ईरान और इजरायल के बीच जारी संघर्ष ने जहां पूरी दुनिया की सांसें रोक रखी हैं, वहीं पाकिस्तान की भूमिका सबसे भ्रमित करने वाली साबित हो रही है. एक तरफ सरकार ईरान पर अमेरिकी हमले की निंदा कर रही है, दूसरी तरफ उसके सेना प्रमुख अमेरिका के साथ बैठकों और भोज में व्यस्त हैं. यह विरोधाभास सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं है — बल्कि पाकिस्तान के शीर्ष नेतृत्व के फैसले और गतिविधियां, दोहरे रवैये की गवाही दे रही हैं.
ईरान की निंदा, ट्रंप से नजदीकी
पाक प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने अमेरिका के ईरान पर हमले को ‘गैर ज़रूरी और खतरनाक’ करार दिया. वहीं दूसरी ओर, पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर, डोनाल्ड ट्रंप के साथ व्हाइट हाउस में बैठक और भोज में शामिल हुए. यह वही समय था जब अमेरिका ईरान के तीन परमाणु ठिकानों पर हमला करने की योजना पर अमल कर रहा था.
रिपोर्ट्स के मुताबिक, लंच मीटिंग में ईरान को लेकर बातचीत हुई थी और आशंका जताई जा रही है कि ट्रंप ने ईरान पर अपने इरादों की जानकारी उसी बैठक में साझा कर दी थी.
नोबेल की सिफारिश, फिर हमला
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि पाकिस्तानी मीडिया के मुताबिक, जनरल मुनीर ने ट्रंप को नोबेल पुरस्कार दिलाने की सिफारिश की थी — और अगले ही दिन अमेरिका ने ईरान पर बम गिरा दिए. वरिष्ठ पत्रकार हामिद मीर ने इस घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया दी, उन्होंने कहा, “जिस नेता को आप शांति दूत बता रहे हो, वो अगले ही दिन जंग छेड़ देता है — इससे ज़्यादा विडंबना क्या होगी?”
डबल गेम या रणनीतिक मजबूरी?
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि जनरल मुनीर को ट्रंप ने ‘राजनीतिक मासूमियत’ में फंसा लिया, लेकिन दूसरी सोच यह है कि पाकिस्तान खुद एक सोची-समझी रणनीति के तहत यह ‘डबल गेम’ खेल रहा है.
पाकिस्तान के लिए अमेरिका से रिश्ते आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से अहम हैं, जबकि ईरान के साथ उसकी 900 किलोमीटर लंबी सीमा असुरक्षा और अस्थिरता की वजह बन सकती है. ऐसे में, इस्लामाबाद ने शायद जान-बूझकर तटस्थ चेहरा ओढ़ रखा है, लेकिन बैकडोर डिप्लोमेसी में अमेरिका की लाइन पर चल रहा है.
ईरान की चिंता बनी पाक सीमा
ईरान में अगर सत्ता अस्थिर होती है, तो पाकिस्तान-ईरान सीमा पर पहले से सक्रिय आतंकी और अलगाववादी समूह हालात का फायदा उठा सकते हैं. इसीलिए जनरल मुनीर ने ट्रंप को इस खतरे से आगाह भी किया था. मगर सवाल यह है कि अगर खतरा इतना बड़ा था, तो क्या मुनीर को अमेरिका के हमले को लेकर सख्त रुख नहीं अपनाना चाहिए था?
पाकिस्तान की नीति पर फिर उठे सवाल
ईरान के साथ भले ही धार्मिक और भौगोलिक नजदीकियां हों, लेकिन पाकिस्तान की विदेश नीति का झुकाव अब भी स्पष्ट रूप से अमेरिका के पाले में दिखाई दे रहा है. आसिम मुनीर और शहबाज शरीफ के विरोधाभासी स्टैंड ने ये स्पष्ट कर दिया है कि पाकिस्तान फिलहाल संभावनाओं और स्वार्थों के बीच झूल रहा है. और शायद यही वजह है कि इस्लामाबाद के रवैये पर अब खुद उसके नागरिक भी सवाल उठा रहे हैं — कि क्या पाकिस्तान अपने पड़ोसियों का भरोसा खो रहा है?
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