बीजिंग/बैंकॉक: थाईलैंड ने हाल ही में 40 उइगर मुस्लिमों को चीन वापस भेज दिया, जो लगभग एक दशक से थाईलैंड में हिरासत में थे. इस कदम पर अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र सहित कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने विरोध दर्ज कराया है. उनका कहना है कि इन लोगों को चीन में उत्पीड़न और मानवाधिकार हनन का सामना करना पड़ सकता है.
घटना की पृष्ठभूमि
2014 में, चीन के पश्चिमी शिनजियांग प्रांत से भागकर ये उइगर थाईलैंड पहुंचे थे. वहां उन्हें गिरफ्तार कर हिरासत में रखा गया था. पिछले कुछ वर्षों से अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं थाईलैंड से इन लोगों को किसी सुरक्षित स्थान पर भेजने की अपील कर रही थीं, लेकिन चीन लगातार उनकी वापसी की मांग कर रहा था. आखिरकार, थाईलैंड ने चीन के अनुरोध पर इन नागरिकों को प्रत्यर्पित कर दिया.
अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र की प्रतिक्रिया
अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इस फैसले की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि चीन में उइगर समुदाय के साथ गंभीर अत्याचार किए जाते हैं. उन्होंने कहा कि निर्वासित किए गए लोगों को चीन में जबरन श्रम, यातना और कानूनी प्रक्रिया के अभाव जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है.
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर तुर्क ने भी इस फैसले को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की. उन्होंने कहा कि थाईलैंड ने ऐसे अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन किया है, जो शरणार्थियों को उन स्थानों पर भेजने से रोकते हैं, जहां उनके साथ दुर्व्यवहार या अत्याचार होने की आशंका हो. उन्होंने थाईलैंड से अपनी नीति पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया.
चीन का रुख
चीन सरकार ने इस मुद्दे पर बयान जारी करते हुए कहा कि इन व्यक्तियों की वापसी कानूनन सही है और उन्हें चीनी नागरिकों के रूप में उचित अधिकार प्राप्त होंगे. चीन ने उइगरों के खिलाफ उत्पीड़न के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि पश्चिमी देश इस मुद्दे का उपयोग चीन की छवि खराब करने के लिए कर रहे हैं.
वैश्विक प्रतिक्रिया
थाईलैंड के इस निर्णय की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना हो रही है, और यह भविष्य में उसकी विदेश नीति पर प्रभाव डाल सकता है. अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र ने संकेत दिए हैं कि वे इस मुद्दे पर थाईलैंड से जवाब मांग सकते हैं. वहीं, चीन के लिए यह एक कूटनीतिक जीत मानी जा रही है, क्योंकि उसने एक बार फिर अपनी विदेश नीति को प्रभावी तरीके से लागू किया है.
इस घटना ने एक बार फिर उइगर मुस्लिमों के हालात और उनके मानवाधिकारों की सुरक्षा को लेकर वैश्विक बहस को तेज कर दिया है.
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