यूरोप इन दिनों रिकॉर्ड तोड़ गर्मी का सामना कर रहा है. कई देशों में तापमान सामान्य से काफी ऊपर पहुंच चुका है, जिसका असर अब केवल लोगों की दिनचर्या तक सीमित नहीं रह गया है. भीषण हीटवेव का प्रभाव पर्यावरण पर भी साफ दिखाई देने लगा है. खासकर स्विट्जरलैंड के ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहे हैं, जिससे जलवायु परिवर्तन को लेकर वैज्ञानिकों की चिंता और बढ़ गई है.
हीटवेव ने बढ़ाई ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार
फ्रांस, स्विट्जरलैंड और यूरोप के कई अन्य हिस्सों में पड़ रही भीषण गर्मी के कारण ग्लेशियरों पर जमी बर्फ तेजी से पिघल रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो इस साल भी स्विट्जरलैंड में 'ग्लेशियर लॉस डे' सामान्य समय से पहले आ सकता है. इसका मतलब यह होगा कि सर्दियों में जमा हुई पूरी बर्फ समय से पहले समाप्त हो जाएगी.
क्या होता है 'ग्लेशियर लॉस डे'?
'ग्लेशियर लॉस डे' उस दिन को कहा जाता है जब पिछली सर्दियों में ग्लेशियरों पर जमा हुई सारी बर्फ पूरी तरह पिघल जाती है. इसके बाद अक्टूबर तक जितनी भी बर्फ पिघलती है, वह सीधे ग्लेशियर के मूल बर्फीले हिस्से को नुकसान पहुंचाती है. इसका परिणाम यह होता है कि ग्लेशियर लगातार छोटे होते जाते हैं और उनके अस्तित्व पर खतरा बढ़ने लगता है.
वैज्ञानिकों ने जताई गंभीर चिंता
स्विट्जरलैंड में ग्लेशियर मॉनिटरिंग संस्था GLAMOS के प्रमुख मैथियास हुस के अनुसार, पूरे आल्प्स क्षेत्र में बर्फ असामान्य गति से पिघल रही है. उनका कहना है कि मौजूदा स्थिति सामान्य मौसम चक्र की तुलना में करीब तीन महीने आगे चल रही है. यह संकेत देता है कि इस बार गर्मी का असर अपेक्षा से कहीं अधिक गंभीर है.
दूसरी बार समय से पहले आ सकता है यह दिन
साल 2000 से ग्लेशियर लॉस डे का रिकॉर्ड रखा जा रहा है. अब तक केवल वर्ष 2022 में यह दिन 26 जून को दर्ज किया गया था. विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस वर्ष भी यह स्थिति दोहराई जा सकती है. इसके पीछे यूरोप में लगातार जारी हीटवेव, मई महीने में सामान्य से अधिक तापमान और सर्दियों के दौरान कम बर्फबारी को प्रमुख कारण माना जा रहा है.
जलवायु परिवर्तन के बढ़ते संकेत
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ग्लेशियर इसी गति से पिघलते रहे तो इसका असर केवल पर्वतीय क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहेगा. भविष्य में जल संसाधनों, नदियों के प्रवाह, जैव विविधता और मौसम के पैटर्न पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है. यही वजह है कि वैज्ञानिक इसे जलवायु परिवर्तन के सबसे गंभीर संकेतों में से एक मान रहे हैं.
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