South Korea America Conflict: अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में समझौते अक्सर रणनीति और आपसी सहयोग के इर्द-गिर्द घूमते हैं, लेकिन जब कोई देश अपने सहयोगी से "नकद भुगतान" की शर्त जोड़ दे, तो यह सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि कूटनीतिक दबाव की नई परिभाषा बन जाती है. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर से अजीबोगरीब और विवादास्पद प्रस्ताव देकर साउथ कोरिया को असमंजस में डाल दिया है.
जहां जुलाई 2025 में दोनों देशों के बीच टैरिफ में कटौती को लेकर समझौता हुआ था, वहीं अब ट्रंप ने सीधे तौर पर 350 अरब डॉलर नकद की मांग कर दी है. यह मांग न केवल सियोल को चौंकाने वाली लगी है, बल्कि इससे द्विपक्षीय व्यापारिक रिश्तों में दरार भी उभरती दिखाई दे रही है.
ट्रंप की 'नई' डील ने बढ़ाया सियोल का सिरदर्द
पहले तय हुआ था कि साउथ कोरिया अमेरिका में 350 अरब डॉलर का निवेश करेगा, वो भी लोन, इक्विटी और गारंटी जैसे माध्यमों से. लेकिन अब ट्रंप प्रशासन चाहता है कि ये रकम सीधे कैश में दी जाए, बिना शर्त, बिना किस्त.
इतना ही नहीं, ट्रंप ने दावा किया है कि जापान 550 अरब डॉलर और साउथ कोरिया 350 अरब डॉलर पहले ही नकद देने को तैयार हैं, हालांकि इन दावों की पुष्टि किसी भी स्वतंत्र स्रोत से नहीं हुई है.
"ये संभव नहीं, ये हमारी अर्थव्यवस्था हिला देगा"
साउथ कोरिया ने इस प्रस्ताव को न केवल अवास्तविक, बल्कि आर्थिक रूप से खतरनाक बताया है. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार वी सुंग-लाक ने साफ कहा कि इतनी भारी नकद राशि देना किसी भी सूरत में संभव नहीं है.
राष्ट्रपति ली जे म्यंग ने भी कहा कि देश का विदेशी मुद्रा भंडार 410 अरब डॉलर के आसपास है और इसमें से 350 अरब डॉलर नकद देना पूरी अर्थव्यवस्था को डांवाडोल कर सकता है. उन्होंने कहा कि ऐसी किसी भी डील के लिए मुद्रा विनिमय (Currency Swap) जैसे बैकअप मैकेनिज्म की जरूरत होगी.
हो सकता है डेडलॉक का समाधान?
दोनों देशों के बीच बातचीत फिलहाल अटकी हुई है. सबसे बड़ा रोड़ा यह है कि अमेरिका चाहता है कि उसे इस फंड पर प्रत्यक्ष नियंत्रण मिले, जबकि साउथ कोरिया इसे अपनी आर्थिक संप्रभुता के खिलाफ मानता है.
अब सारी निगाहें हैं अगले महीने होने वाले APEC (एशिया-पैसिफिक इकोनॉमिक कोऑपरेशन) समिट पर, जिसकी मेज़बानी सियोल कर रहा है और जिसमें ट्रंप की मौजूदगी भी तय है. माना जा रहा है कि इस मंच पर दोनों देशों के बीच कोई संतुलित समाधान या नरमी निकल सकती है.
क्या ट्रंप की 'डील मेकिंग' रणनीति अमेरिका के लिए ही उलटी पड़ सकती है?
डोनाल्ड ट्रंप को उनकी "डील मेकिंग डिप्लोमेसी" के लिए जाना जाता है, जहां वे किसी भी समझौते को कड़ा सौदा मानते हैं और उसके बदले में सीधी शर्तें रखते हैं. लेकिन सवाल ये है कि क्या ऐसे कैश फोकस्ड प्रस्ताव, उनके पारंपरिक सहयोगियों को दूर कर सकते हैं?
विशेषज्ञ मानते हैं कि इस तरह की मांगें न केवल अमेरिका की सॉफ्ट पॉवर को कमजोर कर रही हैं, बल्कि चीन जैसे प्रतिस्पर्धी देशों को अवसर भी दे रही हैं कि वे एशियाई देशों के साथ अपने रिश्ते मजबूत करें.
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