Supreme court On Bihar SIR: बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई ने एक नया मोड़ ले लिया है. चुनाव आयोग की इस पहल को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मतदाता पहचान के लिए दस्तावेजों की संख्या पहले की तुलना में बढ़ी है, जिससे यह संकेत मिलता है कि यह प्रक्रिया मतदाताओं के लिए अधिक अनुकूल और समावेशी बनाई गई है.
कोर्ट ने बुधवार को कहा कि जहां पहले के संक्षिप्त पुनरीक्षण (Summary Revision) में केवल 7 दस्तावेजों को मान्यता दी जाती थी, वहीं अब एसआईआर प्रक्रिया में 11 दस्तावेजों को मान्य किया गया है. इससे यह साबित होता है कि मतदाताओं को अधिक विकल्प उपलब्ध कराए गए हैं.
"दस्तावेजों की अधिकता से समावेश बढ़ा है"
न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं की यह आपत्ति कि आधार को नागरिकता प्रमाण के रूप में नहीं माना गया, वाजिब हो सकती है, लेकिन इसके बावजूद अन्य दस्तावेजों के विकल्प देने से यह प्रक्रिया समावेशी बनती है.
"दस्तावेज ज्यादा, पर कवरेज कम"
वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने याचिकाकर्ताओं की ओर से पक्ष रखते हुए कहा कि दस्तावेजों की संख्या बढ़ने के बावजूद, उनकी वास्तविक उपलब्धता बिहार की आम जनता के लिए सीमित है. उन्होंने पासपोर्ट की उपलब्धता को उदाहरण के रूप में पेश करते हुए कहा कि राज्य की जनसंख्या में केवल 1–2% लोगों के पास ही पासपोर्ट है, और स्थायी निवासी प्रमाण पत्र जैसी जरूरी चीज़ें कई लोगों के पास हैं ही नहीं.
"36 लाख पासपोर्ट धारक भी अहम आंकड़ा"
इस तर्क पर प्रतिक्रिया देते हुए पीठ ने कहा कि राज्य में 36 लाख पासपोर्ट धारकों का आंकड़ा भी कम नहीं है और दस्तावेजों की सूची आमतौर पर विभिन्न सरकारी विभागों के फीडबैक के आधार पर तय की जाती है.
मतदाता सूची में शामिल करना चुनाव आयोग का क्षेत्राधिकार
इससे पहले 12 अगस्त को अदालत ने यह दोहराया था कि मतदाता सूची में किसी नागरिक को शामिल करना या बाहर करना पूरी तरह चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में आता है. साथ ही, आधार और वोटर कार्ड को नागरिकता प्रमाण के रूप में मान्यता न देने के निर्णय को भी जायज ठहराया.
"मूल समस्या विश्वास की कमी"
कोर्ट ने यह भी कहा कि एसआईआर को लेकर जो विवाद उठ रहे हैं, वे काफी हद तक 'विश्वास की कमी' से जुड़े हैं. चुनाव आयोग का दावा है कि बिहार की 7.9 करोड़ की मतदाता आबादी में से लगभग 6.5 करोड़ लोग या उनके माता-पिता पहले से ही 2003 की मतदाता सूची में दर्ज हैं, इसलिए उन्हें नए दस्तावेज़ देने की जरूरत ही नहीं पड़ी.
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