The JC Show Live: क्या KOLKATA में इस बार फहराएगा भगवा? पढ़ें डॉ. जगदीश चंद्र का विश्लेषण

The JC Show: राजनैतिक नहीं बल्कि विचारधारा, पहचान और राजनीतिक वर्चस्व की सबसे बड़ी लड़ाई बन जाता है. बंगाल में बीजेपी का ग्राफ पिछले कुछ सालों में तेजी के साथ बढ़ा है. 2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने बड़ी छलांग लगाई और उसके बाद लगातार संगठन का विस्तार भी किया.

Bharat 24

The JC Show: राजनैतिक नहीं बल्कि विचारधारा, पहचान और राजनीतिक वर्चस्व की सबसे बड़ी लड़ाई बन जाता है. बंगाल में बीजेपी का ग्राफ पिछले कुछ सालों में तेजी के साथ बढ़ा है. 2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने बड़ी छलांग लगाई और उसके बाद लगातार संगठन का विस्तार भी किया. माना जा रहा है कि इस बार का मुकाबला बेहद कड़ा होने वाला है. क्या विकास और राष्ट्रवाद का नैरेटिव बंगाल में पकड़ बनाएगा या फिर बंगाल की अस्मिता और ममता बनर्जी की जमीनी पकड़ फिर से भारी पड़ने वाली है. हिंसा के आरोप, ध्रुवीकरण की राजनीति और चुनावी राजनीतियों का संघर्ष चुनाव में हर बार इस बार के भी चुनाव को हाई वोल्टेज बना रहा है. जेसी शो में इसी सियासी संग्राम का करेंगे हम विश्लेषण. द जेसी शो में कौन आगे, कौन पीछे, किसके पास है मजबूत जमीन और किसकी रणनीति पड़ेगी भारी? हमारे साथ मौजूद हैं भारत 24 के सीईओ और एडिटर इन चीफ और फर्स्ट इंडिया के सीएमडी और एडिटर इन चीफ डॉ. जगदीश चंद्र.

सवाल- इस बार के 'JC Show' की हेडलाइन है- क्या कोलकाता में इस बार फहराएगा भगवा? इसके मायने क्या है सर? 

Just because of popular face of Narendra Modi and hard work of Amit Shah, BJP for the first time may form its government in West Bengal. In fact you can say it's on the outskirts of Kolkata city, on the check post of Kolkata city and waiting for a formal clearance from the people of Bengal. A formal mandate from the people of Bengal to form the government in Kolkata, But at the same time on contrary all opinion polls favour Mamata. हालांकि ओपिनियन पोल निर्णय नहीं करते, मतदाता वोट डाल के निर्णय करता है. So Lets see what finally comes out on 4th, but at the end of the day. One thing is certain that a saffron government in Kolkata, this time is not ruled out.

सवाल- नरेंद्र मोदी की पहल पर संसद में लाए गए परिसीमन एवं महिला आरक्षण बिल के पारित न होने के सम्पूर्ण घटनाक्रम को आप कैसे देखते हैं?

 घटनाक्रम की शुरुआत यूं करें कि दो तिहाई बहुमत चाहिए, 352 चाहिए थे जो नहीं थे. 54 का शॉर्टेज रहा. टोटल स्ट्रेंथ है 543 और उसने 528 लोगों ने जो है कुल वहां मतदान किया. 230 विपक्ष के पास हैं, 298 रूलिंग पार्टी के एनडीए के पास हैं और 292 बनते थे, लेकिन 298 आए तो छह वोट एक्स्ट्रा थे. तो हो सकता है कि आंध्र प्रदेश से जगमोन के वोट हो और or It's Amit Shah's floor management, लेकिन कुल मिलाकर ये बिल गिरा.

सवाल- सर राजनीतिक प्रेक्षकों का यह मानना है कि बिल पारित नहीं होने के बावजूद भी पूरे देश की महिला वोटर्स में प्रधानमंत्री मोदी हीरो बनकर उभरे हैं. आप इस आकलन से सहमत हैं? 

आज सारे देश में एक महिलाओं के सबसे बड़े समर्थक के रूप में जो है वो नरेंद्र मोदी उभर के सामने आए हैं और उन्होंने दो टू जो चेतावनी दी है सब लोगों को देश की सब महिलाएं देख रही हैं, वो देख रही हैं कि किस तरह का व्यक्ति उनके साथ खड़ा है. नरेंद्र मोदी आज सब लोगों से कह रहे हैं कि Pass the bill
otherwise women of India will not forgive you, फिर साथ ही कह रहे हैं कि इस बिल का विरोध करना आपको पॉलिटिकली बहुत भारी पड़ेगा और अब देखिए बीजेपी ने इसके समर्थन में कैंपेन चालू कर दिया है. अश्विनी वैष्णव कहते हैं कि हम गांव-गांव में ढोल पीट-पीटकर ये कहेंगे कि कांग्रेस और विपक्षी दलों ने आपका बिल पास नहीं होने दिया. आपको रिजर्वेशन नहीं होने दिया. 

सवाल- सर संसद के अंदर जिस तरीके से गृह मंत्री अमित शाह ने इस बिल की पैरवी की और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जो विज़न रखा है, आपको लगता है एक बार फिर वो संसद में मैन ऑफ द मैच हो गए? 

Absolutely, पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी को इतना अध्ययन कर लिया है, इतना हार्ड वर्क किया है, रात को 2-2 बजे तक बैठ के इतनी स्टडी कर ली है हर सब्जेक्ट की कि हर सब्जेक्ट के मास्टर हो गए हैं. इसलिए कोई बड़ा बिल आता है, कोई घटना होती है तो आप देखेंगे कि Always he is proving himself as a 'man of the match'. इस बार भी यही हुआ है, अब दो टूक उन्होंने ऐसा बयान दिया है दिल को छूने वाला, उन्होंने कहा कि सारा देश देख रहा है आपको कि कौन महिलाओं के साथ है और कौन महिलाओं के साथ नहीं है. एक सेंटेंस ही बहुत है कहने के लिए और दूसरा उन्होंने कहा है कि चुनाव आएंगे तो आप लोग मुंह छिपाने के लायक भी नहीं रहोगे एट द सेम टाइम. लेकिन आप कह सकते हैं मैन ऑफ़ द मैच थे. जितनी तैयारी के साथ वो आए थे, जिस करेज एंड कन्विक्शन के साथ पार्लियामेंट में कल वो बोले तो निश्चित रूप से वंस अगेन ही इज़ प्रूव हिमसेल्फ एज़ मैन ऑफ़ द मैच ऑफ़ द एंटायर एक्सरसाइज.

सवाल-  इसी प्रकार लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने जिस शालीनता और dignity के साथ सदन का संचालन किया उसकी आज सभी राजनैतिक दलों में तारीफ हो रही है, कुछ कहना चाहेंगे आप?

In fact, he is a smiling Lok Sabha speaker for the first time, बोलते नहीं है और मैं तो हैरान होता हूं कि As a Human Being भी 8-9 घंटे जो है वो केवल एक स्माइल के साथ ही बैठे रहते हैं. स्माइल ना इधर ना उधर. एक स्टैंडर्ड स्माइल डेवलप हो गई उनके चेहरे पे और कल भी यही था. कल का उनका जो आचरण था बहुत ही डिसेंट डिग्निफाइड था. स्माइल में थोड़ा डिफरेंट था. कल उन्होंने बोला बीच-बीच में उन्होंने उसी टिप्पणियां भी की. कल उन्होंने राहुल गांधी को बोलने दिया, टोकने मिला लेकिन टोका नहीं उन्होंने. कल उनका आचरण बहुत अच्छा था और सभी पॉलिटिकल पार्टीज जो हैं इस बात के लिए कल उनकी तारीफ करनी थी कि स्पीकर का तो बहुत अच्छा था.

सवाल- परिसीमन एवं महिला आरक्षण बिल के इस सारे process में एक कानून मंत्री के रूप में आप अर्जुन मेघवाल के role को कैसे देखते हैं?

वो तो देखो साइलेंट परफॉर्मर हैं. He is an emerging person in central cabinet as well as state politics, also he is a man to watch और बहुत विनम्रता के साथ और दलित लीडर होना उनका एक जो है एडिशनल क्वालिफिकेशन हैकानून मंत्री के रूप में देखिए उनका Higher judiciary में कितना अच्छा coordination है, कितना अच्छा तालमेल है.  कोई कंट्रोवर्सी नहीं है. इस बिल का सारा होमवर्क जो है रिजुअ उन्होंने किया. किया तो हालांकि अमित शाह के यहां लेकिन फिर भी एक होता है कि कागज पे लिखता कौन है? करता कौन है? तो दिस इज़ ऑल अर्जुन मेघवाल. और उन्होंने विपक्ष को यह भी कहा कि आप चिंता मत करिए किसी भी स्टेट का कोई भी हिस्सा कटने वाला नहीं है. स्पेशली वि रेफरेंस टू सदर्न स्टेट्स. जिसकी जो ताकत है वो ताकत वहीं बनी रहेगी और बहुत साइलेंटली उन्होंने किया. सबसे बड़ी बात है उनके चेहरे पे कभी आप तनाव नहीं देखेंगे. कितना गंभीर विषय कितना गंभीर बिल हो वो उसी मुद्रा के साथ में उसी शालीनता के साथ में उसको पेश करते हैं. तो कल वापस उन्होंने अपने आप को एक साइलेंट परफॉर्मर के रूप में अपनी परफॉर्मेंस को सिद्ध किया पार्लियामेंट में. इसमें कोई संदेह नहीं है. 

सवाल- राम मंदिर, धारा 370 और UCC के बाद अब संसद में परिसीमन एवं महिला आरक्षण बिल की प्रस्तुति, क्या ये सारी ऐतिहासिक सफलताएं नरेंद्र मोदी के हाथ में ही लिखी हैं?

तकदीर लिखा कर लाए हैं नरेंद्र मोदी. घटनाएं आती हैं, वो उनको पकड़ते हैं, उसको करते हैं, कोई ऐसा काम नहीं है हाथ में उसमें असफल हो जाए. और यह भाग्य रेखा है, उनका परिश्रम है. उनकी पॉपुलरिटी है, उनका विज़न है, उनकी सोच है, जिसे कहना चाहिए उनकी लीडरशिप है. उनकी नेतृत्व क्षमता है कि बड़ी-बड़ी घटनाएं आती हैं. घटनाएं तो सबको मालूम है. पहले से मालूम था कि 370 होना है. 40 साल से कोई नहीं ला पाया. राम मंदिर 100 साल से चला आ रहा है, 50 साल चला रहा है, कोई नहीं किया उन्होंने किया. तो उनका जो रोड मैप है पहले से क्लियर है और फिर लोगों को ऐसा लगता है God Sent an Opportunity. अपॉर्चुनिटी तो पहले से मौजूद थी वहां पे. उसको encash करना जिसे कहते हैं और succes करना और वो सारी Opportunity बहुत डिफिकल्ट और चैलेंजिंग टास्क होती है जिसको नरेंद्र मोदी और अमित शाह सक्सेस स्टोरी में कन्वर्ट करते हैं, तो ये तकदीर लिखा के लाए हैं.

सवाल- महिला आरक्षण बिल के पास न होने से सारे देश में यह narrative and perception बना है कि विपक्ष महिला विरोधी है, कुछ कहना चाहेंगे आप?

विपक्ष खुद अपॉर्चुनिटी क्रिएट करता है और घटनाएं इस प्रकार की हुई कि बिल रखा रूलिंग पार्टी एनडीए ने. जी बिल को पास होना था. पास होते ही महिला आरक्षण होना था. बिल पास नहीं हुआ. विपक्ष ने पास नहीं होने दिया. तो विलेन कौन है? विपक्ष तो कांग्रेस एंड विपक्ष है एमर्ज एज अ विलेन. 

सवाल- पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु की जो महिला मतदाता हैं आखिर इस पूरे घटनाक्रम का उन पर क्या प्रभाव पड़ेगा? 

प्रभाव थोड़ा बहुत तो पड़ता है. वैसे तो क्या है पब्लिक सब जानती है दैट वे और तमिलनाडु तो वैसे ही इसका विरोध कर रहे थे. तो वो पॉपुलर परसेप्शन है कि स्टालिन इज़ बीइंग रिपीटेड अगेन दैट वे जो है तो ज्यादा तो नहीं लेकिन फिर भी 1% 2% 3% जो भी है वो बीजेपी के लिए फायदे की बात है. बीजेपी का जिनके साथ अलायंस है एआईडीएम के साथ में उनके लिए एक एक बेनिफिट की बात है. तो बेसिकली कह सकते हैं कि बीजेपी एनडीए विल सर्टेनली गेन समथिंग. नाउ व्हाट इज़ दैट समथिंग दैट इज़ डिबेटेबल बट सर्टेनली दे आर गोइंग टू गेन समथिंग आउट ऑफ इट इन अ पॉजिटिव वे. 

सवाल- संसद में महिला आरक्षण बिल पर राहुल गांधी के व्यवहार को आप कैसे देखते हैं सर? 

अब क्या कहें अब राहुल गांधी तो एक क्या कहा जाए किसी लेकिन फेयरली देयर इज़ अ क्वेश्चन आपने क्वेश्चन पूछा तो जवाब देना पड़ेगा उसका तो जवाब यह है कि इट वाज़ इमैच्योर. हैंडलिंग वाज़ इमैच्योर और एक हंसी का पात्र बने. इतना महत्वपूर्ण मौका था. इतना सेंसिटिव माहौल था. आप जादू की बात कर रहे हैं. आप सेनाओं के उसके कह रहे हैं कि जादू था. चंदू का ऑपरेशन था. प्रियंका गांधी मुस्कुरा रही थी बहन के नाते कि जादू की बातें कर रहे हैं. हालांकि टोका ओम बिरला ने कि जादू की बातें मत करो भाई. यहां पे जो है कल तो ओम बिरला बड़े लिबरल मूड में थे राहुल के प्रति. फिर भी उन्होंने इस बात को कहा वहां पे. तो इट डजंट सूट हिज़ स्टेटस एज अ लीडर ऑफ़ अपोजिशन जो है अनफॉर्चूनेट. इतना गंभीर विषय था. इतना गंभीर माहौल था. इतना सीरियस जिसे कहते हैं प्लेटफार्म था. वहां आप उसको एक हल्के ढंग से कर रहे हैं. इसीलिए तो लोग कहते हैं कि राहुल गांधी इज़ एन एसेट एज वेल एज अ लायबिलिटी इन कांग्रेस बट यू कांट डू एनीथिंग थिंग्स विल मूव लाइक दिस ओनली इट्स ओके इट्स देयर इशू देर पार्टी. 

सवाल- कुल मिलाकर सार ये है कि देश के नारी विपक्ष की राजनीति से हारी. क्या आप इंडियन वुमेन की इस पीड़ा को शेयर करते हैं? 

सर्टनली बात है ना एक्सपेक्टेशंस आर द ट्रेजडी ऑफ़ लाइफ तो सोच के बैठी थी सब महिलाएं महिलाएं इतनी जागरूक होंगी सपना दिखा दिया नरेंद्र मोदी अमित शाह ने उनको कि इतनी सीटें मिलेंगी पार्लियामेंट में आपका राज होगा आप जाएंगी आएंगी सारा एक माहौल बनता है ना उसके हिसाब से जो है तो सपना टूटता है तो नेचुरली आई शेयर दैट पेन एंड कंसर्न.

सवाल- आज दो-दो मोर्चे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लड़ रहे हैं. एक तरफ तो चुनाव और दूसरा ईरान अमेरिका युद्ध के बीच सप्लाई चेन को बनाए रखना. इसको लेकर आप क्या कहेंगे? 

निश्चित तौर पे अद्भुत है. कितना बड़ा टारगेट खास करके था 10 दिन पहले तक जो है सप्लाई चेन बना के रखना. पेट्रोल डीजल एवरीथिंग गैस जो है वो समय पे आती रहे और इंटरनेशनल डिप्लोमेसी भी करनी है साथ में. एट द सेम टाइम दिन में रोज तीन चुनावी सभाएं भी करनी है. उनमें नैरेटिव भी बनाना है. अपोजिशन पे अटैक भी करना है. रात को 2:00 बजे तक आके घर पे काम भी करना है. तो ये तो अद्भुत क्षमता है उनकी. गॉड गिफ्ट है. देखिए 18 घंटे काम करते हैं. 20 घंटे काम करते हैं. तो दोनों रोल जो है ना स्पेशली इस पिछले एक महीने के दौरान जब उन्होंने प्ले किए हैं. ही डिर्व्स अ वोट ऑफ़ एप्रिसिएशन. 

सवाल- ज्यादातर ओपिनियन पोल्स और ज्योतिष की तरफ से पश्चिम बंगाल में ममता की वापसी की बात की गई है. क्या सचमुच ऐसा हो सकता है? और क्या वाकई में मुख्यमंत्री की रेस की दौड़ में ममता बनर्जी सबसे आगे हैं? 

शी इज अ फ्रंट रनर. इसमें तो कोई बात है नहीं. आप देखते हैं और ओपिनियन पोल्स तो कह ही रहे हैं. हालांकि ओपिनियन पोल्स आर सब्जेक्ट टू वेरिफिकेशन ऑन द डे ऑफ़ काउंटिंग बट स्टिल शी इज़ अ फ्रंट ओनर जो आया है ओपिनियन पोल में टीएमसी के लिए वो आया 41.9 बीजेपी का आया 34.9 लॉट ऑफ़ गैप लॉट ऑफ़ डिफरेंस. आप देखिए सीट्स की बात अगर आप करते हैं तो आज आया है 174 टू 184 टीएमसी के लिए बीजेपी के लिए इसमें आया है 108 टू 118 हम बहुत गैप है ना कांग्रेस की बात करना तो बेकार है दैट वे और वोट शेयर की मैंने बताया ना 41.9 34.9 तो अकॉर्डिंग टू ऑल असेसमेंट जो है और एक ज्योतिष है कुमार गणेश उन्होंने भी अपना आकलन दिया है तो उन्होंने कहा है कि 168 से 185 168 टू 185 और बीजेपी का दिया उन्होंने 104 से 115 तो अकॉर्डिंग टू ऑल पोल ओपिनियन ऑल इंडिकेशंस जो है वह सब कह रहे हैं कि ममता सरकार बना रही है लेकिन नहीं भी बना रही है तो आप ये कह सकते हैं कि शी कंटिन्यूस टू बी अ फ्रंट रनर एट लीस्ट इन दिस रेस.

सवाल- राजनीति संभावनाओं का खेल है. इसीलिए यदि यह मान भी ले पल के लिए कि बीजेपी की जबरदस्त तैयारी और कड़े संघर्ष के बावजूद सीएम ममता जीत जाती है चुनाव को तो जो पश्चिम बंगाल का आने वाला कल है वो कैसा होगा? 

इसका एक ही लाइन का उत्तर है वैसे तो यू कांट चेंज डेस्टिनी. अगर उनकी जन्म पत्री में लिखा है मुझे चौथी बार मुख्यमंत्री बनना है तो बनेगी. ग्राउंड रियलिटीज तो यह है कि शी इस फेसिंग द टफेस्ट कंपटीशन ऑफ हर पॉलिटिकल करियर जितने का था. पहली बार बीजेपी ने इतनी जबरदस्त टक्कर दी है कि बड़ी संख्या में लोग बंगाल में मानने लग गए हैं कि भाजपा की सरकार आ रही है. दैट वे जो है यह तो अब वो आगे आगे चांस की बात है. दैट्स वे तो अब ये मैंने कहा ना आपसे भी अगर वो आ जाती हैं डेस्टिनी यू कांट रूल आउट डेस्टिनी आ गई वो तो कल कैसे होगा? अब सबसे बड़ा दिलचस्प सवाल यह नरेंद्र मोदी अमित शाह के देखने का है कि कोई टकराव रहेगा ममता का देखने का है या कि रिकंसिलेशन करके आगे बढ़ाया जाएगा और बाकी बेसिक कररेक्टर तो सरकार का वही रहेगा कि अवैध घुसपैठ बढ़ेगी और अल्पसंख्यक बढ़ते चले जाएंगे. देश की चिंता है कि जो जो पॉलिटिकल ज्योग्राफी है उसकी चेंज हो जाएगी. बंगाल की चिंता एज़ इट इज़ जारी रहेगी और देश के लिए सुरक्षा के नाम पे अदर दैन पॉलिटिकल इशज़ जो है बंगाल विल कंटिन्यू टू बी ए मेजर इशू बिफोर द सेंट्रल गवर्नमेंट जो है बाकी लेट्स सी.

सवाल- राजनीतिक प्रेक्षक इस बात को लेकर आश्चर्यचकित हैं कि ओपिनियन पोल में ममता सरकार की वापसी की संभावनाओं के बावजूद बीजेपी लीडरशिप और उनके प्रवक्ता इस संभावनाओं से नकार नहीं रहे इंकार नहीं कर रहे.

मुझे भी हैरानी हुई देख के हां नहीं बाद में मुझे आदित्य ने बताया कि भाई उनका एक नैरेटिव तो बन गया ना कि हम 100 को क्रॉस कर सकते हैं. 118 पे हैं. 148 आने में क्या टाइम लगता है? तो बीजेपी ने इस तरह का दिया है कि हम 100 क्रॉस कर रहे हैं. मतलब हम सरकार बना सकते हैं. जो गैप है फिल अप करो. हमें वोट दो इसको. तो बीजेपी इज़ अ गेनर इसलिए उन्होंने ऐसा कोई कंट्राडिक्शन नहीं किया. कोई खंडन नहीं किया. 

सवाल- आखिर पश्चिम बंगाल चुनाव में किस करवट बैठेगा महिला कार्ड? 

महिला कार्ड तो देखो दोनों को प्रिय है. लेकिन बीजेपी ने महिला कार्ड को ज्यादा इनकैश किया. पिछले कुछ चुनाव में देखा है नहीं. दे आर मोर स्मार्ट दे आर मोर एफिशिएंट इन एग्जीक्यूटिंग देयर प्रॉमिससेस टू वुमेन अब ममता जो है ₹1500 दे रही है चला रहा है सिंग स्कीम है उनकी और उसने कहा है कि मैं इसको बढ़ाऊंगी अमाउंट इंडिकेट नहीं किया क्योंकि वो जानती है पैसा नहीं है बीजेपी ने कहा है कि हम ₹3000 देंगे चाहे हमें ₹72 हजार करोड़ साल का खर्च करना पड़े. हम ₹3000 देंगे तो आज जो लगता है मुझे वह जो क्वांटम है पैसे का जो ऑफर है बीजेपी का डबल तो अट्रैक्शन है लेकिन सवाल ट्रस्ट का है. एक बार यह होता है ना कि जो दो पैसे मिल रहे हैं मिलते रहा पता नहीं नई सरकार है. कल को पैसे आएंगे नहीं आएंगे क्या होगा. दैट विल जो है तो वुमेन कार्ड आज जो है मुझे लगता है बीजेपी के फेवर में ज्यादा चल रहा है क्योंकि एकदम से डबल ऑफर है उनका जो है तो बाकी अब देखिए चुनाव के दिन 4 तारीख को मालूम पड़ेगा आपको. 

सवाल- आखिर क्या है ऐसा ममता दीदी में कि वह हारती ही नहीं है? 

हां संघर्ष करती हैं. राइटर बिल्डिंग में मुख्यमंत्री बनने से पहले पुलिस वाले डंडे मारते थे तो पट्टियां बांध के सिर पे चल देती थी. सफेद साड़ी और चप्पल के साथ वो चलती रहती है. चलती रहती हैं. और यह तो नहीं कह सकते कि हारती नहीं है. पिछली बार नंदीग्राम में हार गई थी. शुभेंदु से 1956 वोट से हार गई थी. लेकिन कुछ भी कहो इन सारे विरोधों के बावजूद सारे आरोप भ्रष्टाचार और घुसपैठ के और तुष्टीरण के आरोपों के बावजूद जो है ना उनका जो चार है जो करिश्मा है ना वो किसी दूसरे लीडर में बंगाल में नहीं है. ये तो एक सत्यता है. सो दिस इज़ ऑल हारती नहीं सब है. लेकिन अब राजनीति है ना. तो राजनीति में तो ऊपर नीचे व्यक्ति होता है. हो सकता है हार जाए इस बार. लेकिन जो ट्रेंड उनका एज एन इंडिविजुअल लीडर जो है ना तो शी इज द मोस्ट आप कहना चाहिए कि रिकॉग्नबल लीडर इन बंगाल. उसके पर्सनली अगर देखा जाए तो कोई व्यक्ति उनकी टक्कर में नहीं है. शिवेंदु जो है वो भी उनके टक्कर में उस तरह से खड़े हैं जो उनका करिश्मा है. दूसरे हर किसी व्यक्ति का जो करिश्मा है वो फीका पड़ जाता है उनके सामने. पर चुनाव का इनटोटिटी देखा जाता है. नॉट ओनली वन इंडिविजुअल. तो देखिए क्या परिणाम है. लेकिन मैंने पहले भी कहा कि पहली बार भाजपा सरकार बनाने के सबसे ज्यादा निकट खड़ी है. 

सवाल- आपको ऐसा लगता है कि ममता दीदी के पक्ष में आए जो ओपिनियन पोल्स हैं उसके बावजूद भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली में जो जबरदस्त भीड़ है तो क्या पलट देगी ममता का सारा गेम प्लान? 

दिस इज द ओनली रे ऑफ़ होप जिसे कहना चाहिए. सडनली जो क्राउड आना चालू हुआ है प्राइम मिनिस्टर की सभा में पिछले दिनों मैंने देखा जबरदस्त क्राउड जो है यह तो बदल सकते हैं अब वो तो प्राइम मिनिस्टर तो सरेआम कहते हैं ना वो कहते हैं अभी ममता को बाय-ब कह दो अब समय आ गया सरकार करने का और प्राइम मिनिस्टर ये भी कहते हैं कि जनता ने मन बना लिया है चेंज करने का तो इसमें कोई शक नहीं है कि अगर भाजपा की सरकार बनती है तो मेजर रोल उसमें प्राइम मिनिस्टर की जो गैदरिंग्स हैं और अमित शाह का जो इसमें कमिटमेंट और जो इन्वॉल्वमेंट है 24 * 7 का उस तरह का उन दोनों का रोल रहेगा. बट जो आपका क्वेश्चन है बड़ा स्पेसिफिक है कि प्राइम मिनिस्टर की सभाओं में जो भीड़ उमड़ी है उससे एक बार फिर से आशा बनी है भाजपा में और पॉलिटिकल सर्किट में कि शायद बीजेपी आ रही है. 

सवाल- इसी प्रकार टीएमसी के मुस्लिम कार्ड का परिणाम पर क्या असर होगा? 

मुस्लिम कार्ड तो देखो टीएमसी का तो जो वोट कटे हैं तो आम धारणा यही मानी जाती है. 91 लाख वोट कट गए. अगर मान लो तो इसके ही कटे हैं. इंप्रेशन ऐसा ही है. पर एक बात यह है कि मुस्लिम वोट वहां पूरी तरह से पोलराइज्ड है. उसको ना तो ओबीसी कोई ज्यादा हिला पा रहा है ना कोई दूसरा कबीर क्या है वो नहीं कोई हिला पा रहा है. तो मुस्लिम वोट एंड ब्लॉक है ना ममता के साथ ही हैं. दैट वे जो है और टोटल जो वहां का सिस्टम है तो 52 सीट्स पे मुस्लिम कैंडिडेट खड़े किए हैं उन्होंने. दैट वे. और ये मैंने कहा ना आपसे कि ऐसा फैक्ट का पता नहीं है. लेकिन मोटे तौर पे मुस्लिम कार्ड जो है वो पूरे तौर पे ममता के साथ ही है बंगाल में. कोई दूसरा कंटेंडर नहीं है उसमें. 

सवाल- इसी प्रकार बीजेपी के हिंदू कार्ड का चुनाव पर कितना असर होगा? 

हिंदू कार्ड का तो है हिंदुत्व नारा है और जो नरेंद्र मोदी ने भावुक बात कही है कि अगर ऐसी चलती रही तो घुसपैठ के कारण से हम अल्पसंख्यक हो जाएंगे. एक दूसरा बांग्लादेश बन जाएगा. यहां पे जो है तो हिंदू कार्ड तो है ही प्रबल. और हिंदू कार्ड का असर है कि आज बीजेपी सरकार मानेंगे निकट है. आप देखिए ना पिछली बार 77 पे थी. इस बार उम्मीद कर रहे हैं कि कुछ भी उम्मीद कर रहे हैं 100 से ज्यादा तो आ ही रही है. 118 समथिंग की बात कर रहे हैं वहां पे जो है तो निश्चित तौर पे हिंदू कार्ड ही है ये तो अगर वहां सरकार बनती है भाजपा की मतलब भगवा अगर वहां लहराता है कोलकाता में तो अब्सोलुटली हिंदू सेंटीमेंट क्योंकि पोलराइजेशन बंगाल में कंप्लीट है हिंदू वर्सेस मुस्लिम बीजेपी वर्सेस ममता तो हिंदुत्व इस प्लेइंग अ मेजर रोल इन कोलकाता.

सवाल- क्या मुस्लिम और हिंदू वोट की तरह ही बंगाल में दलित वोटर्स की भी कोई निर्णायक भूमिका है?

ऑफकोर्स मैंने पढ़ा कि 195 सीटें ऐसी है 294 में से जहां उनका डिसाइसिव से है और फिर 127 सीटें ऐसी है जहां 25% से ज्यादा दलित हैं वहां पे दैट विल तो दलित इज़ आल्सो अ फोर्स इन बंगाल इलेक्ट्रल पॉलिटिक्स जो है वहां की जो सिस्टम है उसमें इज़ अ फैक्टर 

सवाल- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी एक सभा में पश्चिम बंगाल के हालात से निराश होकर एक दिन यह कहा कि अगर ऐसा ही चलता रहा पश्चिम बंगाल में तो तो एक दिन हिंदू अल्पसंख्यक हो जाएंगे. इस भावनात्मक अपील को आप कैसे देखते हैं? 

ये भावनात्मक अपील काम कर रही है. ये बेस है. अभी जो सवाल था ममता कल को आएगी तो क्या होगा? तो यही चिंता है प्रधानमंत्री की जो उन्होंने डे वन को कह दिया था वहां. चुनाव का प्रचार चालू होने से पहले एक दिन पहले कह दिया था कि मेरी चिंता ये है. यह चुनाव है ना हार जीत का चुनाव नहीं है. यह चुनाव राष्ट्रीय सुरक्षा से और आध्यात्मिक इशों से जुड़ा हुआ है. तो प्रधानमंत्री की जो चिंता है वो आज भी वैसी है जैसी एक महीना पहले उन्होंने व्यक्त की थी. और यही चिंता बार-बार उनको यह प्रेरित करती है कि नॉट ओनली एनडीए बट आल्सो प्राइम मिनिस्टर भी जो है यह देखा जाए कि वहां पे सरकार जो रहे वो राष्ट्रवादी सरकार रहे और इस तरह की जो स्थितियां बन रही है वहां पे अवैध घुसपैठ के कारण से ये स्थितियां नहीं बने तो प्राइम मिनिस्टर दैट स्टेटमेंट कंटिन्यू टू बी रेलेवेंट इवन एट दिस टाइम आल्सो 

सवाल- मोदी ने सिंघु रैली में कहा ऑल कैंडिडेट्स आर मोदी क्या ये चुनाव भी मोदी के चेहरे पर ही लड़ा जा रहा है?

ऑफकोर्स कई बार ये कोशिश होती है कि ये चुनाव है ना उन लोगों को लड़ने दो लोकल लड़ने दो अमित भाई आप ही लड़ाओ लेकिन जैसे चुनाव आगे बढ़ता है भीड़ नहीं आती है फिर फैसला करना पड़ता है नहीं यार मोदी जी को ही लाओ यही हुआ बंगाल में वापस अब दिन में तीन-तीन रैली हो रही है तो ही इज़ द ओनली फेस इन द कंट्री विद बीजेपी जो चुनाव लड़ने में जो क्राउड पुलर है और जिसकी अपील है और अकेला व्यक्ति चुनाव लड़ता है उस तरह से अकेला व्यक्ति क्राउड खींचता है. अब आप देखिए अमित शाह जोड़ लीजिए आप यह तो संसार की पहली पॉलिटिकल पार्टी है जिसमें इतना बड़ा चुनाव केवल दो व्यक्ति लड़ाते हैं और जिताते भी हैं मिरेकल पता नहीं कैसे करते हैं और ऐसा लगता है घर का काम है इतना पर्सनल काम होता है ना स्टेक इनवॉल्व होते हैं घर के खुद के काम में कि जितना ही है हमको तो ये चुनाव लड़ना है जितनातना भी है ये तो ये फैक्ट है कि नरेंद्र मोदी के चेहरे पे चुनाव लड़ा जाता है अमित शाह उसको फिर एग्जीक्यूट करते हैं सारे ग्राउंड और ग्राउंड पे जितने मैनपुलेशंस होते हैं साम दंड राजनीति में होता है ना वो सारा जीवन अमित शाह के पास है दैट वे तो वंडरफुल कॉम्बिनेशन जैसे और सबसे बड़ी बात ये है कि वो कहते हैं मैं तो हनुमान हूं ये तो राम है इसी मुद्रा में रहते हैं कितना बड़प्पन है जो सारा संसार कहता है ही इज़ एक्टिंग एज अ डेपुटी प्राइम मिनिस्टर हैं और नरेंद्र मोदी के सामने हाथ जोड़ खड़े होते हैं और कभी किसी बात पे इंकार नहीं करते कोई प्रस्ताव लेके गए और मान लो नरेंद्र मोदी ने किसी भी कारण से अगर जचा नहीं दोबारा नहीं कहेंगे तो अद्भुत कॉम्बिनेशन अद्भुत अंडरस्टैंडिंग है दोनों के बीच में तो वहां भी दिखाई दे रही है. बहरहाल आपका वो जो सवाल है वो सही है कि यह चुनाव भी नरेंद्र मोदी के चेहरे पे लड़ा जा रहा है. अमित शाह की स्ट्रेटजी पे लड़ा जा रहा है. 

सवाल- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सिलीगुड़ी रैली में एक बड़ा निराला अंदाज दिखा. मंच से कहा कि ये मैडम तो सुनने को तैयार ही नहीं है. ये पूरा किस्सा क्या है? 

नरेंद्र मोदी का पब्लिक कनेक्ट है. एकदम से इनफॉर्मल हो जाते हैं. जनता एकदम से आकर्षित होती है. अब वो उस दिन जो मंच पे जो कलाकृतियां थी उनको देख रहे थे आराम से. अब एक महिला नजदीक आने की बहुत कोशिश कर थी. एसपी वालों से भिड़ गई. कहने लगी नरेंद्र मोदी तो देखे ना कि जिसे कहते हैं कि चार आंखें रहती है उनकी सब दिखता रहता है क्या हो रहा है तो एक तरफ तो देख रहे थे वहां भी देख रहे थे पीछे क्या हो रहा है तो उन्होंने उसको देखा और वो भिड़ रही थी सिक्योरिटी वालों से तो मुंह से निकला कि मैडम तो किसी की सुनती नहीं है अब बात है नरेंद्र मोदी जी कोई भी जुमला बोलते हैं कोई वाक्य बोलते हैं वो हिट हो जाता है वायरल हो जाता है तो ये भी इसी तरह से सामान्य बात थी मैडम तो किसी की सुनती नहीं है वो बेचारी शर्मसार हो गई महिला भी शांत हो गई कि प्राइम मिनिस्टर ने ये कह दिया सुनती नहीं है दैट जो सो दिस इज ऑल राइट मूड. 

सवाल- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ममता बनर्जी के बीच चुनावी संघर्षों बीच कभी-कभी मुझे लगता है कि लार्जर इंटरेस्ट के मुद्दों पर दोनों के बीच आपसी अंडरस्टैंडिंग रहती है. क्या आपको भी ऐसा लगता है? 

ब्रिलियंट घटनाएं तो यही बताती हैं. हां. क्या है कि लार्जर इशू है कांग्रेस को निपटाना. और नरेंद्र मोदी हमेशा इस काम में ममता की यूटिलिटी को जानते हैं. उसकी उपयोगिता को समझते हैं कांग्रेस निपटाने में. गठबंधन ही नहीं हुआ. कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ रही है. ठीक. जी. दो तीन घटनाएं आप देखिए. पहली घटना है कि लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ आया नो कॉमन मोशन. ममता ने साइन नहीं किया. टीएमसी ने साइन नहीं किया. वो अलग बात है कि मारवाड़ी बहुत हैक में तो देखते हुए चलो मेरे वोटर हैं. तो एक सहानुभूति फैक्टर नहीं किया. लेकिन बड़ा फैसला था ममता का. ऐसे माहौल में लोकसभा स्पीकर के खिलाफ जो अविश्वास प्रस्था था उससे अपने आप को दूर रखना. उस साइन नहीं करना एक बड़ी घटना थी जो सामान्य घटना नहीं थी. ठीक है? ओम बिरला चाहे कितने लोकप्रिय हो कितने ही जैसे कहना चाहिए इंडिपेंडेंट हो वैसे हो लेकिन पॉलिटिकल जो फैसले होते हैं तो फिर फैसले होते हैं. लेकिन ममता ने उस अपोजिशन फैसले को डिफाई किया और ओम बिरला के खिलाफ उसे साइन करने से इंकार किया. वन दूसरा गवर्नर आनंद बोस अब राज्यपाल भाषण पढ़ता है. कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में राज्यपालों ने मुख्यंत्रियों का दिया हुआ भाषण नहीं पढ़ा. जो कि परंपरा पढ़ने की है. ठीक है? आमतौर पे क्या होता है? केंद्र की आलोचना होती है. सरकार का समर्थन होता है. लेकिन इस बार फॉर ए चेंज जो है जो सबसे टकराव का अड्डा रहा है कोलकाता राजभवन गवर्नर वर्सेस सीएम टकराव का उस गवर्नर ने उस भाषण को एज इट इज पढ़ा. केंद्र की आलोचना की. ममता की तारीफ की. कितनी बड़ी घटना है. आप देख रहे हैं. तीसरा फिर जो ममता छाती से लगा के ले गई थी कंप्यूटर उठा के. हां. अब मे बी इरिस्पेक्टिव स्टेटस अरेस्ट होता है आदमी दैट इज है लेकिन देखिए ठंडे वस्ते में चला गया ना मामला ऐसा नहीं है तो क्या है कहीं ना कहीं एक अंडरस्टैंडिंग है कि इन इन विषयों पे तो हम देंगे रियायत और इन विषयों पे फिर आप लड़िए चुनाव में सब लड़ते हैं और पर्सनली नरेंद्र मोदी भी कतरा रहे हैं आजकल बचते हैं वो भी बचते हैं पर्सनल अटैक एक दूसरे पे नहीं करें तो क्या है कि स्ट्रेटेजिक साइलेंट अलायंस इन लोगों के बीच में है ऐसा मेरा मानना है. 

सवाल- बीजेपी, कांग्रेस और टीएमसी सभी दलों में लेकर इस बात को लेकर गहरी चिंता और उत्सुकता है कि आखिर किस करवट बैठेगा एसआईआर का ये नया प्रयोग? 

बिल्कुल सही कहना है आपका यह है कि यह गुगली है एक तरह से मृग मारीचिका है. कहां बैठेगी? किसको नुकसान होगा? किसको फायदा होगा? कहा नहीं जा सकता. बीजेपी वाले बहुत दिनों तक भाजपा वाले इस ख्याल में थे कि यह ठीक हो रहा है. मुस्लिम वोट कट रहे हैं. हमारा फायदा हो रहा है. अब जो एनालिसिस हो रहा है उनको पसीना आ रहा है. वो भी श्योर नहीं है. उनके मन में संदेह हो गया है कि यार कहीं हमारा नुकसान तो नहीं हो रहा है इससे. तो यह तो 4 तारीख को जब होगा रिजल्ट उसी दिन मालूम पड़ा कि गुगली थी यह जो था यह किसके पक्ष में आई एक तरह से और अगर मोटे तौर पर अगर आप देखें सारी कहानी को सरल शब्दों में समझने की कोशिश करें तो प्रयास बहुत अच्छा था जो मतदाता सूचियां पुरानी पड़ी है बरसों की दशकों से इसकी क्लीनिंग की जाए कौन व्यक्ति है कौन नहीं है छोड़ के चला गया कौन नया आ गया होना चाहिए. इसके लिए भारत सरकार की और चुनाव आयोग की तारीफ की जानी चाहिए कि प्रयास अच्छा था इंप्लीमेंटेशन को लेके डिबेट हो सकती है. प्रयास अच्छा था. तो बंगाल में हुआ 12 राज्यों में हुआ सब कंप्लीट हो गया. ठीक से काम कंप्लीट हो गया. यहां पे कई तरह की प्रॉब्लम थी. स्टेट गवर्नमेंट, सेंट्रल गवर्नमेंट, चुनाव आयोग हर कोई लड़ रहा है एक दूसरे से आपस में. आप ये मानिए दैट वे. तो अब क्या हुआ कि अगर इनटोटिटी अगर आप देखते हैं तो जो पहला ड्राफ्ट आया नाम कटने का तो 58 लाख लोगों के नाम कटे. उसमें फिर ड्राफ्ट आया 5 लाख और कट गए. 63 लाख जो है ना कट गए. वह तो कट गए. अब आप अनुमान लगाते रहना कि इस 53 में किसका फायदा है, किसका नुकसान है. आज नहीं कह सकते. इसी बीच में फिर क्या हुआ कि 1 करोड़ 25 लाख लोग जो हैं वो क्या कहते हैं? लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी एक नया वर्ड निकाला. उसमें था कि आपका नाम सही है. पिता का नाम सही नहीं है. ममता बनर्जी लिखती है पिता का नाम बंदोपाध्याय था. तो है कि नहीं है. पाप स्पेलिंग तो गलत नहीं. इस तरह की चीज़ जो मतलब अदरवाइज कोई रिस्क नहीं है उसमें. लेकिन चुनाव आयोग का था कि नहीं इसको भी चुनाव आयोग ने माना या तो चुनाव आयोग थोड़ा लिबरल हो जाता कि ममता के फादर का नाम बंद उपाध्याय तो मान लो ना यार इसको और स्ट्रिक्ट कहा नहीं यार हम तो वर्क टू रूल करेंगे तो 1 करोड़ 25 लाख उस चपेट में आ गए वहां पे जो है तो वो 63 लाख लोग तो अलग हो गए बच ही गए अब क्या 1 करोड़ 25 लाख लोग ये आ गए तो फिर इनकी सुनवाई चालू हुई 705 जुडिशरी ऑफिसर्स वगैरह आए 65 लाख लोग इसमें से निकल गए 125 - 65 = 60 तो 60 लाख लोग जो है ना फिर रह गए. फिर 60 लाख लोगों की जो सुनवाई हुई छटनी हुई ट्रिबनल में और सब जगह हुआ तो उसमें क्या है कि 33 लाख लोग और क्लियर हो गए तो 27 लाख लोग रह गए नेट. ठीक? तो 27 और वो 63 तो 90 लाख हो गए ना लोग जो प्रभावित हुए. फिर पता लगा कि 27 लाख नहीं है. 7 लाख और लोगों ने भी अपील कर दी है ट्रिब्यूनल में तो 34 लाख लोग हो गए. तो आज 34 साल लोगों की कहानी जो है यह सामने खड़ी हुई है. तो इस तरह से क्या है कि जो गुगली या जो सिचुएशन है वो यह है. तो अब वो जो मैंने बताया आपको 91 लाख और ये जो 34 लाख लोग हैं ये क्या इंपैक्ट होता है इन्ह वोट दिया नहीं इन्होंने. ये तो वोट देने से वंचित ही रह गए ना इसमें. तो लेट्स सी. तो इस तरह से क्या ये मामला उलझ गया? गुगली है. अभी नहीं कह सकते ये किसके पक्ष में बैठेगी? 

सवाल- पश्चिम बंगाल में आखिर कब यह जुडिशियल ट्रिब्यूनल की एसआईआर प्रक्रिया पूरी होगी और यदि ट्रिब्यूनल में लाखों लोगों के मतदान के अधिकार को सही पाया गया तो क्या 2026 में उन लोगों को मतदान का अधिकार मिल पाएगा. 

देखो सबसे इंपॉर्टेंट सवाल ये है कि कितना समय लगेगा? 19 ट्रिब्यूनल काम कर रहे हैं. ठीक है? तो मेरा ऐसा मानना है कितना भी जल्दी करेंगे चारप महीने तो लगा ही देंगे. इसको चीफ जस्टिस क्योंकि इंटरेस्ट ले रहे हैं. एक प्रगतिशील चेहरा है. ठीक है? तो लगता है मुझे कम से कम इसको चार पांच महीने इस प्रोसेस में लग सकते हैं. उसके बाद ही पता लगेगा. 

सवाल- एसआईआर प्रकरण की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक बहुत गंभीर और चिंता पैदा करने वाली टिप्पणी की. अगर जीत का मार्जिन काटे गए वोटर्स की संख्या से कम है तो हम हस्तक्षेप करेंगे. क्या इसका मतलब यह है कि चुनाव परिणाम सब्जेक्ट टू फाइनल जजमेंट ऑफ सुप्रीम कोर्ट होंगे. 

सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला है ना प्रगतिशील फैसला है. यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत पर आधारित है नेचुरल जस्टिस और एक बार पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी सुनवाई करते समय एसआईआर की जो थी अपील से उन्होंने कहा था ऐसी कोई बात नहीं चिंता नहीं करें. एक बार नाम कट गया तो मतलब ये नहीं कि हमेशा के लिए कट गया. दैट मींस सब्जेक्ट टू वेरिफिकेशन सब्जेक्ट टू अमेंडमेंट है. सब्जेक्ट टू मॉडिफिकेशन है. उसी की व्याख्या को आगे बढ़ाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अभी ये कहा है नेचुरल जस्टिस के बेस पे. पिछली बार क्या हुआ था? 44 सीट्स ऐसी थी जिनमें जीतने का मार्जिन जो है कटे वोटों की संख्या की तुलना में कम था. तो इस बार भी ऐसे केसेस आएंगे वहां पे. तो ऐसे केसेस में क्या है? तो वो संकेत उन्होंने दिया है. चिंता की बात ये है पिछले चुनाव में जो 44 सीट्स पे ऐसा हुआ था. इस साल मान लो अगर 24 सीट पे ऐसा हो गया, 15 सीट पे ऐसा हो गया. जहां की जीत का मार्जिन जो है उससे कम है जो वोट कटे हैं वहां है. तो फिर सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप करेगा. हस्तक्षेप के क्या मायने हैं? इनडायरेक्टली तो इसका मतलब यह है कि क्या उन सभी सीटों में फिर से पुन चुनाव होगा? ब्रॉडली कहा जा सकता है कि उन सीटों का जो फैसला है दैट विल बी प्रैक्टिकली सब्जेक्ट टू द फाइनल जजमेंट ऑफ़ द सुप्रीम कोर्ट इन ऑल दोज़ केसेस. सो लेट्स सी क्या होता है.

सवाल- एक और इंपॉर्टेंट बात है जो समझने की जरूरत है. आप समझाइए.  34 लाख वोटर्स ने यह एसआईआर अपील की और उस अपील की सुनवाई के बाद जो 19 जुडिशियल ट्रिब्यूनल्स हैं वो ये निष्कर्ष पर पहुंचे कि कुछ लाख वोटर्स जो हैं उनके वोटर लिस्ट से नाम गलत कट गए हैं. तो ऐसी स्थिति में पहला कि इलेक्शन कमीशन इसका भूल सुधार कैसे करेगा? दूसरा ये कि क्या 2026 में ये वोटर्स वोट कर पाएंगे और तीसरा अगर ऐसी गलती है सिस्टम की जो लापरवाही है उसमें जवाबदेही होगी जिसकी गलती थी जिम्मेदार व्यक्ति की?

ये तो हार्ड फैक्ट है ग्राउंड रियलिटी है कि लाखों लोग जिसमें कम से कम आप मोटे तौर पे 34 लाख तो मान ही लीजिए ज्यादा नहीं भी है तो 27 और सात जो बाद में जुड़े हैं जिनके अपीलें पेंडिंग है तो ये माने कि जिन 34000 लोगों की अपीलें पेंडिंग है ट्रिब्यूनल के सामने आज ट्रिब्यूनल जो डिसाइड कर रहा है तो उनके सामने तो गंभीर प्रश्न यह है कि वह मतदान के अधिकार से वंचित रह गए हैं और मतदान का अधिकार चाहे मौलिक अधिकार नहीं लेकिन एक कॉन्स्टिट्यूशनल राइट है और एक सेंटीमेंटल राइट है. सुप्रीम कोर्ट ने खुद ने कहा है. तो गंभीर चिंता का विषय यह है कि चाहे गलती किसी की भी थी सेंटर की थी, आयोग की थी, राज्य सरकार की थी, एजेंसीज की थी, सिस्टम की थी. लेकिन एट द एंड ऑफ़ द डे जो है ना कम से कम 34 लाख लोग जिनकी अपील आज है. हो सकता है कुछ और अपीलें आगे आने वाले दिनों में हो. तो ये 34 या 34 प्लस फ्यूचर अपील्स ये जो लोग हैं ये तो वोट देने से वंचित रह गए. जी तो ये गंभीर प्रश्न है. तो देखिए इस पे क्या फैसला होता है? कैसे क्या बात आगे बढ़ती है? क्योंकि इन सब पे भी सुनवाई हो रही है. जब सुनवाई पूरी हो जाएगी तब मालूम पड़ेगा फाइनली जाकर के कि 34 है कि 24 है कि 15 है कि सात आठ हैं, क्या है ये. उस दिन फिर ये तय होगा. अब तो जुडिशरी ही तय करेगी. सुप्रीम कोर्ट ही तय करेगा. ये जो वंचित रह गए हैं लोग किसी भी कारण से मतदान अधिकार का उपयोग नहीं कर सके हैं. तो क्या 2026 के चुनाव का इनका मतदान का अधिकार फ्रीज हो गया है या कोई रास्ता ऐसा है कि इनको फिर से मतदान का अधिकार दिया जाए तो कॉम्प्लिकेटेड एंड प्रैक्टिकल इशू है. तो देखिए इसमें आगे जैसे-जैसे सिचुएशन डेवलप होगी तो मालूम पड़ेगी. 

सवाल- एसआईआर के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने 16 अप्रैल को अपने फैसले में चुनाव आयोग से कहा है कि जिन 34 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से कटी हैं एसआईआर ट्रिब्यूनल 21 और 27 अप्रैल तक अगर उनके पक्ष में फैसला कर देता है तो उन्हें मतदान का अधिकार होगा इसे आप कैसे देखते हैं?

बिल्कुल सही मैंने जो आपसे कहा ना नेचुरल जस्टिस सुप्रीम कोर्ट का दैट वे उसी 34 लाख लोगों के बारे में ये कह रहे हैं कि जो ट्रिब्यूनल में पेंडिंग है केसेस जो पहला चरण क्या उसका मतदान है 23 तारीख को ठीक ठीक? अगर 21 तारीख तक ट्रिबनल कुछ लोगों का क्लियर कर देता है उन लोगों को वोटिंग का अधिकार मिल जाएगा. वेरी फेयर डिसीजन. और इसी तरह से 29 का जो है उसमें 27 तक अगर लोग अपना अधिकार पेश करते हैं और ट्रिब्यूनल उन्हें क्लियर कर देता है तो वो लोग वोट कर सकेंगे. ठीक? तो यह एक अपॉर्चुनिटी सुप्रीम कोर्ट ने दी 34 लाख लोगों का जो झगड़ा आगे जाकर कंप्लिकेट होने वाला है. तो सुप्रीम कोर्ट ने एक और अपॉर्चुनिटी दी है कि अगर आप चाहो तो जितना जल्दी से जाके ट्रिनल अपना केस क्लियर करवाओ ताकि एट द एंड ऑफ़ द डे वो 34 घट के 24 रह जाए, 25 रह जाए, 30 रह जाए जितने लोग वोटिंग अधिकार का उपयोग कर सकते हैं. कम से कम वो तो कर लें उसका उपयोग. इसका मतलब यह है कहने का. तो एक अच्छा प्रयास है. लेकिन आज मैंने पढ़ा कि जो अब 23 तारीख का जो है पहला चरण है उसके सिलसिले में अभी तक कोई एक व्यक्ति भी ऐसा नहीं पहुंचा है ट्रिबनल में जिसका केस फाइनल हो गया हो. लेकिन एक अपॉर्चुनिटी दी है सुप्रीम कोर्ट ने. दैट इज सो दिस इज ऑल. 

सवाल- मैंने सुना है कि एसआईआर के मुद्दे को लेकर मथुआ वोटर्स में बीजेपी के प्रति कोई नाराजगी दिखाई दे रही है. क्या आपके पास भी कोई ऐसा फीडबैक है? 

सुना था मैंने पढ़ा था. पिछली बार मथुआ वोटर्स हैं तो इंपॉर्टेंट बीजेपी के साथ ही खड़े हुए थे. उसमें एक बांग्लादेश जो माइग्रेंट आते हैं वो भी शामिल हैं. तो उनका ऐसा इंप्रेशन था कि सरकार ने वहां लोकल एडमिनिस्ट्रेशन ने या भाजपा ने ये अश्योर किया उनको कि आपको वोटिंग राइट दिलवाएंगे. आपको सिटीजनशिप राइट्स दिलवाएंगे. वो कई कारणों से चलते हुए काफी नेशनल सिक्योरिटी के इशज़ हैं. दूसरे इश्यूज हैं वो नहीं हो पाए. तो उन लोगों में थोड़ा सा निराशा का भाव है. हमसे वादा किया था. वादा पूरा नहीं हुआ. बट लोकल लीडरशिप बीजेपी की वहां जो है वह उसको टैकल कर रही है. आई थिंक दे विल सॉर्ट इट आउट. 

सवाल- असम में ही रिकॉर्ड मतदान के बाद पश्चिम बंगाल में भी इस कारण रिकॉर्ड मतदान हो सकता है क्योंकि अगर इस बार वोट नहीं किया तो उनका नाम वोटर लिस्ट से हट सकता है. उनकी वोटर आईडी कार्ड रद्द हो सकती है. इस डेवलपमेंट को आप सर कैसे देखते हैं? 

ये तो बहुत ही गंभीर डेवलपमेंट है. इसके दो पहलू हैं. एक अच्छा पहलू होती है कि इस बहाने चलो हर आदमी वोट डालने आ रहा है. तो बार-बार केंद्र सरकार सोचती है कि मतदान के अधिकार को क्या अनिवार्य किया जाए. तो ऐसा इस इस सिस्टम के कारण से ऑटोमेटिकली वह लागू हो गया है. कानून बनाते अगर आपके वोटिंग देना जरूरी है तो शायद हो सकता है इतने लोग नहीं आते कोई मेडिकल देता कोई कुछ करता आपके आगे सुट स्विस स्पोर्ट्स जो है लोग बड़ी संख्या में आ रहे हैं. पूरे देश में बांग्लादेशी वर्कर काम करते हैं. घरों में काम करते हैं. डोमेस्टिक हेल्प काम करते हैं. नोएडा है तो पूरा नोएडा खाली पड़ा है. पूरा देश ही खाली हो गया. एक तरह से सब लोग ट्रेन में जा रहे हैं. कोई बस से जा रहा है. कोई टिकट में इसको ₹8000 की मिल रही है तो उसमें ले रहा है. अभी राजस्थान से कुछ लोग जा रहे हैं. ₹32 पर पर्सन चार्ज कर रहे हैं. बस जा रही है भर के वहां पे जो है तो एक माहौल बन गया है कि अगर हमने वोट नहीं दिया तो हमारा वोटिंग का अधिकार खत्म हो जाएगा. हमारा ये जो कार्ड है वोटिंग का आधार कार्ड है ये सब कैंसिल हो जाएगा. हमें कोई सरकार की सहायता नहीं मिलेगी और बाद में सरकार यह कहेगी कि आप तो बांग्लादेश हो. आप पास वैलिड डॉक्यूमेंट्स नहीं है. हमें निकाल बाहर करेंगे बंगाल से. तो ये मैसेज ट्रेवल कर गया पूरे कंट्री के अंदर. तो पूरे कंट्री में जो बंगाली वर्कर है वह सब बसों में भर के रेल में भर के गाड़ी में भर के जैसा है रेल मंत्री ने दो स्पेशल ट्रेनों की घोषणा करी बॉम्बे हावड़ा की दो ट्रेन से भी क्या होगा दैट वे हजारों मतलब ये दूसरा कोरोना काल शुरू हो गया दैट वे लोगों के जाने का घर छोड़ के जाने का अपना स्थान छोड़ के घर वापस लौटने का अब कई तो लोग ऐसे हैं वापस ही नहीं आएंगे वहां से कईयों को किसी ने कहा कि नौकरी चली उसने कहा चली जा चली जा नौकरी वोट देके आना है पहले जाकर के और फिर दूसरा क्या है कि यहां पे पैसे दे रहे हैं लोग उनको किराया भी दे रहे हैं, दो पैसे भी दे रहे होंगे साथ जाने के लिए. तो पूरे देश में गलत नहीं हलचल पैदा हो गई है और ये डिपेंडेंस जो है बंगाली वर्कर्स पे डोमेस्टिक हेल्प की जो है वो बड़ा क्राइसिस पैदा हो गया घरों के अंदर और सब जगह जो है तो ये तो सिचुएशन है बिल्कुल लेकिन अच्छा पहलू इसका ये है कि चलो हर आदमी वोट देने तो जा रहा है वो जो बेसिक एक नेशनल कर्तव्य है या चुनाव आयोग का काम था कम से कम वो तो पूरा हो रहा है. 

सवाल- बंगाल से लेकर केरल तक आखिर क्या है मछली का चुनावी खेल?

मछली का चुनाव में क्या होता है कई बार गसिप चल जाती है ममता बनर्जी ने गसिप चला दी वहां टीएमसी ने गोसिप चला दिया इसको कि बीजेपी वाले आएंगे तो मछली मांस खाना बंद कर देंगे तो इतनी इमोशनल अपील थी और इतनी टची थी कि बीजेपी वालों को टोकरे में भरभ के मछलियां ले जाना पड़ा चुनाव प्रचार करते समय एक आदमी 5 किलो की मछली लेके चला गया वो छोटी मछलियां लेके बांट रहे हैं कर रहे हैं केरल में राहुल गांधी के तो राहुल गांधी मछली लेके चल दिए वहां पे दैट केरल में भी ये स्थिति है. तो क्या है कि जिस प्रकार से नरेंद्र मोदी ने जो है धार्मिक और सांस्कृतिक अपनी भिन्नता दिखाने के लिए पहचान के लिए पहनावे को बनाया था तो ममता वगैरह ने खानपान को उसका बना लिया कि हमारी संस्कृति इस तरह से है. वेरी डैमेजिंग टू बीजेपी लेकिन लगता है शायद अब ठंडा पड़ गया मामला जिस ढंग से उठा था यह अफवाह उठी थी अब थोड़ा शांत है. 

सवाल- क्या आप हमें पश्चिम बंगाल में टीएमसी और बीजेपी के घोषणापत्र की तीन-तीन बड़ी बातें बताएंगे? 

बीजेपी का जहां तक सवाल है वहां तो एक उनके पास में अमोग अस्त्र है. नरेंद्र मोदी की छह गारंटी. फिर अवैध घुसपैठ का मामला है. अमित शाह कह रहे हैं देश है कोई धर्मशाला थोड़ी आएगा चला जाएगा. फिर सवार नागरिक कानून है उनके पास में. महिला कार्ड है. ₹3000 दे रहे हैं महिलाओं को. आप देख रहे हैं वुमेन सेफ्टी गार्ड कर रहे हैं. तो यह मोटे-मोटे तौर के जो ऑफ़र्स हैं फिर अब एक ऑफर बहुत बड़ा दे दिया है सेवंथ वेतन आयोग का जो है. तो यह तीन चार बड़े-बड़े उनके प्रस्ताव हैं. उनकी घोषणाएं हैं जो फील्ड में काम कर रही हैं इस समय. और टीएमसी की बात करें अगर तो टीएमसी कह रही है कि भाई वही ₹100 और ₹1700 दे रहे हैं. अभी एससी एसटी को ₹1700 महिला को और ₹1500 नॉर्मल इसको बढ़ाएंगे और फिर उन्होंने कहा कि ₹1500 हर बेरोजगार को एक भत्ता इस तरह का देंगे. सात नए जिले खोलेंगे करके वहां पे. ऐसी छोटी-मोटी घोषणाएं और जो है वहां पे उस तरह से कर रहे हैं. लेकिन घोषणाओं का ज्यादा जो गेम है वो बीजेपी खेल रही है इस समय बिटवीन द टू. 

सवाल- क्या आपको भी ऐसा लगता है कि पश्चिम बंगाल के सरकारी कर्मचारियों के बकाया डीए भुगतान और सातवें वेतन आयोग का जो मुद्दा है वो बीजेपी और टीएमसी के बीच एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन गया है. 

हिमाचल में ऐसे हुआ था. एक सरकार चुनाव हार गई थी सरकारी कर्मचारियों के कारण से. 6 लाख लोग थे वहां पे. यहां 9 लाख सरकारी कर्मचारी हैं. अब उनका डीए पेंडिंग है. ममता ने कहा मैं ₹100 करोड़ रिलीज कर दूंगी. अब वो चाहे 12,000 पेंडिंग है, 15,000 तो 10,000 करोड़ आपको रिलीज़ कर दूंगी. तो अमित शाह ने आगे बढ़ के कहा कि हम मतलब इसी को जो है सेवंथ कमीशन को पूरा लागू कर देंगे और 45 दिन में लागू कर देंगे. अब कुछ ही को क्रेडिबिलिटी मार्केट में तो अमित शाह की ज्यादा है. एज़ कंपेयर टू टीएमसी एज़ कंपेयर टू ममता गवर्नमेंट. तो लोग वहां भरोसा कर रहे हैं कि अमित शाह ने कहा तो काम होगा और अमित शाह के क्रेडिट चाहिए कि जो कहते हैं वो करते हैं उनका एग्जीक्यूशन परफेक्ट है दैट वे तो ये बहुत बड़ा मुद्दा है वहां पे डीए का और प्लस वेतन आयोग का जो है तो बीजेपी इसको एनकश कर रही है एंड आई एम श्योर बीजेपी विल गेन समथिंग आउट ऑफ इट 

सवाल- चुनाव प्रचार में ममता पर हमला बोलते समय बीजेपी के जो नेता हैं ममता दीदी द्वारा प्रधानमंत्री मोदी को 15 गालियां जो दी गई थी उसका प्रचार जमकर कर रहे हैं. क्या मतदाताओं पर इसका असर आप देख रहे हैं? 

यह तो क्या है ना पीटी हुई बातें हो गई एक तरह से नरेंद्र मोदी को गाली देना फिर पलट के जूता अपने सिर पर मारना एक तरह से अभी तक तो यही हुआ है जब जब गाली उनको दी गई तो उनको बेनिफिट हुआ है पार्टी को जो है लेकिन है इंटरेस्टिंग ये कि वहां पोस्टर लगे हुए हैं गाली नंबर एक बीजेपी स्मार्ट है ना कैंपेन में तो मास्टर गाली नंबर दो गाड़ी नंबर तीन ऐसे 15 गालियों का किया हुआ है उसका प्रचार प्रसार हो रहा है तो उसे क्या थोड़ा जो लोकल वर्कर है वहां बीजेपी का वो तो उत्साहित होता है और टीएमसी वाले थोड़ा डीमोरलाइज होते उनको लगता है कि हम इतने हैं कि प्राइम मिनिस्टर को गालियां दे रहे हैं. सो अ पार्ट ऑफ इलेक्शन गेमिक्स. 

सवाल- केंद्रीय मंत्री और पश्चिम बंगाल प्रभारी भूपेंद्र यादव और केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने यह दावा किया है कि इस बार पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार कुछ कहना चाहेंगे आप? 

हां बिल्कुल है कॉन्फिडेंट है वो तो प्रभारी है गोविंद यादव गजेंद्र सिंह शेखावत 35 का इंचार्ज है दैट वे जो है और वो निश्चित है इनका गजेंद्र सिंह शेखावत का कहना है कि वी आर वेरी क्लोज टू फॉर्म द गवर्नमेंट जो है और 35 सीटें हैं तो मैं अधिकांश सीटें इसमें जीत के लाऊंगा राजस्थान के बहुत से लोग एक्टिव हैं इनके अलावा सुनील बंसल हैं राजेंद्र राठौड़ हैं शायद घनश्याम तिवड़ी गए हैं कुछ और जा रहे हैं जा ही रहे हैं लोग राजस्थान से तो मारवाड़ी वोटर है अभी चीफ मिनिस्टर गए थे सिलीगुड़ी में बड़ी अच्छी मीटिंग सरी उन्होंने तो उन्होंने कहा कि लोगों ने मन बना लिया है अब यहां भगवाएगा यहां पे और फिर कहा कि वी विल फॉर्म द गवर्नमेंट विद कंप्लीट मेजॉरिटी इन वेस्ट बंगाल तो अच्छा है कॉन्फिडेंस है इन लोगों का और राजस्थान के लोगों ने वहां मोर्चा संभाल रखा है.

सवाल- अकेले ममता बनर्जी के चुनावी क्षेत्र भवानीपुर में 51000 वोटर्स के नाम कटे हैं. इसका क्या प्रभाव पड़ेगा उनकी जीत की संभावनाओं पर? 

यह तो 4 तारीख को मालूम पड़ेगा क्योंकि ऐसे ऐसे गुगली है. मैंने कहा ना आपसे अब 51000 वोट कटे हैं. कितने हिंदू थे, कितने मुस्लिम थे कुछ पता नहीं है. एग्जैक्टली और है तो तो मुस्लिम में भी क्या है? किसने किसको वोट दिया? हिंदू में किसने वोट दिया. आप यह तो कह नहीं सकते कि ममता इस बैंड फॉर हिंदू वोट्स. ममता पूरा वो करती है सारा मंदिर मंदिर का, पूजा का, इसका देवी, शक्ति सारा जो है तो आप मान के चलिए नहीं करते-करते 25% वोट तो ममता को हिंदू का जाता होगा. अब ठीक है इस बार पोलराइजेशन हो गया हिंदू वर्सेस मुस्लिम कंप्लीटली तो हो सकता है ममता को हिंदू को वोट उस तरह से नहीं पड़े जैसे पहले पड़ता था दैट वे तो अब देखिए इसमें वोट कटे हैं पिछली बार जो ममता जो है चुनाव जीती थी 58000 वोट से टोटल वहां पे अब 51000 वोट कट गए हैं और इसका एक्चुअल इंपैक्ट क्या है ये चुनाव परिणाम के दिन ही मालूम पड़े क्योंकि एसआईआर का जो भी इंपैक्ट है उसको एग्जैक्टली कोई आदमी जज नहीं कर पा रहा है कोई एजेंसी कोई सर्वे अब इसको जज नहीं कर पा रहे हैं एट द मोमेंट जो है लेट्स सी.

सवाल- ममता के सामने भवानीपुर और दूसरी सीट नंदी्राम से चुनाव लड़ रहे शुभेंदु अधिकारी क्या यह चुनाव जीत रहे हैं और क्या लगता है क्या होगा उनका राजनीतिक भविष्य?

भविष्य तो उनका क्लियर है जीत जाएंगे तो चीफ मिनिस्टर बनने की स्थिति में है ऐसा लगता है बाय लार्ड तो और जीतने की जो बात है तो दो सीट से लड़ रहे हैं तो ममता के सामने जीतना तो इस बार थोड़ा सा मुश्किल लग रहा है ऐसा नहीं लग रहा ममता कितना ही लूज़ कर जाए नंदीग्राम में हार गई थी पहले हालांकि लेकिन लगता नहीं कि वो हारेंगे और लोगों को आईडिया रहता है अभी ममता को चलो जीतने दो इनको यहां से जीता देते हैं दूसरी कॉन्स्टिस्टंसी से तो दूसरी कॉन्सटेंसी से जीता देंगे उनको वहां से जो है और पॉलिटिकल फ्यूचर क्लियर है उनका ही इज़ ब्लू हेड ऑफ नरेंद्र मोदी अमित शाह एट द मोमेंट जो है सो ही इज़ सेफ 

सवाल- आज पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी किन-किन मोर्चों पर लड़ रही हैं? वो सब मोर्चों पे लड़ रही हैं. 

देखो पहले तो अपनी पार्टियों में लड़ती रहती हैं. ये सुध निकल के आए हैं. वहां से पार्टी के संघर्ष से आपसी झगड़ों से लड़ के आई हैं. फिर कभी-कभी क्या है? अपने भतीजे से लड़ लेती हैं. वहां पर जो है आप देखते हैं मतलब विदिन पार्टी फिर गवर्नर से लड़ लेती हैं. फिर क्या दिल्ली में ईडी वालों से लड़ लेती हैं. फिर यहां आके वित्त मंत्री से अमित शाह से सबसे लड़ लेती हैं. दैट कभी-कभी साल में एक आध बार जो है प्रधानमंत्री से भी लड़ लेती हैं. कुछ ऐसा कह देती हैं. बोल देती हैं वहां पे. वो भी क्षमा भाव रखते हैं कि ठीक है ममता है. ठीक है. वो जानते हैं कि लड़ना इनका पैशन है. जैसे इजराइल का प्रधानमंत्री है वो, लड़ना उसका पैशन है. 24x7 तो ममता कहती तो संघर्ष नहीं करे वो नहीं करे उसको राज चलाने का मजा नहीं आता. राज के अंदर हो, राज के बाहर हो, लड़ना उसका पैशन है. तो लड़ रही हैं. उनका यह जीवन इसी में खुश है. अभी वो सफेद साड़ी और चप्पल में जा रही है. आ रही हैं. चल रहा है. 

सवाल- अमित शाह ने कहा है कि ममता बनर्जी अपने भतीजे को मुख्यमंत्री बनाना चाहती हैं. इसके मायने क्या है? 

ये तो उन्होंने ऐसे शगुफा छोड़ दिया. थोड़ा सा होता है लोगों को कंफ्यूज करने के लिए करने के लिए कि कोई नहीं छोड़ता सीएम की कुर्सी. ना पुत्र के लिए कोई छोड़े, ना कोई भतीजे के लिए छोड़े. कोई चांस ही नहीं है. अमित शाह ने ऐसे मजे लिए हैं लाइट पॉलिटिकल मूड के अंदर जो है तो कई लोग भ्रमित हो भी जाते हैं और फिर सोचते हैं ममता क्यों वोट दें? यह तो रहेगी नहीं. चलो भाजपा को भी वोट देते हैं चल के. लाइट मूड कमेंट. 

सवाल- बूथ कैप्चरिंग और वोटर्स को धमकाने के माहौल में गृह मंत्री अमित शाह ने टीएमसी वर्कर्स को जो दो टूक चेतावनी दी है उसे आप कैसे देखते हैं? 

चेतावनी सीरियस है और ये भाषा केवल अमित शाह ही बोल सकते हैं. उन्होंने कहा टीएमसी के गुंडों को चेतावनी देता हूं कि 4 तारीख को घर में ही रहना. बाहर मत निकलना, बूथ मत लूटना. मैं तुम्हारे लिए तो 5 तारीख को हिसाब करूंगा. तो भाषा वही समझते हैं और अमित शाह को ये भाषा बोलनी आती है. तो उसका इफेक्ट है. दूसरा उन्होंने कहा कि मैं 15 दिन के लिए आ रहा हूं यहां पे. 15 दिन बंगाल में रहूंगा वहां आकर के जो है तो इंपैक्ट है उनका. तो इससे थोड़ा डर का माहौल बनेगा वहां. और ऐसी आशा की जानी चाहिए कि लोग जो जाएंगे डिस्टर्ब करने, चुनाव के माहौल को टपरिंग करने जाएंगे वो रुकेंगे थोड़ा. ऐसा लगता है 

सवाल- बंगाल के एक चुनावी जनसभा में अमित शाह ने भावी मुख्यमंत्री के को लेकर संकेत दिए हैं. क्या है सर वो संकेत? 

संकेत के लिए अगर बार-बार वो ममता ने जैसा माहौल बना दिया ना कि आउटसाइडर आएगा मछली बंद हो जाएगी. यह बंद हो जाएगा. तो वो ये कहना चाहते हैं कि नहीं जो मुख्यमंत्री बनेगा यहां वो बंगाली मूल का होगा. बंगाल की मिट्टी में जन्मा और पला होगा. बंगाल में उसकी एजुकेशन होगी. बंगाली भाषा बोल रहा होगा. और एक और मंत्री ने पिछले दिनों मछली विवाद हुआ तो कह दिया कि नहीं ममता की तरह हमारा मुख्यमंत्री भाजपा का मुख्यमंत्री नॉन वेजिटेरियन होगा. सो दिस इज ऑल बाकी अमित शाह तो देखो डिसीजन मेकिंग प्रोसेस का वेरी इंपॉर्टेंट पार्ट तो उनको अभी से आईडिया होगा इस बात का कि अगर सरकार बनती है तो मुख्यमंत्री कौन होगा तो अच्छी बात है कि बंगाल के अंदर पर्ची सिस्टम लागू नहीं हो रहा मुख्यंत्रियों का होता है कांग्रेस में होता था और बीजेपी में होता है कि पर्ची गिरी नाम निकल गया लेकिन अब तो लगता है ग्रास रूट की बात हो रही है और अमित शाह का जो स्टेटमेंट है एक अच्छी बात है ग्रास रूट वर्कर का सम्मान है ये.

सवाल- क्या ये सच है कि बंगाल में मतदाता विशेषत महिलाओं की अगर बात करें तो टीएमसी के लोगों का भय और डर का माहौल है. 

हां यह तो है अभी अदिती गई थी. इन तीन दिन के लिए वहां पर जो है महिलाओं से मिली उत्तर बंगाल में तो वाकई डर है और इतनी बातें आ रही है तो सच भी होंगी जो है कि टीएमसी के वर्कर हैं या टीएमसी के कोई मतलब अनसोशल एलिमेंट्स हैं वो धमकाते करते हैं औरतें वोट देने से डरती हैं कई औरतें कहती है कि वोट तो दे देंगे हमारे आदमी को फिर पीटेंगे एक आम इंप्रेशन है सच है नहीं है लेकिन इंप्रेशन जो लोगों में वही है. फिर औरतें यह भी कहती है चलो हम हिम्मत करके वोट दे भी देंगे बीजेपी को जाकर के. तो ये गुंडे जब पीटने आएंगे तो हम किसके पास जाएंगे? हम बीजेपी के लोगों को फोन करेंगे. वो फोन ही नहीं उठाते हमारा. तो एक मतलब सेंस ऑफ़ फियर तो है वहां पे. हम ये तो मानना पड़ेगा. और उस फियर से कितना लोग निकल पाते हैं, कितना नहीं निकल पाते हैं. अब जैसे गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि जो 2011 में माहौल था ममता के आने से पहले लेफ्ट पार्टीज के प्रति और साइलेंट रिवोल्यूशन था वही माहौल इस बार यहां दिखाई दे रहा है. तो हो सकता है वुमेन एंड ब्लॉक जो है ना ममता के खिलाफ वोट करने जा रही हो बीजेपी को एज अ साइलेंट रिवोल्यूशन जो है दिस इज़ सीन. लेकिन ये बात सच है कि फियर का वहां माहौल है. यह सभी लोग स्वीकार करते हैं.

सवाल- मैंने सुना है कि नंदी्राम में शुभेंदु अधिकारी ने प्रवासी मुस्लिम वोटर्स को दो टूक चेतावनी देते हुए कहा कि वोटिंग के बाद जाना तो है तुम्हें बीजेपी शासित राज्यों में काम करने. कुछ कहना चाहेंगे आप इस पर? 

अनफॉर्चूनेट है. ये भी थोड़ा साइकोलॉजिकल है. इमैच्योर है. डजंट सूट हिज स्टेटस. इतने अच्छे व्यक्ति हैं वो. इतनी सीनियर पोजीशन पे हैं. डायरेक्ट एक्सेस है. नरेंद्र मोदी अमित शाह दोनों के लाडले हैं. आपको क्या जरूरत है सब इस तरह की बात करने? आप वैसे चुनाव जीत रहे हैं. अब कभी-कभी क्या होता है आदमी भावना में कोई स्टेटमेंट दे देता है. फिर मीडिया पकड़ लेता है उसको. तो इस केस में यही हुआ है कि उनके मुंह से कोई बात निकली होगी इस तरह से मीडिया ने पकड़ ली. भाई गलत है. नहीं होना चाहिए. उनके स्टेटस को सूट नहीं करता. 

सवाल- पश्चिम बंगाल में भी बीजेपी ने इस बार भी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया है. किसी भी आप कैसे देखते हैं बीजेपी के इस इलेक्शन स्ट्रेटजी को? 

ये तो वेल थॉट है. एक अच्छी बात ये है कि वो छिपाते नहीं इस बात को. उनकी क्लेरिटी है उसके अंदर. हिंदू पोलराइजेशन कह दो, हिंदू प्रेफरेंस कह दो, कुछ भी कह दो, नहीं देते. और सबसे बड़ी बात यूपी जैसे राज्य में भी बिना मुस्लिम को टिकट दिए हुए, बिना मुस्लिम सपोर्ट के वो लोग सरकार बनाते हैं. इट्स रियली मिरेकल. तो उनकी एस्टैब्लिश पॉलिसी, उनकी स्ट्रेटजी है जो उनको सूट कर रही है. 

सवाल- मुस्लिम्स के विपरीत इस बार बीजेपी ने बंगाल चुनाव में आध्यात्मिक और धार्मिक कार्ड खेलते हुए साधु संतों, सन्यासियों, महंतों, पुजारियों को टिकट दिए हैं. सर जीत की कितनी संभावना है? 

वो जीत डिपेंड करेगा किस एरिया से खड़े हुए हैं. जो हार्ड कोर एरियाज हैं टीएमसी अगर वहां से खड़े हुए हैं तो हार जाएंगे. लेकिन फिर भी जो इसमें माहौल है बंगाल में वो काफी हिंदू सेंटीमेंट का काफी एंपावरमेंट है. काफी माहौल है. तो मान लो सात लोग खड़े हुए हैं तो तीन चार जीत जाएंगे. दो तीन हार जाएंगे लेकिन बीजेपी की वेल थॉट स्ट्रेटजी है फिल्म वालों को देना गायकों को देना लोकप्रिय उनका तो यह है किसी न किसी तरह से चुनाव जीतना है चुनाव में एक ही लक्ष्य है वैल्यू सिस्टम एक तरफ चुनाव की विक्ट्री एक तरफ चुनाव जितनात है उसी का पार्ट है ये और इसका जो बेसिक एजेंडा हिंदुत्व का है आरएसएस के साथ उसको प्रमोट करते हैं ये तो उनका वेल्थ थॉट है ये 

सवाल- कोलकाता के एक मशहूर हार्ट स्पेशलिस्ट प्रकाश कुमार उन्होंने अपने क्लनिक में जय श्री राम बोलने वालों को पांच सौ छूट देने की घोषणा की है. आप कैसे देखते हैं इसको? 

इंटरेस्टिंग लोगों का उत्साह है भगवान राम के प्रति, भाजपा के प्रति तो उन्होंने कह दिया मेरे यहां जो इलाज कराने आएगा जय श्री राम बोलेगा उसे ₹500 दूंगा. हल्ला हुआ टीएमसी ने अपोज किया. लोगों ने कहा समाज को बांट रहे हैं कर रहे हैं. डॉक्टर को पूछा किसी ने भी क्यों कर रहे हो? ऐसा. तो उसने कहा मेरा ये पॉलिटिकल फ्रीडम एक्सप्रेशन है मेरी. मेरी चॉइस है. मैं बोल रहा हूं. ऐसी गॉसिप और एक लाइट मूड की बात है. कोई सीरियस विषय नहीं है. 

सवाल- आपको क्या लगता है इस बार कोलकाता में क्या होगा सिनेरियो? 

देखो इस बार तो बीजेपी विल इंप्रूव 2021 में पिछले चुनाव में सारी की सारी टीएमसी के पास थी और जो 2024 में इलेक्शन हुए पार्लियामेंट के भी तो बीजेपी ने बहुत इंप्रूव कियाक में तो उसी प्रपोर्शन में सीटें भी इंप्रूव करेंगे तो मुझे ऐसा लगता है मोटे तौर पे कि 50% सीट्स जो है ना इस बारक में बीजेपी को जा सकती है ऐसा लगता है.

सवाल- इस चुनाव में कांग्रेस अकेले यहां यहां पर पश्चिम बंगाल के अंदर चुनाव लड़ रही है. क्या लगता है आपको कितनी सीटें मिलने की संभावना है?  साथ ही अगर जरूरत पड़ी तो क्या ममता को कांग्रेस सपोर्ट करेगी? 

सवाल यह है कि सपोर्ट का विषय तो बाद में है. आपने कहा ना कि 294 सीट्स है तो 284 पे शायद लड़ रही है कांग्रेस दिशाहीन. कोई मतलब नहीं है. पिछले चुनाव में जीरो सीट्स 3% का वोटिंग. उससे पहले 2016 में 44 सीटें आई थी. आगे बढ़ सकते थे. लैक ऑफ लीडरशिप लैक ऑफ कोऑर्डिनेशन था. अब अकेले चल दिए हैं. अकेला चल रहे हैं. तो मुश्किल से मुझे तो लगता है चार पांच सीट ही आएंगी कांग्रेस की. ऐसा लगता है मुझे अनुमान है. अब चार पांच में क्या तो सपोर्ट दोगे क्या सपोर्ट लोगे और ममता आएगी तो तो क्लियर मेजॉरिटी से आएगी अगर आएगी तो. मुझे लगता नहीं उसको आपकी चार सीट की आवश्यकता पड़ेगी. अगर ऐसा है तो एट दैट वे और जरूरत पड़ी तो देंगे. कांग्रेस वाले भाग के दे देंगे. वहां तो कोई इशू नहीं है उनका कि उनको फिर नरेंद्र मोदी हमेशा दिखते हैं ना सामने कि चलो एक सरकार दूसरी बनती है. लेकिन अभी इसकी कोई संभावना नहीं है कि ममता अगर सरकार बनाती है बाय द वे तो उसको इनके तीन चार सीट्स की आवश्यकता हो ऐसा लगता नहीं है. 

सवाल- पश्चिम बंगाल में राहुल गांधी की इतनी लेट एंट्री हो रही है. तो आपको ऐसा लगता है कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु दोनों ही जगह राहुल गांधी के लिए चुनाव खत्म हो चुका है.

कांग्रेस तो देखो वन मैन शो है ना. लोगों ने बोलना ही बंद कर दिया. कुछ कहना सुनना बंद कर दिया है. उनकी मर्जी है. राजा है वो तो पार्टी के तो केरल में चले गए. तमिलनाडु नहीं गए तो नहीं गए. अब जा रहे हैं. गठबंधन है वहां. लड़ झगड़ के सीटें तो आपने 28 कर ली अपनी जो है पिछले साल 18 एमएलए जीते थे. नौ एमपी हैं. इतना स्ट्रांग बेस जिस राज्य में है उसको आप इतना लाइटली ले रहे हो. जिस साथ आपका जो है अलायंस है उससे आप मिल नहीं रहे हो. उससे बात नहीं कर रहे हो. खाली फॉर्मेलिटी के नाते जा रहे हो. तो यह फैक्ट है कि इन पांच राज्यों के चुनाव में कांग्रेस लीडरशिप बटी हुई थी टुकड़ों के अंदर. इस राज्य में तो कुछ कर लेंगे. इस राज्य में कुछ नहीं करना है. तो ठीक है. जैसे डिक्लाइन है कांग्रेस का. दिस स्टोरी इस पार्ट ऑफ़ दैट डिक्लाइन. दैट्स ऑल. 

सवाल- पश्चिम बंगाल में चुनावी प्रचार प्रसार के दौरान शुभेंदु अधिकारी एवं अन्य बीजेपी नेता और आम जनता उन्नयन पार्टी के नेता हुमायूं कबीर के बीच में ₹1000 करोड़ की कथित एक चुनावी डील का वीडियो वायरल हुआ. तो इसका कितना नुकसान बीजेपी को? 

अब तो कोई खास नहीं है. सबसे अच्छा काम क्या हो गया कि वीडियो सच है, झूठ है. लेकिन एक बयान देने की जरूरत है आपको. क्या है कि यह एआई जनरेटेड है. तो कबीर ने बयान दे दिया ये जनरेटेड है. मान लिया देश ने तो सारे वीडियो जितने भी हैं तो ब्लैकमेलर्स के लिए बड़ी बुरी खबर है ये कि वो जेन्युइन भी वीडियो उनके पास किसी बात का होगा संसार में. ठीक है ना? तो ऐसे धुल जाएगा. सामने वाला यही कह देगा साहब ये तो एआई जनरेटेड वीडियो है. तो इसका कोई इंपैक्ट नहीं होगा. जैसे सोचा था ना कि एकदम से हल्ला मचेगा. कोई ज्यादा इंपैक्ट हुआ नहीं. मतलब वेरी नॉमिनल इंपैक्ट नेगेटिव इंपैक्ट वेरी नॉमिनल कोई बड़ी बात नहीं हुई. दूसरा क्या है कि बीजेपी को तो कोई ज्यादा नुकसान नहीं हुआ. एक नुकसान ये हुआ कि ओबीसी ने उससे अपना गठबंधन तोड़ लिया. तो ओबीसी और कबीर मिलके दो चार पांच 10 सीट मुस्लिम लाते बीजेपी को फायदा होता है इनडायरेक्टली. वो अपॉर्चुनिटी उनके हाथ से चली गई. अब 182 सीट पे खुद ही चुनाव लड़ रहे हैं. तीन पे खुद ही चुनाव लड़ रहे हैं. क्या तो जीतेंगे और क्या होगा? तो कबीर मे बी ए पार्ट ऑफ हिस्ट्री इन अ वे इन द कमिंग डेज. ऐसा लगता है मुझे. 

सवाल- भाजपा ने अभ्या की मां रत्ना देवनाथ को चुनावी मैदान में उतारा है. उनकी जीत की आप क्या संभावना देखते हैं? 

जीतना चाहिए मेरे ख्याल से क्योंकि उस ट्रेनी डॉक्टर जो हॉस्पिटल में थी उसकी मां है. जिसके साथ बहुत दरिंदगी हुई थी. बलात्कार और मर्डर की बात आई थी. मुलजिम पकड़े भी गए थे. उसके बाद में 42 दिन तक जो है वहां आम जीवन अस्तव्यस्त रहा था. हड़ताल रही थी हॉस्पिटल में और उस घटना का सिंबॉलिक इंपैक्ट पूरे देश में गया था. बहुत ज्यादा बदनामी हुई थी बंगाल की जो है और उनकी मदर हैं ये तो सहानुभूति का पात्र मुझे लगता नहीं कोई अपोज करेगा उसको. आई थिंक थोड़े बहुत मार्जिन से चुनाव जीत जाएंगे. 

सवाल- आपको क्या लगता है चुनाव के बाद क्या अलग से बंगाल में पश्चिम बंगाल में एक नेपाली भाषी गोर्खालैंड बनेगा? 

गोरखालैंड सब्जेक्ट ऑफ पॉलिटिकल कंट्रोवर्सी गेन हर पार्टी अपने एजेंडा में गोरखा ले ले जिस बारे लोगों ने किया तो अमित शाह ने क्लियर किया उन्होंने कहा कि बंगाल का विभाजन किए बिना ही संविधान के प्रावधान के तहत ही इस पर विचार करेंगे. दैट वे मतलब कहने का है कोई कोई कोहना इसमें कोई खास नहीं है. दैट वे ये जरूर उन्होंने कहा है कि सहायता बढ़ा देंगे. बड़े-बड़े जो है मेजर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स जो है वो वहां पर बना देंगे. वहां पे वैसे ऑलरेडी गोखालैंड टेरिटोरियल अथॉरिटी बनी हुई है और वो 2011 में बन गई थी और 2017 तक फिर भी विवाद चलता रहा. तो गोर्खालैंड का विवाद अनकल्ड फोर है. होना कुछ नहीं है. जो होना था सरकार जो कर सकती थी सरकार कर चुकी है. अब तो चुनाव के साथ ही बात भी खत्म हो जाएगी. 

सवाल- पश्चिम बंगाल के अंदर चुनाव प्रचार में उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ के रोल को आप कैसे देखते हैं? 

वो तो पॉपुलर हैं, क्राउड पुलर हैं. वो तो हीरो हैं. एक तरह से रीजनल लेवल पे हीरो हैं जो है और वहां लोग बंगाल में भी कह रहे हैं एक सप्ताह के लिए योगी जी दे दीजिए आप तो उनको वहां पे जो है कहते हैं आपका जो मॉडल है बुलडोजर वाला बड़ा हिट है. बंगाल को योगी जैसा प्रशासक चाहिए और योगी जी लगातार पिछले कुछ दिनों से प्रचार कर रहे हैं. क्राउड आ रही है वहां पे. सेंट्रल लीडरशिप को पता है क्राउड पुलर है तो हर चुनाव में उनकी ड्यूटी लगती है. वो वहां पे गए हुए हैं और कुल मिला के क्या है कि योगी का जो एक्सपेरिमेंट है बंगाल में वो मीनिंगफुल है और ये आप देख लेना उसकी स्ट्राइकिंग रेट बहुत हाई रहती है. तो जहांजहां योगी जा रहे हैं उन सीटों पे टीएमसी को बहुत टफ कंपटीशन होगा और योगी के जाने का एक है ना मतलब साइजबल इंपैक्ट आपको दिखाई देगा. जो रिजल्ट आएगा तो आप कह सकेंगे आप लोग कि यह 12-15 सीटें जो योगी की उससे आई है. 

सवाल- नेताजी सुभाष चंद्र बोस के प्रपोत्र चंद्र कुमार बोस ने 3 साल पहले बीजेपी छोड़ी और अब टीएमसी ज्वाइन की तो आप इस डेवलपमेंट को कैसे देखते हैं? 

कोई खास नहीं है. अब स्पेंट फोर्स है वो बस एक नॉमिनल वैल्यू है उसकी. ठीक है. उन्होंने बयान दे दिया कर दिया. एक ना तो उनको चुनाव लड़ना है ना कोई बात है. और स्पेंट फ़ है. अब उसका कोई ज्यादा इंपैक्ट नहीं. उसका एक जमाना था जब बीजेपी में हल्ला हुआ था उनको लेकर के. आज ममता की छांव में आ गए हैं तो ठीक है लोग थोड़ा सा नोटिस लेंगे फिर आगे बढ़ जाएंगे नॉट मच इंपैक्ट सर मैंने टीएमसी में रहकर पाप किया है और अब मैं प्रायश्चित कर रहा हूं बीजेपी के एक प्रत्याशी हैं देवेंदु अधिकारी उनके पिता ने चुनावी सभा में ऐसा क्यों कह दिया कह दिया टीएमसी के साथ रहे होंगे बहुत साल तक उनके साथ रहे और पार्टी छोड़ दी टिकट मिल गया यहां आ गए तो आदमी करता है ना अपने मन का प्रायश्चित एक तो फेस वैल्यू वैल्यू पे करता है. मन से करता है. अब चेयर उन्होंने फेस वैल्यू पे लिया तो बीजेपी के लिए एक अच्छा मैसेज गया है कि टीएमसी का आदमी टीएमसी के खिलाफ बोल रहा है. आज हमारी शरण में बैठा हुआ है.

सवाल- इस बार आपने अपने मित्र डोनाल्ड ट्रंप के बारे में कुछ नहीं कहा. 

ट्रंप तो देखो क्या है कि ही इज बिकमिंग मोर वाइस मोर फ्लेक्सिबल मोर फेयर. एंड ट्राइंग टू अंडरस्टैंड द रियल मीनिंग ऑफ डिप्लोमेसी रादर देन थ्रेटनिंग एवरीबडी एंटायर वर्ल्ड एंड आफ्टर एव्री टू आवर्स देयर इज़ अ गुड डेवलपमेंट इन ह पर्सनालिटी एंड दिस विल बी विज़िबल इन एन ऑनगोइंग अमेरिका एंड ईरान टॉक्स? 

सवाल- क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिलवाकर राज्यसभा का चुनाव लड़वाना बीजेपी लीडरशिप का सबसे डिफिकल्ट और चैलेंजिंग ऑपरेशन था. 

ऑफकोर्स ये तो अमित शाह से पूछिए. उनके दिल से पूछिए कि किस तरह उन्होंने इस ऑपरेशन को किया होगा. सबसे पहले तो क्या सीटों का अरेंजमेंट था इलेक्शन के समय कितना मुश्किल था. करवाया जिद भी मानी कि चलो एक सीट ले लो यार एक्स्ट्रा ले लो. एक सीट ज्यादा है उनकी जो है फिर क्या है कि चुनाव हो गया. बीजेपी सिंगल लार्जेस्ट पार्टियां मर्ज हो गई. मुख्यमंत्री बनना था बीजेपी को नेचुरल चॉइस. माने नहीं. फिर सीने पे पत्थर रख के मुख्यमंत्री भी बनवाया. लेकिन मन में क्लियर था कि विद इन अ ईयर जो है भाजपा का मुख्यमंत्री आना है. कार्यकर्ताओं का दबाव है. बिहार वाज़ द ओनली स्टेट जहां कि भाजपा का चीफ मिनिस्टर नहीं था और सिंगल लार्जेस्ट आ गए आप. तो बेहतर था कि नीतीश कुमार आगे बढ़े. कहते कि ठीक है भाई पहले आप अब आप बनाइए सरकार. हम आपको सपोर्ट देते हैं. नहीं हुआ उसको हैंडल किया. शपथ हुई बीजेपी वालों को समझाया वर्कर्स को कि थोड़ा वेट करो. अब वक्त आ गया राज्यसभा का. तो राज्यसभा में वो फॉर्म भरेंगे कि नहीं? फिर यह हो गया इशू फिजिकली क्योंकि समय और स्थान का उनको ध्यान कम रहता नीतीश कुमार को हेल्थ रीज़ंस. तो अमित शाह खुद गए वहां और बैठ के अपने सामने बगल में फॉर्म भरवाया राज्यसभा का. नहीं हो जाए इसमें जो है फिर सवाल आया मुख्यमंत्री का इस्तीफा होगा तभी तो आगे बात बढ़ेगी ना जो है तो फिर यह क्या है कि मुख्यमंत्री का इस्तीफा करवाने के लिए गए बैठ के अपने सामने इस्तीफा करवाया तब ऑपरेशन पूरा हुआ लेकिन इस बार यह बात तय थी कि एनफ इज एनफ अगर दाएं बाएं हुआ तो फिर हम ऑपरेशन कर देंगे पार्टी भी खंडित हो जाएगी वैसे भी क्या है कि वो उसका रिमोट कंट्रोल जेडीयू का है मैं समझता हूं आधे तो दिल्ली के हाथ में ही है जो खास लोग हैं ललन सिंह हैं संजय झा है वो तो सब इधर शिफ्टेड ही हैं. दैट वे जो है शिफ्टेड इन द नेम ऑफ़ कोऑर्डिनेशन है जो जैसे भी है. तो ठीक है एक अनफॉर्चूनेट बात होने से टल गई. लेकिन आपका सवाल बिल्कुल सही है ये कि अमित शाह के पॉलिटिकल करियर का एक मोस्ट डिफिकल्ट एंड सक्सेसफुल ऑपरेशन जो है ना नीतीश कुमार रहा होगा. 

सवाल- ये क्या सच है कि सम्राट चौधरी के चयन में नीतीश कुमार का बेहद अहम रोल रहा. 

हां रोल तो रहा ही है क्योंकि सत्ता का मोह तो छूटता नहीं है ना. तो जाते-जाते भी वे कोशिश कर रहे हैं. कि उनकी चले हर मामले में जो है तो सम्राट चौधरी में चली उनकी वैसे भी क्या डेढ़ साल से दो साल से सम्राट चौधरी डिफेक्ट सीएम का रोल कर रहे थे अंडर सुपरविजन ऑफ़ दिल्ली दैट वे जो है फिर उन्होंने नीतीश कुमार ने कहा कि भाई यहां जो है समता जो राजनीति है समाजवादी राजनीति है उसकी जड़े बहुत गहरी हैं बिहार में तो मुख्यमंत्री का चयन करते समय इस बात को ध्यान रखा जाना चाहिए फिर यह भी कहा कि भाई सामाजिक और यह जो है संतुलन यह बहुत नाजुक इसका ध्यान रखना चाहिए इस तरह से और यह कह के सम्राट चौधरी की ताजपशी हो गई. हालांकि वह तो नरेंद्र मोदी हमेशा का फैसला था लेकिन सपोर्टेड बाय नीतीश कुमार नया कन्फ्यूजन वहां पे क्रिएट नहीं हो तो उनकी शपथ हो गई. अब ये वाकई एक बात है कि मैं कई बार ये नोटिस करता हूं. वो तो बोलते ही नहीं कभी. सम्राट चौधरी बस एक चेहरा है. बिल्कुल ऐसा लगता है जैसे कि बिल्कुल एक आदमी सेरेमोनियल आ रहा है जा रहा है. कभी उनको बोलते हुए ज्यादा नहीं सुना. अच्छी बात है. अच्छा ट्रंप की तरह रोज बोलना भी अच्छी बात नहीं. हर 2 घंटे में इनका बयान दे दें. वहां पे बैठ के जो है तो वो और बाकी उनका पॉलिटिकल करियर है कि वो सक्सेस है. पहले लालू के साथ थे. बिहार में वही चेहरा था. फिर नीतीश कुमार के साथ थे. उनका चेहरा था. अब भाजपा के साथ हैं. उनके मुख्यमंत्री हैं. तो वन ऑफ़ द मोस्ट सक्सेसफुल फ्लेक्सिबल पॉलिटिशियन इन बिहार पॉलिटिक्स.

सवाल- बिहार की जो नई सम्राट चौधरी सरकार है उसके सामने चुनौतियां क्या हैं और पटना में सम्राट चौधरी की ताजपोशी के बाद भाजपा और जेडीयू के बीच में सब कुछ सामान्य नजर नहीं आ रहा कैसे देख रहे हैं? 

चुनौती नीतीश कुमार है उसको ठीक से हैंडल रखना फिर कोई बयान नहीं दे दे उसके मन में यह है नीतीश कुमार के मेरा सात सूत्री फार्मूला था बिहार उसी हिसाब से चलता रहे और भाई मान जाओ ना राज बदल गया मुख्यमंत्री बदल गया पार्टी बदल गई सब हो गया लेकिन दिल है कि मानता नहीं है. तो सबसे बड़ा चैलेंज उनके सामने यही है कि नीतीश कुमार ठीक रहे बस उनका मतलब जरा सा हैंडलिंग जो है एक तरह से ठीक रहे कोई नया विवाद वहां पे नहीं आए और कुछ सहज तो इसलिए नहीं है ना आप देखिए विभागों को लेके कुछ और बातों को लेकर के अब हर बार क्या समारोह होता है आप देखते हैं जब कोई ऐसा आता है और बिहार में भाजपा का मुख्यमंत्री अमित शाह और नरेंद्र मोदी की मेहनत से आया वो उसमें उस दिन उनको वहां होना चाहिए था जैसे हमेशा जाते हैं लेकिन नहीं गए कोई समारोह नहीं हुआ वहां पे तो थोड़ा बहुत खिंचाव या कुछ इस तरह का है कि भाई एवरीथिंग इज नॉट वेल बस मैनेज की जा रही है स्थितियां जब बहुत ऐसी स्थिति आएगी फिर कोई फंक्शन होगा तो चले जाएंगे होता है ना शादी ब्याह हो जाती है कई बार बाद में कहते हैं ठीक है अभी शादी हो गई बाद में इनका एक रिसेप्शन रख देंगे तो फंक्शन नहीं हुआ वो जो है अब फिर कोई मौका आएगा जब सब चीजें नियंत्रण में होंगी. नीतीश कुमार टोटल कंट्रोल में आ चुके होंगे और कोई ऐसी बात नहीं कर रहे होंगे दाएं बाएं जो है ये व्हेन एवरीथिंग विल बी कूल तो किसी भाले से पटना फंक्शन हो जाएगा. चले जाएंगे प्रधानमंत्री अमित शाह, जेपी नड्डा सब नवीन पार्टी प्रेसिडेंट. 

सवाल- मैंने सुना है कि बिहार में नीतीश कुमार की पार्टी स्पीकर पद के लिए अड़ गई है. क्या ऐसा हो पाएगा? 

मतलब क्या है कि यूं क्या दूं? लेकिन इसका पॉलिटिकली जवाब तो ये है कि फुलिश ये तो पहले से तय था. प्रेम कुमार पहले से स्पीकर लगे वहां. अमित शाह के रहते हुए आप स्पीकर ले नहीं सकते. उनसे स्पीकर छीन नहीं सकते आप. स्पीकर का जितना महत्व वह जानते हैं कोई नहीं जानता तो कंप्लीटली रूल आउट है कोई कितना अड़ जाओ स्पीकर तो अमित शाह का ही रहेगा मतलब बीजेपी का ही रहेगा वहां पे और अभी अच्छा चल रहा है आई थिंक पता नहीं बात कहां से आई है ऐसी मतलब चली है चर्चा जेडीयू कह रहा है कि चलो यह पद दे दो वो दे दो कोई मतलब नहीं दैट इशू इस क्लोज्ड फॉर फाइव इयर्स ओनली नॉमिनी ऑफ़ बीजेपी नॉमिनी ऑफ़ अमित शाह ही विल कंटिन्यू एस अ स्पीकर ऑफ़ द असेंबली नीतीश कुमार का स्पीकर आए ऐसी कोई संभावना भी दिखाई नहीं देती है. एंड एवरीडे नीतीश कुमार कैंप उनका आभामंडल जो है धीरे-धीरे कम होता जाएगा. टाइम इज अ हीलर एंड बीजेपी विल एम और अभी तो बहुत कुछ होना है वहां पे. पुलिस के ट्रांसफर होने हैं. फिर वहां पे क्या है? बुलडोजर मॉडल चलना है. गुंडों को पकड़ना है. पता नहीं क्या-क्या होना है. बहुत सारी बातों पे आएगा इसको क्यों पकड़ रहे हो. हमारे लोग हैं, उनके लोग हैं. लेकिन बीजेपी को काम करना है. बीजेपी को धीरे-धीरे अगले एक साल में बिहार का पूरा कंट्रोल लेना है. 

सवाल- सम्राट मंत्रिमंडल में नीतीश के बेटे निशांत को मुख्यमंत्री पद की शपथ ना दिलवाए जाने के बाद अब उनका राजनीतिक करियर क्या है? और क्या वह मंत्रिमंडल में शामिल होंगे? 

नीतीश कुमार का मामला सुलटा था तो अब उनके बेटे का मामला आ गया. वही बहुत डिफिकल्ट और कंफ्यूज होता जा रहा है. पहले तो यह सवाल आया था कि राजनीति में इनको लाया जाए कि नहीं? फिर उसने कहा मैं इच्छुक नहीं हूं राजनीति में आने का. तो कैसे पकड़ के लाए और मनाया और जेडीयू की सदस्यता ग्रहण करवाई उनको जो है. फिर ये तय हो गया कि साहब डिप्टी सीएम बनेंगे पावर शेयरिंग फार्मूला में. फिर मना कर दिया. फिर मैंने सुना नीतीश कुमार ने खुद ने मना कर दिया कि एकदम से डिप्टी सीएम बनाना ठीक नहीं है. मंत्रिमंडल में ले लो लेकिन विभाग कोई बड़ा इनको मत देना. ऐसे रखो यह निशांत खुद कंफ्यूज हो गए होंगे कि क्या है यह तो उसने आगे बढ़ कह दिया कि मेरा इस तरह की राजनीति में रहने मेरा कोई इच्छा नहीं है मेरी तो बस वो चल रहा है स्टेलमेट है एक तरह से जो है भविष्य तो क्या है उनका भविष्य तो अब नीतीश कुमार या मतलब ये जो सिस्टम है दिल्ली उनका भविष्य समझ लो अमित शाह के नरेंद्र मोदी के हाथ में अमित शाह के हाथ में वो तय कर देंगे मंत्री बनना है क्या और सहमति ले लेंगे. उनकी तो मुझे लगता है अगले मंत्रिमंडल में वो मंत्री मंत्री बन जाएंगे शायद.

सवाल- पिछले 15 सालों से ईटीवी के समय से आप बिहार की राजनीति को जूझ रहे हैं. तो मैं यह समझना चाहती हूं कि बेसिक डिफरेंस क्या है? 

बेसिक फर्क ये है कि तेजस्वी यादव इज़ एन एक्टिव पॉलिटिशियन. बट ऑन द पॉलिटिकल फ्रंट निशांत इज़ अ रिलेक्टेंट ब्राइड. लाइक राहुल गांधी 15 साल पहले जब चलता था कि राजनीति में आएंगे नहीं आएंगे जाएंगे नहीं जाएंगे तो रिलेट एंड ब्राइड सेकंड क्या है कि वो क्लियर हेडेड है अब वो देखिए ना आपके 26 साल में वो बन गया था एमएलए फिर डिप्टी सीएम बन गया लीडर अपोजिशन बन गया एवरीथिंग ही डन तेजस्वी यादव इनका तो कुछ नहीं है अभी आप देखिए इंजीनियरिंग करने गए थे दोनों इंजीनियरिंग छोड़ के बीच में आ गए निशांत जो है वो भी इंजीनियरिंग छोड़ के आ गए पर दिशा ली ना उन्होंने आकर के दैट वे और इन्होंने इस तरह से नहीं लिया. यहां पे जो है सो डिफरेंस है. बहुत डिफरेंस है दोनों में. 

सवाल- क्या ये बात सच है कि अपने कार्यकाल के दौरान नीतीश कुमार ने परिवारवाद के आरोपों से बचने के लिए निशांत कुमार को ना तो राजनीति सिखाई ना कोई और काम ढूंढा. इस लिहाज से निशांत की यात्रा को आप अब कैसे देखते हैं? 

निशांत की यात्रा वही है. यह कई मुख्यंत्रियों के साथ प्रॉब्लम है. राजस्थान में अशोक गहलोत, वैभव गहलोत बिहार में नीतीश कुमार निशांत किसी और राज्य में प्रॉब्लम क्या है कि जो मूल्य बेस चीफ मिनिस्टर हैं मूल्यों की राजनीति करते हैं. जिनमें आप कर्पूर ठाकुर के कारण से या परिवारवाद से दूर रहते हैं. नीतीश कुमार को ले सकते हैं. अशोक गहलोत को ले सकते हैं. तो सवाल ये है कि ऐसे सारे मुख्यमंत्री उनके बेटे हैं. इनका हो क्या? ये बेचारे क्या करें? घर तो बैठे रह नहीं सकते. कुछ तो करना पड़ेगा. जैसे कुछ करने निकलते हैं तो आता है परिवारवाद है और फिर कुछ थोड़ा बहुत करते हैं फिर लोग कहते हैं साहब शासन में इनका हस्तक्षेप हो गया है तो पिता को बुरा लगता है बिजनेस करते हैं तो लोग कहते हैं साहब देखो पिता के प्रभाव का उपयोग कर रहे हैं तो बड़ी विचित्र विडंबना दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि अधिकांश मुख्यमंत्री जिन वो थोड़ा सा वैल्यू बेस्ड होने का उनका चरित्र है उनकी संतान का तो भविष्य ही नहीं है वहां राजनीति में किसी तरह का जो है ऐसे ही इनके 50 साल निकल गए बैठे रहे अब इनको समझ नहीं आ रहा क्या वहां पे आप देखिए उधर आप यशवंत सिन्हा उनके बेटे थे जय सिन्हा अमेरिका में थे नौकरी कर रहे थे आए यहां पे पिता श्री अलग किया. हालांकि उनके भी हमेशा ये छाया रही कि उनके बेटे हैं तो पूरी तरह सेटल नहीं हो पाए लेकिन फिर भी सेटल्ड हैं उधर देखिए आप वो शिबू सोन हेमंत सोरेन या और शीला दीक्षित उनके बेटे वो अपने एनजीओ चला रहे हैं तो ये तो वाकई बड़ी विचित्र स्थिति है कि जो मुख्यमंत्री हैं कहीं के भी उनके बेटे करें क्या कुछ भी करते हैं तो आरोप ये लगता सीधा सा कि परिवारवाद है, सत्ता का दुरुपयोग है, डिसीजन मेकिंग प्रोसेस में इनका रोल है. तो उसी का शिकार यह हैं. तो इनको भी समझना और वैसे भी ये क्या है कि नीतीश कुमार की तरह और जो मैंने कहा डिफरेंस क्या है उस दूसरे में लालू के पुत्र में इनमें जो है ये स्लो मोशन है थोड़ा वो फास्ट है दैट. तो स्लो मोशन प्लस इस तरह के जो बंधन है. हालांकि अब तो नीतीश कुमार दिल्ली आ गए हैं. ऐसी बात नहीं होनी चाहिए. बैठ के लेकिन अगर नीतीश कुमार दिल्ली बैठ के भी सोचे कि यार मेरी शर्ट पे थोड़ा सा भी दाग नहीं गिरना चाहिए मेरे बेटे के कारण से हैं तो बेचारा ऐसे ही रह जाएगा दैट मंत्री बन जाएगा करता रहेगा तो भविष्य यही है और डेस्टिनी होती है उन्हें सोचा था कि मैं मंत्री बनूंगा मंत्री बन जाएंगे काम करते रहेंगे उसी नीतीश कुमार कार्ड को प्ले करते करते पता लगा कोई ऐसी स्थिति है कोई डिप्टी सीएम बन जाएंगे और डेस्टिनी क्या पता पता लगा 10 साल बाद मुख्यमंत्री बनके बैठे हुए हैं लेकिन आज जो हमारे सामने प्रश्न है वह यह है कि जितने मुख्यमंत्री हैं उनके परिवार के सामने बड़ा गंभीर सवाल है. 

सवाल- सर बिहार में सम्राट मंत्रिमंडल में हम देख रहे हैं कि विजय कुमार चौधरी और विजेंद्र प्रसाद यादव को उप मुख्यमंत्री बनाया गया है. इनका बैकग्राउंड क्या रहा होगा? 

बैकग्राउंड तो देखो एक ही है कि फैसले तो नरेंद्र मोदी अमित शाह करते हैं. डिप्टी सीएम कौन बनेगा? लेकिन हां सवाल पूछा आपने तो कहने के लिए होता है कि दोनों अनुभवी व्यक्ति हैं. नीतीश कुमार के भी लॉयल रहे हैं. कंप्रोमाइजिंग कैंडिडेट हैं. ये पहले वाले जो हैं वो तो विधानसभा अध्यक्ष रहे हुए हैं और काफी अच्छा उनका है पकड़ है प्रशासन पे और भूमिहार हैं. दूसरे यादव हैं. उनको एनर्जी का एक्सपर्ट माना जाता है. उनका मंत्रिमंडल में रहे हैं. काफी अच्छा है. तो बेसिकली वहां जो कुछ हो रहा है बिहार में अभी तो नीतीश कुमार के छाया में ही हो रहा है. सम्राट चौधरी भी नीतीश कुमार की छाया है. यह दोनों नीतीश कुमार की छाया है और अच्छे लोग हैं. दैट वे और वैकेंसी थी क्योंकि निशांत को बनना नहीं था वहां पे. अब कभी कोई ऐसी सिचुएशन आएगी कि निशांत डिप्टी सीएम बनेगा तो एक का इस्तीफा हो जाएगा लेकिन लगता नहीं है मुझे क्योंकि निशांत और नीतीश कुमार कार्ड जो है अब धीरे-धीरे इनका शाइन कम होगा. बढ़ेगा नहीं. तो दोनों अच्छा उप मुख्यमंत्री दोनों कैंडिडेट ठीक है. 

सवाल- मैंने सुना है कि पिछले दिनों जो आरबीआई गवर्नर है संजय मल्होत्रा उन्होंने अपनी पटना यात्रा के दौरान मुलाकात की थी सम्राट चौधरी जी से तो इस मुलाकात के क्या मायने हैं? 

नहीं ये तो ऐसे ही हुई होगी. ऐसा मेरा आकलन है कि संजय मल्होत्रा वहां जा रहे होंगे पटना चीफ सेक्रेटरी और फाइनेंस सेक्रेटरी से बात करने सीएम से फिर बोरोइंग्स को लेके फाइनेंसियल इश्यूज को लेके दिल्ली वालों ने कहा होगा भाई देख लो जरा पटना में मदद करनी है जरा क्या सहायता हो सकती है तो गए होंगे और पता था दिल्ली वालों को सम्राट चौधरी की शपथ होनी है और एक हफ्ता पहले शायद ये गए थे तो कह दिया होगा कि कट से कॉल कर लीजिए जरा एक अपॉर्चुनिटी है. बात करने की तो गए होंगे मिले होंगे जाके कट सी कॉल हुआ होगा एक तरह से और सम्राट चौधरी को यकीन लगा होगा एक हफ्ता पहले ही कि हां मैं मुख्यमंत्री बन रहा हूं. संजय मल्होत्रा मेरे पास आए हैं. तो ठीक है मोराल बूस्टर विजिट और कटसी विजिट नथिंग मोर देन दैट. 

सवाल- असम चुनाव के संदर्भ में पिछले जेसी शो में आपने कहा था कि एक्स्ट्रा सेक्यूलर कार्ड की वजह से हेमंता विश्वा शर्मा को कुछ नुकसान हो सकता है. वोटिंग के बाद क्या आपका आकलन वही है? 

नहीं आकलन चेंज हुआ. वोटिंग के बाद मैंने देखा है कि ही इज़ विनिंग वि द मैसिव मेजॉरिटी. उनकी सरकार भी जीत रही है और खुद भी जीत रहे हैं. और एक्चुअली क्या है उन्होंने जो है ना योगी की तरह अपना एक ब्रांड बना लिया है. हम एक नैरेटिव बना लिया है. अपने हिंदुत्व का नैरेटिव बना लिया उन्होंने. वो सुपरहिट है. तो वो उन जो कांग्रेस शासन के उनका जो बैकग्राउंड था वो सारा धुल गया है टोटली. नाउ ही इज़ अ रिफाइंड 100% हिंदुत्व लीडर. अभी दो बयान उन्होंने वोट दे दिए हैं. उन्होंने कहा कि मेरी असम के अंदर कोई घुसपैठिया आ जाए इस तरह से निकल के बांग्लादेश कहीं से तो मैं उसको लात मार के निकाल दूंगा. अब आम जनता को बड़ी पसंद आती है ऐसी बातें हैं. दूसरा उन्होंने कहा कि त्रिपुरा बॉर्डर से अगर कोई आसाम त्रिपुरा बॉर्डर पे कोई इस तरह आ जाएगा तो मैं इसके रोकने के लिए करूंगा कि मैं जो बाउंड्री है तारे हैं वहां जो है उनमें करंट छोड़ दूंगा मैं ये. तो यह संभव नहीं है. लेकिन ठीक है. पब्लिक खुश होती है. इन बातों से एक माहौल बनता है. तो अब यह क्या कहा जा सकता है कि उसका हिंदू कार्ड से कोई नुकसान नहीं है. हिंदू कार्ड से उसका एंपावरमेंट हो गया है. और योगी की तरह एक एस्टैब्लिश लीडर जो है ना असम में हिंदुत्व के कार्ड पे स्ट्रांग चेहरा जो है वो एक उभर के सामने आया है.

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