UNGA 2025: 28 सितंबर 2025 को न्यूयॉर्क में आयोजित संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के 80वें सत्र में भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने एक स्पष्ट, मजबूत और विचारशील भाषण दिया. उनके संबोधन ने न केवल भारत की भूमिका को रेखांकित किया, बल्कि संयुक्त राष्ट्र जैसी वैश्विक संस्था की संरचना और कार्यप्रणाली में सुधार की तत्काल आवश्यकता पर भी गंभीर सवाल उठाए.
उन्होंने बदलती विश्व व्यवस्था, संघर्षों की बढ़ती संख्या, जलवायु संकट, वैश्विक असमानता, आतंकवाद, और संयुक्त राष्ट्र की निष्क्रियता जैसे अहम विषयों को उठाया. साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत अब केवल "भागीदार" नहीं, बल्कि "नेतृत्वकर्ता" की भूमिका में आने को तैयार है.
आइए, उनके भाषण की 10 महत्वपूर्ण बातों पर क्रमवार नजर डालते हैं:
1. संयुक्त राष्ट्र अपनी प्रासंगिकता खो रहा है
एस. जयशंकर ने कहा कि आज की दुनिया जिन बहुआयामी संकटों से जूझ रही है, उनके समाधान के लिए संयुक्त राष्ट्र को पूरी तरह पुनर्गठित और अद्यतन करने की आवश्यकता है. उन्होंने स्पष्ट कहा, "यह संगठन आठ दशकों पहले की परिस्थितियों के अनुरूप बना था. लेकिन अब वैश्विक शक्ति संतुलन, चुनौतियाँ और प्राथमिकताएँ पूरी तरह बदल चुकी हैं."
उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की वर्तमान संरचना को अन्यायपूर्ण और सीमित बताया.
भारत की ओर से यह साफ संदेश गया कि संयुक्त राष्ट्र का विस्तार, विशेषकर स्थायी और अस्थायी सदस्यता में विविधता शामिल करना, अब वक्त की मांग है.
2. भारत वैश्विक ज़िम्मेदारियों के लिए तैयार है
जयशंकर ने दो टूक कहा कि भारत अब विश्व मंच पर बड़ी भूमिका निभाने को तैयार है:
3. वैश्विक संघर्षों में UN की निष्क्रियता चिंताजनक
उन्होंने कहा कि:
4. SDGs के लक्ष्य से हम काफी पीछे
जयशंकर ने कहा कि:
5. जलवायु परिवर्तन पर दोहरा रवैया अस्वीकार्य
6. महामारी में दिखा वैश्विक भेदभाव
कोविड-19 महामारी के दौरान हुई वैक्सीन असमानता, यात्रा प्रतिबंध, और स्वास्थ्य संसाधनों के वितरण में भेदभाव का उल्लेख करते हुए जयशंकर ने कहा कि:
7. आतंकवाद पर भारत की दो टूक नीति
पाकिस्तान का नाम लिए बिना जयशंकर ने आतंकवाद पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा:
8. व्यापार और आपूर्ति शृंखला में असंतुलन
जयशंकर ने व्यापार के क्षेत्र में बढ़ती गैर-बाजार प्रथाओं, टैरिफ अस्थिरता और विकासशील देशों के साथ भेदभाव पर चिंता जताई.
9. बहुलवाद और आपसी सम्मान पर बल
जयशंकर ने कहा कि वैश्विक समरसता के लिए सांस्कृतिक विविधता, इतिहास और परंपराओं का सम्मान ज़रूरी है.
जयशंकर ने कहा- संयुक्त राष्ट्र में सभी सदस्य एक समान संप्रभु हैं, यह कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि वास्तविकता है.
उन्होंने यह भी कहा कि:
10. आत्मनिर्भरता, आत्मरक्षा और आत्मविश्वास
एस. जयशंकर ने भारत के विकास और दृष्टिकोण को तीन स्तंभों में प्रस्तुत किया:
आत्मनिर्भरता (Self-Reliance):
भारत में आज मैन्युफैक्चरिंग, फार्मा, स्पेस, डिजिटल टेक्नोलॉजी और इनोवेशन के क्षेत्र में जबरदस्त प्रगति हुई है.
‘मेक इन इंडिया’ का लाभ सिर्फ भारत को नहीं, बल्कि पूरे वैश्विक दक्षिण (Global South) को मिल रहा है.
आत्मरक्षा (Self-Defense):
भारत की नीति है कि वह अपने नागरिकों, सीमाओं और हितों की सुरक्षा के लिए कभी भी पीछे नहीं हटेगा.
आतंकवाद के प्रति ज़ीरो टॉलरेंस भारत की स्थायी नीति है.
आत्मविश्वास (Self-Confidence):
भारत आज जानता है कि वह कौन है, और वह क्या बन सकता है.
एक सभ्यता-संपन्न राष्ट्र, एक वैश्विक आर्थिक शक्ति, और शांति का समर्थक, भारत विश्व व्यवस्था को स्थिरता, न्याय और संतुलन देने की स्थिति में है.
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