क्या है अमेरिका की पुरानी विदेश नीति 'डोनरो डॉक्ट्रिन'? वेनेजुएला के बाद किन देशों में होगा तख्तापलट?

    वॉशिंगटन में हालिया घटनाक्रम ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है.

    What is Americas old foreign policy Donoro Doctrine
    प्रतिकात्मक तस्वीर/ ANI

    वॉशिंगटन में हालिया घटनाक्रम ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है. वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उनकी पत्नी के साथ गिरफ्तार किए जाने और अमेरिका लाकर मुकदमा चलाने की कार्रवाई के बाद यह सवाल तेजी से उठने लगा है कि क्या अमेरिका अब खुलकर सत्ता परिवर्तन की नीति अपना रहा है. जिस देश ने दशकों तक लोकतंत्र, मानवाधिकार और संप्रभुता की दुहाई दी, वही अब एक निर्वाचित राष्ट्रपति को आतंकवादी की तरह पकड़कर पेश कर रहा है.

    इस कार्रवाई के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा सार्वजनिक मंच से जिस शब्द का इस्तेमाल किया गया, उसने अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान खींचा- “डोनरो डॉक्ट्रिन”. इसे अमेरिका की एक पुरानी, लेकिन अब फिर से सक्रिय होती रणनीतिक सोच के रूप में देखा जा रहा है, जिसके तहत पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिकी वर्चस्व को सैन्य और राजनीतिक ताकत से सुनिश्चित करने की बात कही जाती है.

    वेनेजुएला से शुरू हुआ संदेश

    वेनेजुएला में सरकार के खिलाफ की गई अमेरिकी कार्रवाई को सिर्फ एक देश तक सीमित घटना नहीं माना जा रहा. विश्लेषकों के मुताबिक, यह एक संकेत है कि अमेरिका अब उन देशों के खिलाफ सीधी कार्रवाई से नहीं हिचकेगा, जिन्हें वह अपने प्रभाव क्षेत्र में चुनौती के रूप में देखता है.

    मादुरो की गिरफ्तारी के बाद ट्रंप प्रशासन ने जिस तरह का रुख अपनाया, उससे यह साफ हो गया कि अमेरिका अब पर्दे के पीछे नहीं, बल्कि खुलकर अपनी ताकत का इस्तेमाल करने को तैयार है. ट्रंप ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में जिस “डोनरो डॉक्ट्रिन” का उल्लेख किया, उसे पश्चिमी गोलार्ध को अमेरिकी सुरक्षा और हितों के लिए अनिवार्य क्षेत्र बताने की सोच से जोड़ा जा रहा है.

    पश्चिमी गोलार्ध पर अमेरिका का दावा

    अमेरिकी विदेश विभाग ने भी इस दिशा में बयान देते हुए कहा कि पश्चिमी गोलार्ध अमेरिका की सुरक्षा से जुड़ा क्षेत्र है और यहां किसी भी तरह का खतरा बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने साफ शब्दों में कहा कि अमेरिका अपने पड़ोस को दुश्मन देशों, प्रतिद्वंद्वियों या विरोधी ताकतों का अड्डा नहीं बनने देगा.

    यही तर्क रूस ने यूक्रेन के मामले में दिया था, लेकिन उसी आधार पर अमेरिका ने रूस को आक्रांता करार दिया. ऐसे में सवाल उठता है कि अगर अमेरिका खुद यही नीति अपनाता है, तो अंतरराष्ट्रीय नियमों और संप्रभुता की सीमाएं कहां बचती हैं.

    क्या है डोनरो (मोनरो) डॉक्ट्रिन?

    डोनरो डॉक्ट्रिन को अमेरिका की ऐतिहासिक विदेश नीति की रीढ़ माना जाता है. इसका मूल विचार यह रहा है कि पश्चिमी गोलार्ध में किसी बाहरी ताकत का दखल अमेरिका के हितों के खिलाफ होगा. अमेरिकी विदेश विभाग के इतिहासकारों के अनुसार, इसी नीति के आधार पर अतीत में क्यूबा, निकारागुआ, हैती और डोमिनिकन रिपब्लिक जैसे देशों में अमेरिकी हस्तक्षेप को सही ठहराया गया.

    हाल ही में जारी की गई अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में भी इस सिद्धांत को फिर से प्रमुखता दी गई है. रणनीति दस्तावेज में साफ लिखा गया है कि अमेरिका पश्चिमी गोलार्ध में अपने प्रभाव और वर्चस्व को दोबारा स्थापित करेगा और महत्वपूर्ण क्षेत्रों तक अपनी पहुंच बनाए रखेगा.

    वेनेजुएला के बाद अगला निशाना कौन?

    वेनेजुएला की घटना के बाद ट्रंप की नजर किन देशों पर है, इसे लेकर कयास तेज हो गए हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक:

    • ग्रीनलैंड: ट्रंप पहले भी ग्रीनलैंड को लेकर बयान दे चुके हैं. यह डेनमार्क का हिस्सा है और नाटो का सदस्य होने के बावजूद अमेरिका यहां आर्कटिक क्षेत्र में अपना दबदबा बढ़ाना चाहता है.
    • कोलंबिया: ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से चेतावनी दी है कि अगर कोलंबिया अमेरिकी नीतियों के खिलाफ गया, तो उसे भी वेनेजुएला जैसा अंजाम भुगतना पड़ सकता है.
    • क्यूबा: ट्रंप का दावा है कि क्यूबा की मौजूदा व्यवस्था ज्यादा समय तक टिक नहीं पाएगी और वहां भी बड़ा बदलाव होने वाला है.

    इन बयानों से यह धारणा मजबूत हो रही है कि अमेरिका अब कूटनीति से आगे बढ़कर सीधे दबाव और कार्रवाई की नीति पर चल पड़ा है.

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