Bagram Airbase: अफगानिस्तान में बगराम एयरबेस को लेकर अमेरिका की नई रणनीति ने ताज़ा भू-राजनीतिक बहस शुरू कर दी है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने यह संकेत दिया है कि अमेरिका इस एयरबेस को फिर से अपने नियंत्रण में लाना चाहता है, ऐसी पहल जो तालिबान द्वारा सख्ती से खारिज की गई है. इस प्रयास के पीछे एक बड़ा हितचिंतक बनकर उभरा है चीन, जो अफगानिस्तान में अपने आर्थिक व रणनीतिक प्रभाव को मजबूत करना चाहता है.
ट्रम्प ने एक सार्वजनिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि अमेरिका “बगराम वापस लेना चाहता है.” उन्होंने विशेष रूप से एयरबेस के चीन के नज़दीकीपन को इसकी महत्ता बताते हुए इसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ठहराया. अमेरिका के इस प्रस्ताव पर तालिबान की ओर से कड़ा विरोध किया गया है. तालिबान सरकार ने कहा है कि वे अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता छोड़ने को तैयार नहीं हैं.
चीन की भूमिका और अफगानिस्तान में आर्थिक हित
अफगानिस्तान में खनन संसाधनों (जैसे लिथियम, तांबा, लोहा) की प्रचुरता के मद्देनज़र चीन पहले से ही निवेश तथा व्यापार समझौतों में सक्रिय है. चीन ने अफ़ग़ानिस्तान को अपनी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) में शामिल होने के लिए कहा है, ताकि व्यापार और बुनियादी ढांचे के क्षेत्रों में व्यापक सहयोग हो सके.
तालिबान की तर्क और प्रतिक्रिया
तालिबान ने स्पष्ट कर दिया है कि बगराम एयरबेस किसी भी सैन्य हस्तक्षेप या नियंत्रण के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करेगा. अफगान विदेश मंत्रालय ने कहा है कि किसी भी तरह का सैन्य उपस्थिति भारत और अमेरिका द्वारा अफ़ग़ानिस्तान की आंतरिक मामलों में दखल के रूप में देखा जाएगा.
वास्तविकता क्या कहती है?
कोई आधिकारिक योजना या समझौता फिलहाल सार्वजनिक नहीं हुआ है जो यह बताए कि अमेरिका कैसे तालिबान से अनुमति लेकर या अन्य तरीकों से बाग्राम को पुनः नियंत्रित करेगा.
विशेषज्ञों का कहना है कि सैन्य नियंत्रण स्थापित करना आसान काम नहीं होगा, उसे निश्चित रूप से तालिबान की सहमति, पर्याप्त सैन्य और लॉजिस्टिक समर्थन, और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को ध्यान में रखते हुए करना होगा.
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