Crude Oil Price: अंतरराष्ट्रीय बाजार में बुधवार, 18 जून को कच्चे तेल की कीमतों में नरमी दर्ज की गई. बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच हुए शांति समझौते ने निवेशकों की चिंताओं को कम किया है, जिसके चलते वैश्विक तेल आपूर्ति को लेकर भरोसा बढ़ा और कीमतों में गिरावट देखने को मिली.
मध्य पूर्व में लंबे समय से जारी तनाव के कारण तेल बाजार में अनिश्चितता बनी हुई थी, लेकिन हालिया समझौते के बाद स्थिति में सुधार की उम्मीद जताई जा रही है. इसका असर सिर्फ ऊर्जा बाजार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एशियाई शेयर बाजारों में भी सकारात्मक माहौल देखने को मिला.
क्यों नरम पड़े कच्चे तेल के दाम?
पिछले कुछ समय से मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही थी. विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य के संचालन को लेकर बनी अनिश्चितता ने बाजार में चिंता बढ़ा दी थी.
हालांकि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता होने के बाद निवेशकों का विश्वास लौटा है. बाजार को उम्मीद है कि तेल आपूर्ति में किसी बड़े व्यवधान की संभावना अब कम हो गई है. इसी कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दोनों प्रमुख क्रूड बेंचमार्क में गिरावट दर्ज की गई.
ब्रेंट क्रूड का भाव लगभग 78.35 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता दिखाई दिया. इससे एक दिन पहले यह करीब 78.48 डॉलर प्रति बैरल पर था. वहीं वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) लगभग 76 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर कारोबार करता नजर आया.
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनी रहती है तो तेल की आपूर्ति और मजबूत हो सकती है, जिससे कीमतों पर दबाव बना रह सकता है.
भारत को कैसे होगा फायदा?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है. ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में कमी देश के लिए राहत की खबर मानी जा रही है.
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक नियंत्रित रहती हैं तो महंगाई पर दबाव कम हो सकता है. इससे परिवहन लागत और उत्पादन खर्च में भी कमी आने की संभावना है. साथ ही सरकार के आयात बिल पर भी सकारात्मक असर पड़ सकता है.
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि वैश्विक बाजार में तेल सस्ता बना रहता है तो भविष्य में इसका लाभ आम उपभोक्ताओं तक भी पहुंच सकता है.
होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों है महत्वपूर्ण?
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री ऊर्जा मार्गों में शामिल है. वैश्विक तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है.
जब भी इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है, अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार तुरंत प्रभावित होता है. हालिया संघर्ष के दौरान कई जहाजों की आवाजाही पर असर पड़ा था और तेल कंपनियों ने भी अतिरिक्त सतर्कता बरतनी शुरू कर दी थी.
अब समझौते के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि समुद्री गतिविधियां धीरे-धीरे सामान्य होंगी. हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि पूरी सप्लाई चेन को सामान्य स्थिति में लौटने में कुछ समय लग सकता है.
एशियाई शेयर बाजारों में भी दिखा असर
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट और अमेरिका-ईरान समझौते की खबर ने निवेशकों का भरोसा मजबूत किया है. इसका असर एशिया के कई प्रमुख शेयर बाजारों में तेजी के रूप में देखने को मिला.
निवेशकों का मानना है कि ऊर्जा लागत घटने से कंपनियों के परिचालन खर्च में कमी आ सकती है, जिससे आर्थिक गतिविधियों को समर्थन मिलेगा. भारतीय बाजार के लिए भी इसे सकारात्मक संकेत माना जा रहा है.
आगे किन बातों पर रहेगी नजर?
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता की प्रगति, होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति और वैश्विक तेल आपूर्ति के आंकड़े काफी महत्वपूर्ण रहेंगे. यदि शांति प्रक्रिया आगे बढ़ती है और आपूर्ति सामान्य बनी रहती है, तो कच्चे तेल की कीमतों में और स्थिरता देखने को मिल सकती है.
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