वॉशिंगटन/नई दिल्ली: भारत को अमेरिका की ओर से एक बार फिर कूटनीतिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है. इस बार अमेरिका की चेतावनी सीधे तौर पर भारत के आर्थिक हितों से जुड़ी है. यदि डोनाल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच अलास्का में होने वाली बैठक से कोई ठोस समाधान नहीं निकलता है, तो भारत पर लगे सेकेंडरी टैरिफ और अधिक कड़े किए जा सकते हैं.
अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने अपने हालिया बयान में यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि रूस-यूक्रेन युद्ध पर कोई समझौता नहीं हुआ, तो भारत को आर्थिक सजा भुगतनी पड़ सकती है. इस बयान ने भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में फिर से तनाव पैदा कर दिया है.
भारत को बनाया जा रहा है दबाव का जरिया?
अमेरिकी प्रशासन ने स्पष्ट रूप से कहा है कि भारत पर लगाए गए टैरिफ यूक्रेन युद्ध को लेकर रूस पर दबाव बनाने की एक रणनीति का हिस्सा हैं. स्कॉट बेसेंट ने ब्लूमबर्ग टीवी को दिए एक साक्षात्कार में कहा, "हमने रूसी तेल खरीदने को लेकर भारत पर सेकेंडरी टैरिफ लगाए हैं. अगर परिस्थितियां नहीं सुधरीं, तो प्रतिबंध और भी सख्त किए जा सकते हैं."
यह बयान ऐसे समय में आया है जब दुनिया की निगाहें 15 अगस्त को अलास्का में होने वाली ट्रंप-पुतिन बैठक पर टिकी हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि यह धमकी सीधे तौर पर रूस पर दबाव बनाने के लिए भारत का इस्तेमाल करने की एक रणनीति है.
भारत ने हाल के वर्षों में रूस से ऊर्जा आयात को बढ़ावा दिया है, खासकर तब जब पश्चिमी देशों ने रूस पर कई प्रतिबंध लगाए हैं. अमेरिका को यह कदम नागवार गुजर रहा है और अब वह भारत को एक "मध्यम शक्ति" के रूप में बीच में लाकर रूस को झुकाने की कोशिश कर रहा है.
ट्रंप की नीति: कूटनीति के नाम पर धमकी
डोनाल्ड ट्रंप की राजनीतिक शैली हमेशा से ही सीधी, आक्रामक और कई बार विवादास्पद रही है. चाहे वह व्यापारिक समझौते हों या अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक वार्ताएं, ट्रंप अपने “अमेरिका फर्स्ट” दृष्टिकोण को लागू करने के लिए अक्सर धमकी का सहारा लेते हैं.
भारत पर टैरिफ बढ़ाना इसी रणनीति का हिस्सा लगता है. ट्रंप पहले ही इस महीने की शुरुआत में भारत पर 50% तक टैरिफ बढ़ा चुके हैं. यह फैसला अमेरिका द्वारा रूस से ऊर्जा आयात को रोकने की वैश्विक कोशिश के तहत लिया गया एक कड़ा कदम था.
अब, जब रूस-यूक्रेन युद्ध का समाधान तलाशने के लिए अमेरिका और रूस के शीर्ष नेता आमने-सामने होने जा रहे हैं, ट्रंप भारत को चेतावनी देकर मूल्य चुकाने की भाषा अपना रहे हैं.
क्या होगी अलास्का बैठक की दिशा?
15 अगस्त 2025, शुक्रवार को होने वाली ट्रंप और पुतिन की बैठक केवल रूस और यूक्रेन के भविष्य को ही नहीं, बल्कि वैश्विक कूटनीति, तेल आपूर्ति, और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को भी प्रभावित कर सकती है.
रूस और यूक्रेन के बीच तीन साल से अधिक समय से चल रहे युद्ध को लेकर उम्मीद की किरण तभी जगेगी जब दोनों नेता सीजफायर या युद्धविराम पर किसी समझौते तक पहुंचें. हालांकि, खुद ट्रंप ने संकेत दिया है कि यह आसान नहीं होगा.
उन्होंने कहा है कि पुतिन के साथ मुलाकात के बाद भी यह मुमकिन है कि वह रूस को यूक्रेन में युद्धविराम के लिए तैयार न कर पाएं. इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि बातचीत के दौरान यूक्रेन के कुछ हिस्सों पर रूस के दावों को स्वीकारने की संभावना पर भी चर्चा हो सकती है.
यह बयान यूक्रेन और यूरोपीय नेताओं के लिए गंभीर चिंता का कारण बन चुका है, क्योंकि इससे यूक्रेन की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर समझौता हो सकता है.
भारत को क्यों बनाया जा रहा है निशाना?
भारत पिछले कुछ वर्षों में अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए रूस से कच्चे तेल का आयात करता रहा है. जब पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए, भारत ने वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत के रूप में रूस को चुना. यह कदम अमेरिका को अखर रहा है.
हालांकि भारत बार-बार स्पष्ट कर चुका है कि उसकी विदेश नीति स्वतंत्र और तटस्थ है और वह किसी भी वैश्विक संघर्ष में किसी एक पक्ष के साथ खड़ा नहीं होता.
लेकिन अमेरिका की नजर में भारत का यह संतुलन रूस के पक्ष में झुकाव के रूप में देखा जा रहा है. और इसी के चलते अब अमेरिका भारत पर सेकेंडरी प्रतिबंधों के जरिए दबाव बनाने की रणनीति अपना रहा है.
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