नई दिल्ली: पेगासस जासूसी विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया है. अदालत ने यह स्पष्ट किया कि देश की राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़ी जानकारियों को सार्वजनिक पटल पर लाना उचित नहीं होगा. न्यायमूर्ति सूर्यकांत और एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने मंगलवार को सुनवाई के दौरान यह फैसला सुनाया.
अदालत का संतुलित दृष्टिकोण
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार की रिपोर्ट को सार्वजनिक करना ‘सड़कों पर बहस’ के दायरे में नहीं आता. कोर्ट ने यह भी माना कि यदि किसी व्यक्ति की निजता को लेकर चिंता है तो उसे निजी स्तर पर समाधान दिया जा सकता है, लेकिन तकनीकी समिति द्वारा एकत्र की गई संप्रभु जानकारी को सार्वजनिक रूप से साझा करना संवेदनशील मसला है.
पीठ ने स्पष्ट किया कि आगामी सुनवाई 30 जुलाई को होगी और इस दौरान यह तय किया जाएगा कि रिपोर्ट के कौन-से हिस्से सीमित या आवश्यक दायरे में साझा किए जा सकते हैं.
विवाद की पृष्ठभूमि
पेगासस मुद्दा वर्ष 2021 में उस समय सुर्खियों में आया जब एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया कि भारत सरकार ने 2017 से 2019 के बीच करीब 300 भारतीय नागरिकों की जासूसी की थी. इनमें पत्रकार, वकील, सामाजिक कार्यकर्ता, विपक्षी नेता और उद्यमी शामिल थे. रिपोर्ट में यह भी आरोप लगाया गया था कि इज़राइली स्पाइवेयर पेगासस का इस्तेमाल इन लोगों के मोबाइल डिवाइस हैक करने में किया गया.
न्यायिक जांच और निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2021 में इस मामले की जांच के लिए पूर्व न्यायाधीश आर.वी. रवींद्रन की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया. यह समिति अगस्त 2022 में अपनी रिपोर्ट के साथ सामने आई, जिसमें कहा गया कि जांचे गए किसी भी डिवाइस में पेगासस स्पाइवेयर के मौजूद होने का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला.
हालांकि, इस रिपोर्ट की सार्वजनिक मांग अभी भी विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक वर्गों से उठ रही है, जो इस मसले में पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं.
पेगासस का अंतरराष्ट्रीय ट्रैक रिकॉर्ड
मैक्सिको में भी सरकार पर नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं की निगरानी के लिए इस स्पाइवेयर का दुरुपयोग करने का आरोप लगा था.
निष्कर्ष: निजता बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा
पेगासस मामले ने एक बार फिर यह अहम सवाल खड़ा कर दिया है — क्या निजता का अधिकार, जो कि संवैधानिक रूप से संरक्षित है, राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर सीमित किया जा सकता है?
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय इस बात की ओर संकेत करता है कि जब राष्ट्रीय संप्रभुता और सुरक्षा से जुड़े मुद्दे हों, तो संवेदनशील जानकारियों को सार्वजनिक पटल पर लाना उचित नहीं होता.
अदालत का संतुलित रुख इस बात को रेखांकित करता है कि पारदर्शिता और सुरक्षा के बीच एक न्यायसंगत संतुलन बनाए रखना आज की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के लिए एक प्रमुख चुनौती है.
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