हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड (HSL), जो रक्षा मंत्रालय के अधीन मिनीरत्न श्रेणी-I रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम (DPSU) है, ने भारतीय नौसेना को अपना दूसरा डाइविंग सपोर्ट वेसल (DSV) 'निपुण' सौंप दिया है. उद्योग जगत के जानकारों का मानना है कि यह उपलब्धि केवल एक जहाज की डिलीवरी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शिपयार्ड की परिचालन क्षमता और जटिल नौसैनिक प्लेटफॉर्म तैयार करने की उसकी परिपक्व क्षमता का संकेत भी है. इस पोत का डिजाइन और निर्माण इंडियन रजिस्टर ऑफ शिपिंग (IRS) के वर्गीकरण नियमों के अनुरूप किया गया है.
'निपुण' की डिलीवरी ऐसे समय हुई है, जब ठीक एक वर्ष पहले HSL ने इसी श्रेणी का पहला पोत INS निस्तार भारतीय नौसेना को सौंपा था. रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार दूसरे वर्ष इस तरह की डिलीवरी यह दर्शाती है कि HSL अब एक स्थिर और दोहराई जा सकने वाली उत्पादन प्रणाली विकसित कर चुका है, न कि केवल एक बार की सफलता हासिल की है. स्वीकृति दस्तावेज (D448) पर पश्चिमी नौसैनिक कमान के चीफ स्टाफ ऑफिसर (टेक्निकल) और D448 समिति के अध्यक्ष रियर एडमिरल अरविंद रावल, VSM तथा HSL के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक रियर एडमिरल चंद्रशेखरन राघुराम, VSM (सेवानिवृत्त) ने हस्ताक्षर किए.
नाम का महत्व
संस्कृत शब्द 'निपुण' का अर्थ है किसी विशेष क्षेत्र में दक्ष, सक्षम और पूरी तरह पारंगत व्यक्ति. अपने नाम के अनुरूप यह पोत भी अत्यधिक विशेषीकृत प्लेटफॉर्म है, जिसे विशेष रूप से गहरे समुद्र में डाइविंग अभियानों और समुद्री बचाव अभियानों के लिए तैयार किया गया है.
आंकड़ों में 'निपुण'
निपुण की लंबाई 118 मीटर है और इसका कुल विस्थापन 8,560 टन से अधिक है. इस पोत में 80 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है, जिसका उल्लेख HSL पहले भी इस परियोजना से जुड़े अपने सार्वजनिक बयानों में करता रहा है.
इस पोत में डायनेमिक पोजिशनिंग, सैचुरेशन डाइविंग, पनडुब्बी बचाव (Submarine Rescue) और डीप-सी इंटरवेंशन सिस्टम लगाए गए हैं. इससे यह केवल एक कार्य के लिए बनाया गया जहाज नहीं, बल्कि पानी के भीतर होने वाले विभिन्न अभियानों के लिए पूरी तरह एकीकृत संचालन मंच बन जाता है.
इस जहाज में अत्याधुनिक डाइविंग उपकरण लगाए गए हैं, जिनकी मदद से गहरे समुद्र में सैचुरेशन डाइविंग की जा सकती है. इसके अलावा डाइविंग अभियानों के लिए साइड डाइविंग स्टेज भी उपलब्ध कराया गया है.
जहाज में लगे रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल (ROV) इसकी क्षमता को और बढ़ाते हैं. इनकी मदद से डाइवर मॉनिटरिंग और गहरे समुद्र में बचाव एवं सल्वेज ऑपरेशन किए जा सकते हैं. इसके साथ ही यह पोत डीप सबमर्जेंस रेस्क्यू वेसल (DSRV) के लिए 'मदर शिप' के रूप में भी काम करेगा और किसी पनडुब्बी आपात स्थिति में उसमें फंसे कर्मियों को सुरक्षित निकालने में सहायता करेगा.
स्वदेशीकरण की दिशा में बड़ी उपलब्धि
HSL लंबे समय तक मुख्य रूप से व्यावसायिक जहाजों की मरम्मत और छोटे नौसैनिक अनुबंधों से जुड़ा रहा है. ऐसे में एक वर्ष के भीतर लगातार दो अत्याधुनिक डाइविंग सपोर्ट वेसल तैयार करना उसके लिए तकनीकी क्षमता में बड़ा बदलाव माना जा रहा है.
HSL पहले ही जानकारी दे चुका है कि इस परियोजना में उसकी सप्लाई चेन से जुड़े 120 सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSMEs) शामिल रहे. विशेषज्ञों का मानना है कि इतने बड़े और विविध आपूर्तिकर्ता नेटवर्क के साथ समान गुणवत्ता और प्रमाणन मानकों को बनाए रखना, केवल एक जहाज बनाने से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण कार्य होता है.
व्यावसायिक लाभ से कहीं अधिक रणनीतिक महत्व
यह पोत केवल HSL के लिए व्यावसायिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि भारत की सामरिक क्षमता को भी मजबूत करता है. दुनिया में बहुत कम देशों के पास अपनी स्वयं की पनडुब्बी बचाव क्षमता मौजूद है.
भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के. त्रिपाठी पहले ही कह चुके हैं कि DSV श्रेणी के ये पोत भारत को क्षेत्रीय नौसेनाओं के लिए "प्राथमिक पनडुब्बी बचाव साझेदार" (Preferred Submarine Rescue Partner) बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे. भविष्य में यह भारत की रक्षा कूटनीति को भी मजबूती दे सकता है और रक्षा निर्यात के नए अवसर पैदा कर सकता है.
भविष्य की परियोजनाओं के लिए मजबूत दावेदारी
HSL लंबे समय से पारंपरिक अनुबंधों से आगे बढ़कर विशेष नौसैनिक परियोजनाओं में अपनी भूमिका मजबूत करने की कोशिश कर रहा है. ऐसे में दो जटिल डाइविंग सपोर्ट वेसल को लगभग एक-एक वर्ष के अंतराल पर सफलतापूर्वक सौंपना भविष्य की उच्च तकनीक और अधिक मूल्य वाली नौसैनिक परियोजनाओं के लिए उसकी दावेदारी को मजबूत बनाता है. इससे HSL को भारत के भीतर ही नहीं, बल्कि मित्र देशों की नौसेनाओं के लिए भी ऐसे विशेष प्लेटफॉर्म तैयार करने के अवसर मिल सकते हैं.
आठ दशक से अधिक का अनुभव
हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड रक्षा मंत्रालय के अधीन एक मिनीरत्न रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम है, जिसका मुख्यालय विशाखापत्तनम में स्थित है. कंपनी को जहाज निर्माण के क्षेत्र में आठ दशकों से अधिक का अनुभव है.
डाइविंग सपोर्ट वेसल परियोजना के अलावा HSL पनडुब्बियों के निर्माण और उनके रिफिट कार्य भी कर चुका है. पिछले एक वर्ष से कुछ अधिक समय में दूसरी जटिल रणनीतिक नौसैनिक परियोजना की सफल डिलीवरी ने यह साबित किया है कि HSL भारत की सबसे चुनौतीपूर्ण नौसैनिक जहाज निर्माण आवश्यकताओं को समय पर पूरा करने में सक्षम शिपयार्ड के रूप में अपनी मजबूत पहचान बना चुका है.
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