रूस और यूक्रेन के बीच जारी संघर्ष अब अपने चौथे वर्ष में प्रवेश करने वाला है, लेकिन हालात अब भी तनावपूर्ण हैं. ऐसे में 15 अगस्त को होने वाली अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की प्रस्तावित मुलाकात को लेकर दुनियाभर की निगाहें इस शिखर वार्ता पर टिकी हैं. यूरोपीय नेताओं का मानना है कि इस बैठक से शांति बहाली की नई उम्मीदें जन्म ले सकती हैं, लेकिन साथ ही यह आशंका भी है कि कहीं इस समझौते की कीमत यूक्रेन को अपनी जमीन खोकर न चुकानी पड़े.
यूरोप और यूक्रेन दोनों का स्पष्ट रुख है कि किसी भी तरह की शांति प्रक्रिया में यूक्रेन की मौजूदगी अनिवार्य है. नाटो के महासचिव मार्क रुटे ने भी CBS न्यूज़ को दिए इंटरव्यू में कहा कि अगर ट्रंप और पुतिन की मुलाकात सफल रहती है, तो यूक्रेन को युद्धविराम और सुरक्षा गारंटी से जुड़े फैसलों में शामिल करना आवश्यक है. उन्होंने इस वार्ता को अमेरिका और रूस दोनों के लिए एक “बड़ी परीक्षा” बताया और यह भी कहा कि शुक्रवार को यह साफ हो जाएगा कि पुतिन शांति प्रक्रिया को लेकर कितने गंभीर हैं.
वार्ता से पहले बढ़ा तनाव
जहां एक तरफ बातचीत की तैयारियां चल रही हैं, वहीं दूसरी ओर रूस ने जापोरिझिया क्षेत्र पर हवाई हमले कर तनाव और बढ़ा दिया है. यूक्रेनी विदेश मंत्रालय के अनुसार, इन हमलों में कम से कम 12 लोग घायल हुए हैं और निशाना बने रिहायशी इलाकों, बस स्टेशन और एक क्लिनिक को भारी नुकसान पहुंचा है. यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से रूस पर और सख्त प्रतिबंध लगाने और दबाव बढ़ाने की अपील की है.
ट्रंप के बयान से बढ़ी बेचैनी
8 अगस्त को डोनाल्ड ट्रंप ने पुतिन से होने वाली मुलाकात की पुष्टि करते हुए कहा था कि यूक्रेन को कई चीजों के लिए तैयार रहना होगा. उन्होंने जमीन की अदला-बदली का सुझाव भी दिया, जिसे लेकर यूक्रेनी राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने कड़ा विरोध जताया. ज़ेलेंस्की का कहना है कि यूक्रेन का संविधान देश की हर इंच जमीन की रक्षा करता है, और रूस को एक इंच भी नहीं दी जाएगी. यूरोपीय देशों ने भी ज़ेलेंस्की के इस रुख का समर्थन करते हुए कहा है कि यूक्रेन की संप्रभुता और सुरक्षा को दरकिनार कर किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार्य नहीं होगा.
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