SC ने पहले के फैसले को पलटा, 6:1 बहुमत से कहा- आरक्षण को लेकर SC-ST के भीतर और कटेगरी बनाई जा सकती है

भारत के सीजेआई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली 7 जजों की बेंच ने ईवी चिन्नैया मामले में पांच जजों की बेंच के पहले के फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें इसे स्वीकार्य नहीं किया गया था.

SC ने पहले के फैसले को पलटा, 6:1 बहुमत से कहा- आरक्षण को लेकर SC-ST के भीतर और कटेगरी बनाई जा सकती है
सुप्रीम कोर्ट की फाइल फोटो.

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को 6:1 के बहुमत से फैसला सुनाया कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण (सब-क्लासिफिकेशन) स्वीकार्य है.

भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली 7 जजों की बेंच ने ईवी चिन्नैया मामले में पांच जजों की बेंच के पहले के फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि उप-वर्गीकरण स्वीकार्य नहीं है क्योंकि एससी/एसटी समरूप कटेगरी बनाते हैं.

सीजेआई चंद्रचूड़ के अलावा, बेंच में जस्टिस बीआर गवई, विक्रम नाथ, बेला एम त्रिवेदी, पंकज मिथल, मनोज मिश्रा और सतीश चंद्र शर्मा शामिल थे.

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जस्टिस बेला एम त्रिवेदी ने कहा- वह इस फैसले से असहमत

जस्टिस बेला एम त्रिवेदी ने असहमति जताते हुए कहा कि वह बहुमत के फैसले से असहमत हैं. सात जजों की संविधान पीठ एससी और एसटी जैसे आरक्षित समुदायों के उप-वर्गीकरण से संबंधित मुद्दों पर विचार कर रही थी. सीजेआई चंद्रचूड़ ने चिन्नैया मामले में दिए गए फैसले को खारिज करते हुए कहा कि अनुसूचित जातियों के उप क्लासिफिकेशन बनाने की अनुमति नहीं है.

जस्टिस गवई ने कहा- इनमें भी क्रीमीलेयर बनाने की जरूरत

उन्होंने कहा कि निम्नतम स्तर पर भी वर्ग के साथ संघर्ष उनके प्रतिनिधित्व के साथ खत्म नहीं होता. न्यायमूर्ति बीआर गवई ने कहा कि एससी/एसटी के भीतर ऐसी श्रेणियां हैं, जिन्हें सदियों से उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है. उन्होंने कहा कि राज्य को एससी/एसटी श्रेणी में क्रीमीलेयर की पहचान करने के लिए नीति बनानी चाहिए.

न्यायमूर्ति त्रिवेदी ने असहमति वाले फैसले में कहा कि कार्यकारी और विधायी शक्ति के अभाव में राज्यों के पास जातियों को उप-वर्गीकृत करने और संपूर्ण अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित लाभों को उप-वर्गीकृत करने की शक्ति नहीं है.

न्यायमूर्ति त्रिवेदी ने असहमति वाले फैसले में कहा कि राज्यों द्वारा उप-वर्गीकरण अनुच्छेद 341(2) के तहत राष्ट्रपति की अधिसूचना के साथ छेड़छाड़ के समान होगा.

केंद्र सरकार ने कहा- वह सब-क्लासिफिकेशन के पक्ष में

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया था कि वह अनुसूचित जनजातियों और अनुसूचित जातियों के बीच उप-वर्गीकरण करने के पक्ष में है. सर्वोच्च न्यायालय पंजाब अधिनियम की धारा 4(5) की संवैधानिक वैधता से निपट रहा था, जो इस बात पर निर्भर करती है कि अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों के वर्ग के भीतर ऐसा कोई वर्गीकरण किया जा सकता है या नहीं या उन्हें एक समान वर्ग के रूप में माना जाना है या नहीं.

पंजाब सरकार ने निर्धारित किया था कि सीधी भर्ती में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित कोटे की 50 प्रतिशत रिक्तियां अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों में से पहली वरीयता प्रदान करके, उनकी उपलब्धता के अधीन, वाल्मीकि और मजहबी सिखों को दी जाएंगी.

2020 में शीर्ष अदालत में मामला बड़ी बेंच को गया था

29 मार्च, 2010 को पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने ई.वी. चिन्नैया के फैसले पर भरोसा करते हुए प्रावधानों को खारिज कर दिया. उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ शीर्ष अदालत में अपील दायर की गई थी. अगस्त 2020 में शीर्ष पांच न्यायाधीशों की पीठ ने मामले को एक बड़ी पीठ को भेज दिया.

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