अब गुफाओं और इमारतों में भी नहीं बचेंगे दुश्मन! भारतीय सेना को मिला 'गेम-चेंजर' VAHAK-6, जानें खासियत

VAHAK-6: भारत ने रक्षा तकनीक के क्षेत्र में एक नई उपलब्धि हासिल की है. निजी कंपनी एंड्योरएयर और सरकारी कंपनी भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड ने मिलकर ‘वाहक-6’ (VAHAK-6) नाम का स्वदेशी मल्टी-ड्रोन मदरशिप सिस्टम तैयार किया है.

Indian Army gets the game-changer VAHAK-6 Multi-drone system its features
प्रतिकात्मक तस्वीर/ AI

VAHAK-6: भारत ने रक्षा तकनीक के क्षेत्र में एक नई उपलब्धि हासिल की है. निजी कंपनी एंड्योरएयर और सरकारी कंपनी भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड ने मिलकर ‘वाहक-6’ (VAHAK-6) नाम का स्वदेशी मल्टी-ड्रोन मदरशिप सिस्टम तैयार किया है. यह तकनीक भारतीय सेना की निगरानी और युद्ध क्षमता को मजबूत कर सकती है.

क्या है ‘वाहक-6’?

‘वाहक-6’ दो स्तर वाला मानवरहित हवाई सिस्टम है. इसमें ‘सबल-20’ नाम का बड़ा हेलीकॉप्टर जैसा मदरशिप होता है, जो अपने साथ कई छोटे ‘अलख’ माइक्रो-ड्रोन ले जाता है.

छोटे ड्रोन आमतौर पर कम बैटरी और सीमित दूरी के कारण दूर तक नहीं जा पाते. ‘वाहक-6’ इस समस्या को दूर करता है. सबल-20 छोटे ड्रोन्स को मिशन वाले इलाके के करीब ले जाकर हवा में ही छोड़ सकता है. इससे छोटे ड्रोन्स की बैटरी बचती है और वे ज्यादा समय तक निगरानी या दूसरे मिशन कर सकते हैं.

एक साथ अलग-अलग काम करेंगे 6 ड्रोन

आईआईटी कानपुर के सहयोग से तैयार ‘अलख’ छोटे आकार का नैनो या माइक्रो-ड्रोन है. यह करीब 2x2 फीट की छोटी खिड़की या संकरे रास्ते से भी इमारत के अंदर जा सकता है. यह बंद कमरों, गुफाओं और दूसरे संकरे इलाकों में जाकर लाइव वीडियो भेज सकता है. इसके अलावा यह करीब 400 ग्राम तक का पेलोड भी ले जाने में सक्षम है.

‘वाहक-6’ की खासियत यह है कि एक मदरशिप से छह ड्रोन अलग-अलग काम कर सकते हैं. कुछ ड्रोन निगरानी और इलाके की जानकारी जुटा सकते हैं, जबकि जरूरत के मुताबिक दूसरे ड्रोन हमला करने वाले मिशन में इस्तेमाल किए जा सकते हैं.

सेना के लिए क्यों अहम है?

आधुनिक युद्ध में ड्रोन और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध की भूमिका बढ़ रही है. ‘अलख’ ड्रोन को जीपीएस के बिना भी काम करने के लिए तैयार किया गया है, जिससे जीपीएस जैमिंग के दौरान भी इसके इस्तेमाल की संभावना बनी रहती है.

एक साथ छह ड्रोन अलग-अलग दिशाओं में भेजकर बड़े इलाके की निगरानी की जा सकती है. 4,000 मीटर से ज्यादा ऊंचाई वाले पहाड़ी इलाकों, लद्दाख और अरुणाचल जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों के साथ शहरी युद्ध में भी यह तकनीक सैनिकों को सीधे खतरे में डाले बिना जानकारी जुटाने में मदद कर सकती है.

सामने हैं कुछ बड़ी चुनौतियां

हालांकि ‘वाहक-6’ की क्षमता काफी अहम है, लेकिन युद्ध के दौरान इसके सामने कई चुनौतियां भी रहेंगी. लद्दाख और अरुणाचल जैसे ऊंचाई वाले इलाकों में कम तापमान, तेज हवाएं और कम वायुदाब मदरशिप और छोटे ड्रोन्स की उड़ान और बैटरी पर असर डाल सकते हैं.

दूसरी चुनौती दुश्मन की इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता है. सिस्टम जीपीएस के बिना काम कर सकता है, लेकिन तेज सिग्नल जैमिंग से मदरशिप और ड्रोन्स के बीच डेटा लिंक प्रभावित होने का खतरा बना रहेगा.

इसके अलावा सबल-20 आकार में बड़ा प्लेटफॉर्म है. इसलिए दुश्मन के रडार के लिए इसे पहचानना आसान हो सकता है. एंटी-एयरक्राफ्ट हथियार, लेजर और एंटी-ड्रोन सिस्टम भी मदरशिप के लिए खतरा बन सकते हैं.

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