नई दिल्ली: जब किसी मां-बाप का जवान बेटा इस दुनिया को अलविदा कह देता है, वो भी ऐसे हालात में जहां कई सवाल जवाब मांगते हैं, तो सिर्फ एक दर्द नहीं उठता बल्कि न्याय की उम्मीद भी जगती है. ऐसा ही एक मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने आया है, जिसमें एक 17 वर्षीय युवक की संदिग्ध मौत को आत्महत्या बताया गया है. लेकिन सवाल ये है कि क्या कोई खुद को राइफल से सीने में गोली मार सकता है? यही सवाल अब भारत की सर्वोच्च अदालत ने मध्य प्रदेश पुलिस से पूछा है.
सुप्रीम कोर्ट ने उठाए संदेह: आत्महत्या या हत्या?
देश की सबसे बड़ी अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि ये समझना जरूरी है कि क्या किसी इंसान के लिए राइफल से खुद को सीने में गोली मारना शारीरिक रूप से संभव है. जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने इस मामले को सिर्फ आत्महत्या मान लेने से इनकार किया और कहा कि हत्या की आशंका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. अदालत ने राज्य सरकार से एक विस्तृत हलफनामा मांगा है, जिसमें राइफल की लंबाई, उसकी जब्ती की जानकारी, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और जांच के दौरान इकट्ठा की गई तमाम सामग्री शामिल हो.
यह सवाल केवल तकनीकी नहीं, बल्कि भावनात्मक और मानवीय भी है. अगर कोई किशोर ऐसी स्थिति में पहुंच जाए कि वो अपनी जान लेने के बारे में सोचता है, तो हमें उन हालातों की तह तक जाना ही होगा.
17 वर्षीय युवक की मौत: क्या थी पूरी कहानी?
यह मामला भोपाल की एक शूटिंग अकादमी से जुड़ा है, जहां याचिकाकर्ता का 17 वर्षीय बेटा शॉटगन शूटिंग की ट्रेनिंग ले रहा था. यहीं उसका विवाद एक अन्य छात्र से हुआ, जिसने उस पर ₹40,000 चुराने का आरोप लगाया. इस आरोप के बाद युवक को शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया. मोबाइल फोन छीन लिया गया, पीटा गया और लगातार मानसिक दबाव बनाया गया.
युवक ने अपनी बहन और एक दोस्त को पहले ही बता दिया था कि वह आत्महत्या करने वाला है. एक सुसाइड नोट भी छोड़ा गया जिसमें साफ-साफ उन छात्रों के नाम थे जिन्होंने उसे परेशान किया था. इसके बावजूद, जब मामला हाई कोर्ट तक पहुंचा, तो आरोपी को अग्रिम ज़मानत दे दी गई.
हाई कोर्ट पर भी सवाल, उम्र का मामला बना मुद्दा
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि हाई कोर्ट ने बेटे की मौत को हल्के में लिया और यह मान लिया कि वह 18 वर्ष का था, जबकि असल में वह 17 साल का नाबालिग था. यह एक महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु बनता है क्योंकि नाबालिग को आत्महत्या के लिए उकसाना एक गंभीर अपराध है.
याचिकाकर्ता का आरोप है कि आरोपी एक प्रभावशाली परिवार से है और पुलिस को उसे हिरासत में लेकर पूछताछ करनी चाहिए थी. लेकिन वह अब तक जांच में सहयोग नहीं कर रहा है.
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