इस्लामाबाद: पाकिस्तान इस समय एक गहरे आर्थिक और राजनीतिक संकट से गुजर रहा है, जिसका सबसे बड़ा संकेत है- विदेशी कंपनियों का देश से तेजी से पलायन. एक के बाद एक नामी अंतरराष्ट्रीय कंपनियां पाकिस्तान को अलविदा कह रही हैं, जिससे देश की अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ा है और बेरोजगारी की दर तेजी से बढ़ रही है.
पिछले कुछ महीनों में प्रॉक्टर एंड गैंबल (P&G), माइक्रोसॉफ्ट, शेल, टेलीनॉर, उबर, कैरीम, फाइजर, बायर, और सनोफी जैसी कई प्रमुख बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने पाकिस्तान से अपने ऑपरेशंस समेट लिए हैं. यह घटनाक्रम न केवल विदेशी निवेशकों की पाकिस्तान पर से घटती विश्वास की कहानी कहता है, बल्कि देश के बिगड़ते कारोबारी माहौल की ओर भी इशारा करता है.
कंपनियों के पलायन के पीछे क्या हैं कारण?
पाकिस्तान में निवेश करने वाली विदेशी कंपनियों के लिए मौजूदा परिस्थितियां अत्यंत प्रतिकूल बन चुकी हैं. देश में राजनीतिक अस्थिरता, नीतियों में लगातार बदलाव, विदेशी मुद्रा पर सख्त नियंत्रण, भ्रष्ट और जटिल कर व्यवस्था, ऊर्जा संकट, और सुरक्षा संबंधी चिंताओं ने मिलकर व्यापारिक माहौल को अस्थिर और जोखिम भरा बना दिया है.
इसके साथ ही, देश की आर्थिक हालत भी बेहद कमजोर हो गई है. पाकिस्तान की लगभग 42 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही है, जिससे बाजार में खरीदारी की क्षमता तेजी से घट गई है. उपभोक्ता मांग में गिरावट के चलते विदेशी कंपनियों के लिए लाभ कमाना मुश्किल हो गया है. जब बड़ी आबादी के पास खर्च करने की क्षमता नहीं हो, तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों को व्यापारिक संभावना कहां से मिलेगी?
सरकार ने जमीन और संसाधनों को गिरवी रखा
जहां एक ओर कंपनियां देश छोड़ रही हैं, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान सरकार अपनी संपत्तियों और प्राकृतिक संसाधनों को विदेशी शक्तियों के सामने गिरवी रख रही है. सरकार एक मजबूर जमींदार की तरह अपनी जमीनें और खनिज संसाधन बाहरी ताकतों के हवाले कर रही है.
ग्वादर पोर्ट और इसके आस-पास के क्षेत्रों में 2000 एकड़ से अधिक भूमि को चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के तहत चीन को 40 वर्षों से अधिक के पट्टे पर सौंप दिया गया है. इस क्षेत्र में चीन को कर संग्रह, परिचालन और सुरक्षा सहित सभी प्रमुख अधिकार दे दिए गए हैं. यह कदम पाकिस्तान की संप्रभुता को आंशिक रूप से गिरवी रखने जैसा है, जिसे देश को अस्तित्व बचाने के लिए उठाना पड़ा.
अब अमेरिका की एंट्री: ट्रंप भी मैदान में
अब इस खेल में अमेरिका भी उतर चुका है. डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका ने पाकिस्तान की खनिज संपदा पर नजरें गड़ा दी हैं. 2025 में पाकिस्तान की सेना के अधीनस्थ संगठन फ्रंटियर वर्क्स ऑर्गनाइजेशन (FWO) और अमेरिका की यूएस स्ट्रैटेजिक मेटल्स के बीच 500 मिलियन डॉलर (करीब 50 करोड़ डॉलर) का एक बड़ा समझौता हुआ है.
इस समझौते के तहत, बलूचिस्तान से प्राप्त दुर्लभ खनिजों के व्यापार की अनुमति अमेरिका को दी गई है. ट्रंप प्रशासन ने चीन को पीछे छोड़ते हुए खनिज संसाधनों के दोहन के क्षेत्र में पाकिस्तान की संपदा तक सीधी पहुंच बना ली है. इससे अमेरिका भी अब पाकिस्तान की भूमि और संसाधनों के दोहन में एक सक्रिय खिलाड़ी बन गया है.
FDI के मामले में पाकिस्तान पिछड़ा
यदि पाकिस्तान की तुलना उसके पड़ोसी देशों से की जाए, तो स्थिति और भी चिंताजनक दिखाई देती है.
इसके मुकाबले, पाकिस्तान महज 683 मिलियन डॉलर के FDI के साथ संघर्ष कर रहा है. यह आंकड़ा साफ दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय निवेशक पाकिस्तान को अब भरोसेमंद निवेश गंतव्य नहीं मानते.
पलायन के प्रभाव: बेरोजगारी और आर्थिक ठहराव
विदेशी कंपनियों के जाने से लाखों लोगों की नौकरियां खतरे में आ गई हैं. पहले से ही संकटग्रस्त अर्थव्यवस्था में यह एक और झटका साबित हो रहा है. साथ ही, स्थानीय उद्योग भी इन कंपनियों के साथ जुड़े सप्लाई चेन नेटवर्क से प्रभावित हुए हैं.
देश के सामने बेरोजगारी, मुद्रास्फीति, और ग्रामीण-शहरी आय में अंतर जैसी समस्याएं पहले से मौजूद थीं, अब विदेशी पूंजी और तकनीकी ज्ञान के नुकसान ने स्थिति और गंभीर कर दी है.
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