सनातन की पहली शक्ति सत्य... भारत 24 के मंच पर बोले जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी ज्ञानानंद तीर्थ

बनारस: भारत 24 के खास कार्यक्रम 'Viksit Uttar Pradesh Kashi Samvad 2026' में जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी ज्ञानानंद तीर्थ ने शिरकत की. इस दौरान जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी ज्ञानानंद तीर्थ ने सनातन धर्म, गीता सहित कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई.

Bharat 24 Viksit Uttar Pradesh Kashi Samvad 2026 Jagatguru Shankaracharya Swami Gyananand Tirtha
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बनारस: भारत 24 के खास कार्यक्रम 'Viksit Uttar Pradesh Kashi Samvad 2026' में जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी ज्ञानानंद तीर्थ ने शिरकत की. इस दौरान जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी ज्ञानानंद तीर्थ ने सनातन धर्म, गीता सहित कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई. 

सनातन धर्म की सबसे बड़ी शक्ति क्या है? 

सनातन की सबसे पहली शक्ति सत्य है. सत्यम त्रिकाला वाद्यम. सत्य का तीनों काल में कभी अभाव नहीं होता है. कभी अभाव हुआ नहीं है और कभी अभाव होगा नहीं. यह सत्य सनातन है. 

सनातन से जुड़ने की जरूरत है?

युवाओं को संस्कार के साथ संस्कृति की ओर बढ़ना चाहिए. जबकि युवाओं में भौतिक दृश्य और प्रदर्शन बढ़ रहा है. उनके अंदर शास्त्रों का दर्शन बढ़ाना चाहिए. 

क्या आधुनिकता और सनातन एक साथ चल सकते हैं?

मिठास वृक्ष से या वृक्ष के पत्ते से, तने से, डाली से नहीं मिलती. वह तो फल से मिलती है. इसलिए वृक्ष रूप में तो दृश्य सन्मुख है. किंतु जब तक वह फल के रूप में परिपक्व नहीं होता है तब तक उसका रसास्वादन प्राप्त नहीं किया जा सकता. इसलिए युवाओं को संस्कार के साथ संस्कृति की ओर बढ़ना चाहिए. भौतिकता तो भौतिक विद्या केवल इस लोक के लिए है. इस लोक में भौतिक विद्या का लाभ लिया जा सकता है. भौतिक विद्या से धन कमाया जा सकता है. किंतु भौतिक विद्या से आध्यात्म कभी प्राप्त हुआ नहीं है. हो नहीं रहा है और होगा भी नहीं. इसलिए उनको आवश्यक है मध्यात्म दीप तीसता तमोंधम उनको आध्यात्मिक दीपक जलाना पड़ेगा. विद्यामित्रम प्रकाश विद्यार्थियों का केवल एक मित्र है. उसका नाम विद्या है. युवाओं को विद्या भौतिक के साथ ब्रह्म विद्या अध्यात्म विद्या को जोड़कर आगे बढ़ना चाहिए. विश्व में वो सफल होंगे. 

भारत को विश्व गुरु बनाना है?

भारत हमारा विश्व गुरु पहले से ही है. बस दुनिया के लोगों को विश्व गुरु को नमन करने की प्रणाली आ जानी चाहिए. भारत विश्व गुरु पहले अनादिकाल से ही है. अनाद काल से भारत विश्व गुरु है. 

सनातन धर्म को लेकर सबसे बड़ी जो गलतफहमी है लोगों में है और उसको दूर करने की सख्त और जल्दी जरूरत है?

आवश्यकता संस्कार से लेकर के है. वह भी गर्भाधान के पूर्व से. अगर हमारा भारत की धरती में गर्भाधान और संस्कार सुरक्षित और उनकी बढ़ती रहे तो विश्व में सर्वोपरि है. एक दृश्य जी आपने सुना होगा. हमारे यहां भोजन करने से पहले हाथ मुंह धोने की पद्धति है. पर आज के समय में हाथ मुंह धोने की पद्धति कमजोर हो रही है. और हाथ और मुंह कागज से पोछने की हो रही है. हमारी शुद्धि तो जल से होती है. जल कूटस्थ और तटस्थ का साक्षी है. दिति ने यह चूक की थी. दिति ने यह चूक की थी. उस चूक का परिणाम भयंकर हुआ. हाथ वो नहीं धोए दति निज सैया पर जा सोए यही विधि दति व्रत खंडित कीन्हा इंद्र गर्भ वास सूक्ष्म ब्रज लीन्हा इंद्र ने सूक्ष्म वज्र धारण करके दिति के गर्भ में प्रवेश कर गया था और दिति के गर्भ के सात टुकड़े कर दिए थे. लेकिन वह चैतन्य रहे. पूजा का प्रभाव, संध्या की महत्ता किंतु इंद्र ने उन सात के फिर सात-सात टुकड़े कर दिए जो 49 पवन कहलाए गए. आज हमारी पद्धति पवित्रता की बहुत आवश्यक है. इसलिए सत्य के साथ पवित्र जुड़ा हुआ है. सत्य से आगे बढ़ो पवित्रता की ओर. इसलिए भगवती भागीरथी गंगा यहां वाराणसी की धरती पर मुक्ति देती है. मुक्ति इसलिए मुक्ति के लोग गंगा की शरण में आते हैं. हर हर गंगे हर हर गंगे हर हर गंगे काशी विश्वनाथ गंगे स्मरण करते हैं. 

गीता का एक ऐसा संदेश जो हर किसी को अपने जीवन में आत्मसात करना चाहिए तो आप क्या बताएंगे? 

जब कोई घटना घटित होती है उस घटना को इतिहास कहा जाता है. लेकिन उसी घटना से जब लोक जगत के लिए शिक्षा दी जाती है तो उसका नाम पुराण होता है. इतिहास घटना प्रधान होता है और पुराण शिक्षा प्रधान होता है. इसलिए कहीं-कहीं इतिहास की जरूरत है. लेकिन पूरी दुनिया को अगर भारत की धर से चाहिए तो इतिहास के साथ पुराण की जरूरत है. वो केवल घटना नहीं है. महाभारत केवल घटना ही घटना थी. लेकिन गीता वो शिक्षा प्रधान रही. महाभारत केवल केवल घटनाएं थी. लेकिन घटना से शिक्षा जो दी जाती है वो केवल इतिहास होता है. लेकिन उसी घटना से लोक जगत को जब शिक्षा दी जाती है और उससे लोग संस्कार ग्रहण करते हैं तो उसी का नाम शास्त्र होता है. इसलिए गीता शास्त्रमदम ये गीता शास्त्र है और इसे श्रवण पद्धति से वर्णन पद्धति से समस्त मानवों को अपनाना चाहिए. शास्त्रे सुयानी सुनिश्चितो नरणाम यह शास्त्र मनुष्यों के कल्याण के लिए हैं. इसलिए मनुष्यों को इसमें नाम नहीं लिया वर्ग नहीं लिया आश्रम नहीं लिया मनुष्य नाम ये समस्त मनुष्यों के लिए है. चाहे वो भारत का मनुष्य हो चाहे वो विश्व का मनुष्य हो. शास्त्र की जरूरत मनुष्य के लिए है और उसी से मनुष्यता उसको प्राप्त होती है. 

स्कूलों में गीता का श्लोक भी पढ़ाना शुरू किया जा रहा है. श्लोक का पाठ पढ़ाया जा रहा है. तो आप इसे कैसे देखते हैं?

भारत में पहले संस्कार और शिक्षा की विधि ही गुरुकुल थी. यदि आज भी भारत में सर्वत्र गुरुकुल को बढ़ाया जाए तो निश्चित है हमारी शिक्षा की पद्धति संस्कारित रहेगी. इसलिए शिक्षा गुरुकुल की पद्धति की बहुत ही श्रेष्ठ है. जिसमें प्रारंभ से उठने, बैठने, चलने, फिरने, सोने, जागने और यहां तक कि माता-पिता, आचार्य और राष्ट्र और धर्म की बात जानी जाती है. 

तो क्या सरकार को इस पर और काम करना चाहिए?

बिल्कुल अवश्य पूरे पूरे भारत में तो गुरुकुल प्रधान रूप से शिक्षण के संस्थान होने चाहिए. अगर भारत की धरती में गुरुकुल की शिक्षा बढ़ेगी तो निश्चित है भारत की महिमा पुनः जो पहले हमारी ऋषि परंपरा में थी आज बढ़ती को अवश्य प्राप्त होगी इसके लिए सरकार को भी और आप सब लोगों को हाथ मिलाकर के आगे बढ़ना चाहिए. 

बिल्कुल अच्छा धर्म और राष्ट्र इन दोनों का संबंध आप आपस में कैसे देखते?

धर्म शब्द धीधारण धातु से बनता है. उसका अर्थ होता है धरती धर्मा. यह पृथ्वी टिकी हुई है. समुद्र मंथन में जब मंद्राचल नहीं ठहर रहा था तो भगवान को कछुआ बनना पड़ा था. तो धर्म धारण करने की पद्धति है धते लोका स धर्मा जिससे लोक जगत के लोग उसे धारण कर पाएं और धते यासा धर्मा जिसको सज्जन और साधु लोग धारण करते हैं उसका नाम धर्म होता है. इसलिए धर्म और राष्ट्र अलग-अलग नहीं है. ये एक दूसरे के साथ जुड़कर के चलते हैं. जिस प्रकार से ये दो कदम एक आगे पीछे दाया बायां होकर के घटता और बढ़ता है. उसी प्रकार से हमारा धर्म और राष्ट्र है. धर्म और राष्ट्र जिस प्रकार से नदी के दो किनारे होते हैं. दोनों किनारों में नदी सुरक्षित तभी रहती है जब उसके दोनों किनारे होते हैं तो प्रवाह निश्चित ही सागर तक पहुंचता है. ऐसे ही हमारा धर्म और राष्ट्र ये दो किनारे हैं. इसके बीच में समाज सुरक्षित है और प्रवाहित है. और इसी रास्ते पर जो चलेगा वो आगे बढ़ेगा.

बदलते काशी को आप कैसे देखते हैं?

काशी की धरती पर आने के लिए सब पवित्रता प्राप्त करने के लिए, मुक्ति प्राप्त करने के लिए, ज्ञान प्राप्त करने के लिए आते हैं. इसलिए उनको सबसे पहले आने वाले को भी चाहिए कि हमारी आचार पद्धति को और आचरण को पवित्र रखें. हमारे आचरण अगर पवित्र हैं गुरु आत्मताम शास्ता जो आध्यात्मिक जन हैं उनके आचार्य और शासक तो हमारे गुरु होते हैं शास्त्र होते हैं इसलिए आवश्यकता है काशी की धरती में जो लोग आ रहे हैं उनको पहले पहले चाहिए कि वो काशी की धरती की पवित्रता को ग्रहण करना चाहते हैं तो यहां मलिनता नहीं छोड़े वो मलिनता नहीं छोड़े और निश्चित है वो वापस जाते समय पवित्रता को कई गुना लेके जाएंगे. 

काशी में पर्यटकों को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

हमारे शास्त्रों ने ये चार बात कही है. धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष. तो धर्म और मोक्ष तो चाहिए चाहिए. पर बीच में यह अर्थ और जो काम है इसलिए अर्थ की अगर बढ़ती हो तो उसे धर्म की ओर मोड़ लो और काम की अगर बढ़ती है तो मोक्ष की ओर मोड़ लो. अगर यह धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ये केवल अलग-अलग अपनी लाइन लेकर के दिशा लेकर के चलेंगे तो वो शांति उनको प्राप्त नहीं हो सकती है. अर्थ को मोड़ लो धर्म की ओर और काम और वासना को मोड़ लो मोक्ष की ओर. तो निश्चित पूरी दुनिया वाराणसी की इस काशी की धरती का लाभ निरंतर प्राप्त करती रहेगी. 

भारत के लिए कि भारत युवाओं का देश है. अआप उन्हें क्या संदेश देना चाहेंगे? 

भारत सनातन की धरती अनादि काल से है. हमारे शास्त्र कहते हैं आदि एक नारायण नामा जिनके नाभि कमल एक जामा कमल माही ब्रह्मा उपजाए ब्रह्मा के सनकादिका है. सबसे पहले जल ही जल था तब जल में भगवान विष्णु ने शेष की सैया पर विश्राम किया और उनकी नाभि से कमल निकला कमल बोल तो दो ना दर्शकों से याद दिलाना चाहेंगे भगवान विष्णु की नाभि से कमल निकला कमल से ब्रह्मा जी निकले इस समय ये कमल का हमारे कमल पर आसीन है इसलिए चाहे वो कमल चरण कमल हो हस्त कमल हो मुख कमल हो नेत्र कमल हो और चाहे पूरी दुनिया में छाने वाला आज हमारा पुष्प कमल हो. कमल तो अनादि काल से रहा और अनादिकाल तक रहेगा. यह कमल का अपना प्रभाव है. वो घटने वाला नहीं है.

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