Why Medicine Prices Are Rising In India: मिडिल ईस्ट में जारी तनाव का असर अब भारत के हेल्थकेयर सेक्टर पर भी दिखाई देने लगा है. ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच बढ़ता सैन्य तनाव न केवल वैश्विक राजनीति को प्रभावित कर रहा है, बल्कि इसका प्रभाव दवाओं की आपूर्ति, उत्पादन लागत और कीमतों पर भी पड़ने लगा है. दवा कंपनियां बढ़ती लागत और सप्लाई चेन में रुकावटों को लेकर चिंतित हैं, और अगर यह संकट लंबा चला, तो इसका सीधा असर मरीजों तक पहुंच सकता है.
सप्लाई चेन में रुकावट और बढ़ती कीमतें
भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की निर्भरता बड़ी मात्रा में आयातित कच्चे माल और एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (APIs) पर है. हाल के दिनों में कच्चे माल की कीमतों में अचानक 200 से 300 फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई है. इससे दवाओं की उत्पादन लागत में भारी उछाल आया है. पैकिंग और शिपिंग की लागत भी बढ़ने से कंपनियों के लिए उत्पादन बनाए रखना मुश्किल हो रहा है. अगर यही स्थिति रही, तो दवाओं की सप्लाई में देरी, कमी और कीमतों में वृद्धि जैसी समस्याएं आम हो सकती हैं.
किस तरह की दवाएं प्रभावित हो सकती हैं?
फार्मा इंडस्ट्री के विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट का सबसे ज्यादा असर उन दवाओं पर पड़ेगा, जो रोजमर्रा के इलाज में उपयोग होती हैं. बुखार, संक्रमण, डायबिटीज और दिल की बीमारियों के इलाज में काम आने वाली दवाएं इस संकट के घेरे में आ सकती हैं. उदाहरण के लिए, पैरासिटामोल जैसी सामान्य दवा की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे यह दवा न केवल महंगी हो सकती है, बल्कि कमी भी हो सकती है. इसके अलावा, एंटीबायोटिक्स, डायबिटीज और हृदय रोग की दवाओं की आपूर्ति भी प्रभावित हो सकती है. इसका सीधा असर मरीजों पर पड़ेगा, जिनके लिए इन दवाओं का नियमित रूप से उपयोग आवश्यक है.
क्यों बढ़ रही हैं दवाओं की कीमतें?
इस बढ़ोतरी की वजह मुख्य रूप से कच्चे माल की कीमतों में उछाल है. फार्मा इंडस्ट्री से जुड़ी कंपनियों के अनुसार, एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स, सॉल्वेंट्स और अन्य महत्वपूर्ण पदार्थों की कीमतें सिर्फ 15 दिनों के अंदर 200 से 300 फीसदी तक बढ़ गई हैं. उदाहरण के तौर पर, पैरासिटामोल की उत्पादन लागत करीब 250 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 450 रुपये प्रति किलो हो गई है. यह बढ़ती कीमतें कंपनियों के लिए बड़ी चुनौती बन गई हैं, खासकर उन दवाओं के लिए जो सरकारी प्राइस कंट्रोल के तहत आती हैं. इन दवाओं की कीमत पहले से निर्धारित होती है, और कंपनियां लागत बढ़ने के बावजूद इनकी कीमतें नहीं बढ़ा सकतीं, जिससे उत्पादन जारी रखना मुश्किल हो जाता है.
पैकेजिंग की लागत में भी वृद्धि
सिर्फ कच्चे माल की कीमत ही नहीं, बल्कि दवाओं की पैकिंग में इस्तेमाल होने वाली सामग्री जैसे एल्यूमिनियम फॉइल, प्लास्टिक और ग्लास कंटेनरों की कीमतें भी बढ़ गई हैं. ये पैकिंग सामग्री दवाओं की सुरक्षा और स्टोरेज के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं. इसलिए, इनके महंगे होने से दवाओं की कुल लागत में इजाफा हो रहा है, और कंपनियों के लिए इस स्थिति को संभालना और भी कठिन हो रहा है.
शिपिंग रूट्स में रुकावट और सप्लाई चेन पर असर
मध्य पूर्व में चल रहे तनाव के कारण शिपिंग रूट्स प्रभावित हुए हैं, जिसके कारण ट्रांसपोर्ट महंगा हो गया है और सप्लाई चेन में धीमापन आया है. आमतौर पर फार्मा कंपनियां 3 से 6 महीने का स्टॉक रखती हैं, लेकिन मौजूदा स्थिति में अनिश्चितता बढ़ गई है, और कंपनियां अब लंबी अवधि के लिए सप्लाई करने के लिए तैयार नहीं हैं. इसका सबसे ज्यादा असर छोटे और मझोले फार्मा निर्माताओं पर पड़ा है, जो कम मार्जिन पर काम करते हैं और सस्ती दवाओं की बड़ी मात्रा की सप्लाई करते हैं. इस बढ़ती लागत के कारण कई कंपनियां दवाओं का उत्पादन घटाने या कुछ दवाओं का उत्पादन बंद करने पर विचार कर रही हैं.
इस बढ़ते संकट का अंततः सबसे बड़ा असर मरीजों पर ही पड़ेगा. दवाओं की कमी, देरी और महंगी कीमतें स्वास्थ्य सेवाओं को अप्रभावी बना सकती हैं. मरीजों को दवाएं बदलनी पड़ सकती हैं, जो उनकी इलाज प्रक्रिया में विघ्न डाल सकती हैं. इसके अलावा, महंगे इलाज के कारण गरीब और मिडिल क्लास परिवारों को अपनी स्वास्थ्य सेवाओं में कमी करनी पड़ सकती है, जिससे उनका इलाज सही समय पर नहीं हो पाएगा.
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