारत के खिलाफ नहीं, सभी के खिलाफ है यह हमला
ईरानी राजदूत की टिप्पणियाँ ऐसे समय पर आई हैं जब अमेरिका ने भारत से आयात होने वाले उत्पादों पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा की है, जिससे कुल शुल्क 50 प्रतिशत तक पहुंच गया है. यह अब ब्राजील के बराबर अमेरिका द्वारा लगाए गए सबसे अधिक आयात शुल्कों में शामिल हो गया है. डॉ. इलाही ने इस निर्णय को केवल भारत के खिलाफ नहीं बल्कि समूचे वैश्विक व्यापारिक संतुलन के लिए खतरा बताया. उनके अनुसार, “यह हमला किसी एक देश के खिलाफ नहीं है. सच यह है कि आज कोई भी देश इस तरह के आर्थिक दवाब से खुद को पूरी तरह सुरक्षित नहीं मान सकता.”
अमेरिका की मंशा पर सवाल
ईरान ने यह भी आरोप लगाया कि ट्रंप प्रशासन वैश्विक मंच पर देशों को उनकी संप्रभुता के बावजूद अपने फैसलों के आगे झुकने पर मजबूर करना चाहता है. यह मानसिकता अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को कमजोर करती है और एकतरफा नीतियों को बढ़ावा देती है.
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