Wayanad Landslide: केरल के वायनाड में हुए ताजा भूस्खलन ने एक बार फिर विकास परियोजनाओं और पर्यावरणीय संतुलन के बीच संबंधों पर बहस तेज कर दी है. इस हादसे में तीन लोगों की मौत हो गई, जबकि सात अन्य घायल हुए हैं. घटना के बाद राज्य के कृषि मंत्री टी. सिद्दीक ने इसे "मानव निर्मित आपदा" बताया और 2,134 करोड़ रुपये की अनाक्कमपोयिल-कल्लाडी-मेप्पाडी टनल परियोजना पर सवाल उठाए.
उनका आरोप है कि सुरंग निर्माण से निकली मिट्टी और मलबे का वैज्ञानिक तरीके से निपटान नहीं किया गया, जिससे भूस्खलन का खतरा बढ़ा. हालांकि प्रशासन ने अभी तक इन आरोपों की पुष्टि नहीं की है और पूरे मामले की जांच जारी है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या यह केवल प्राकृतिक आपदा थी या निर्माण कार्य ने भी इसमें कोई भूमिका निभाई.
वायनाड में क्या हुआ?
मंगलवार को वायनाड के कल्लाडी क्षेत्र में मलप्पुरम-वायनाड टनल परियोजना के निर्माण स्थल के पास अचानक भूस्खलन हो गया. लगातार हो रही बारिश के कारण सुरंग से निकाली गई मिट्टी और मलबा नीचे की ओर खिसक गया. इसके चलते कई पेड़ उखड़ गए और सुरक्षा बैरिकेड भी बह गए.
सामने आए सीसीटीवी फुटेज में 7 जुलाई की सुबह लगभग 11:15 बजे तेज बहाव के साथ मलबा एक टैंकर को बहाकर ले जाता दिखाई देता है. हादसे में तीन लोगों की मौत हो गई, सात लोग घायल हुए और दो लोग मलबे में फंस गए. घटना के बाद पुलिस, फायर एंड रेस्क्यू सर्विस तथा एनडीआरएफ की टीमों ने राहत और बचाव अभियान शुरू किया.
मंत्री ने इसे 'मानव निर्मित आपदा' क्यों कहा?
केरल के कृषि मंत्री टी. सिद्दीक का मानना है कि यह हादसा केवल प्राकृतिक कारणों से नहीं हुआ. उनके अनुसार टनल परियोजना की खुदाई के दौरान निकाली गई मिट्टी और मलबे को वैज्ञानिक तरीके से नहीं हटाया गया, जिससे भारी बारिश के दौरान भूस्खलन की आशंका बढ़ गई. उन्होंने यह भी दावा किया कि इस मुद्दे को पहले संबंधित अधिकारियों की बैठकों में उठाया गया था और संभावित खतरे को लेकर चेतावनी भी दी गई थी. इसके बावजूद आवश्यक एहतियाती कदम नहीं उठाए गए.
क्या है 2,134 करोड़ रुपये की टनल परियोजना?
अनाक्कमपोयिल-कल्लाडी-मेप्पाडी टनल परियोजना केरल की सबसे महत्वाकांक्षी सड़क परियोजनाओं में से एक है. इसकी अनुमानित लागत 2,134 करोड़ रुपये है. परियोजना का उद्देश्य कोझिकोड और वायनाड के बीच सुरक्षित, तेज और हर मौसम में सुगम सड़क संपर्क उपलब्ध कराना है. सरकार का कहना है कि टनल बनने के बाद भूस्खलन प्रभावित थामरास्सेरी घाट रोड पर निर्भरता कम होगी और लोगों को एक वैकल्पिक मार्ग मिलेगा. साथ ही दोनों जिलों के बीच यात्रा आसान और कम समय में पूरी हो सकेगी.
कितनी लंबी है टनल?
यह परियोजना लगभग 8.73 किलोमीटर लंबी ट्विन-ट्यूब टनल पर आधारित है, जिसमें दोनों दिशाओं के लिए अलग-अलग दो लेन बनाई जा रही हैं. परियोजना पूरी होने के बाद यह भारत की तीसरी सबसे लंबी सड़क सुरंग होगी.
टनल बनने के बाद अनाक्कमपोयिल और मेप्पाडी के बीच की दूरी लगभग 42 किलोमीटर से घटकर 20 से 22 किलोमीटर रह जाएगी. अनुमान है कि इससे यात्रा का समय 45 से 60 मिनट तक कम हो जाएगा. इस परियोजना का निर्माण ईपीसी मॉडल के तहत किया जा रहा है.
वायनाड में बार-बार क्यों होते हैं भूस्खलन?
वायनाड केरल के उत्तर-पूर्वी हिस्से में स्थित एक पहाड़ी और पठारी क्षेत्र है. यहां ऊंची-नीची ढलानों, कमजोर मिट्टी, चट्टानों और घने जंगलों का मिश्रण पाया जाता है. यही भौगोलिक परिस्थितियां इसे भूस्खलन के लिहाज से संवेदनशील बनाती हैं.
जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (2021) की रिपोर्ट के अनुसार, केरल का लगभग 43 प्रतिशत क्षेत्र भूस्खलन की दृष्टि से संवेदनशील है, जबकि वायनाड की करीब 51 प्रतिशत भूमि पहाड़ी ढलानों पर स्थित है. यही वजह है कि यहां भारी बारिश के दौरान भूस्खलन की घटनाएं बार-बार सामने आती हैं.
भारी बारिश कैसे बढ़ाती है खतरा?
वायनाड पश्चिमी घाट में 700 से 2,100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. मानसून के दौरान अरब सागर से आने वाली नम हवाएं पश्चिमी घाट से टकराती हैं, जिससे इस क्षेत्र में अत्यधिक वर्षा होती है. लगातार बारिश के कारण मिट्टी में नमी बढ़ जाती है और पहाड़ी ढलानों की पकड़ कमजोर पड़ने लगती है. काबिनी नदी और उसकी सहायक मनंतावडी नदी में जलस्तर तेजी से बढ़ जाता है, जिससे बाढ़ और भूस्खलन का खतरा और अधिक बढ़ जाता है.
पर्यावरणविद क्यों जता रहे हैं चिंता?
टनल परियोजना का शुरुआत से ही कई पर्यावरण विशेषज्ञों और संरक्षण समूहों ने विरोध किया है. उनका कहना है कि यह परियोजना पश्चिमी घाट के एक अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र से गुजर रही है, जहां पहले भी कई बार बाढ़ और भूस्खलन जैसी घटनाएं हो चुकी हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य, पहाड़ों की खुदाई और प्राकृतिक ढलानों में बदलाव से क्षेत्र का पर्यावरणीय संतुलन प्रभावित हो सकता है, जिससे भविष्य में जोखिम और बढ़ सकता है.
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था मामला
इस परियोजना को लेकर कानूनी विवाद भी सामने आया था. इसी वर्ष सुप्रीम कोर्ट ने टनल निर्माण पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था. इससे पहले केरल हाई कोर्ट ने भी परियोजना को मिली पर्यावरणीय मंजूरी को बरकरार रखा था. अदालत ने अपने आदेश में कहा था कि संबंधित नियामक संस्थाओं ने पर्यावरण और सुरक्षा से जुड़ी आवश्यक शर्तें निर्धारित की हैं. यदि उनके पालन को लेकर कोई विवाद है, तो उसे राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के समक्ष उठाया जा सकता है.
क्या टनल परियोजना ही हादसे की वजह है?
फिलहाल इस सवाल का कोई आधिकारिक जवाब नहीं है. कृषि मंत्री टी. सिद्दीक ने टनल निर्माण और मलबे के निपटान को हादसे के लिए जिम्मेदार ठहराया है, लेकिन प्रशासन ने अभी तक इस दावे की पुष्टि नहीं की है. अधिकारियों का कहना है कि फिलहाल राहत एवं बचाव कार्य प्राथमिकता है और तकनीकी जांच जारी है. जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि यह भूस्खलन केवल प्राकृतिक कारणों से हुआ या निर्माण कार्य ने भी इसमें किसी तरह की भूमिका निभाई.
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