LPG Crisis: मध्य पूर्व में जारी युद्ध और तनाव के कारण ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं. ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के आयात पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है. हालांकि देश में अभी पेट्रोल और डीजल की कमी नहीं दिख रही, लेकिन रसोई गैस यानी एलपीजी सिलिंडरों को लेकर लोगों में घबराहट देखी जा रही है.
पेट्रोल-डीजल की स्थिति क्यों स्थिर है?
भारत अपनी जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है. इसमें से करीब आधा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आता रहा है. युद्ध शुरू होने से पहले इस समुद्री मार्ग से रोजाना लगभग 25 से 27 लाख बैरल कच्चा तेल भारत पहुंचता था.
तनाव के बावजूद तीन वजहों से अभी तक बड़ा झटका नहीं लगा है. पहली वजह रूस से कच्चे तेल की खरीद है. पहले औसतन करीब 10 लाख बैरल प्रतिदिन रूसी तेल खरीदा जा रहा था. अमेरिका की ओर से 30 दिन की छूट मिलने के बाद यह मात्रा बढ़कर लगभग 16 लाख बैरल प्रतिदिन हो गई है. इससे कुछ राहत मिली है, भले ही यह खाड़ी देशों से आने वाले तेल की पूरी भरपाई नहीं कर पाता.
दूसरी वजह यह है कि भारत अब पहले से ज्यादा देशों से तेल खरीद रहा है. वर्ष 2006-07 में जहां 27 देशों से कच्चा तेल आता था, वहीं अब लगभग 40 देशों से आयात किया जा रहा है.
तीसरी वजह यह है कि पहले भी भारत के कुल आयात का लगभग 55 प्रतिशत हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य के अलावा दूसरे समुद्री मार्गों से आता था. अब यह हिस्सा बढ़कर करीब 70 प्रतिशत तक पहुंच गया है.
भारत कच्चे तेल को शुद्ध कर पेट्रोल और डीजल बनाने में दुनिया के प्रमुख देशों में शामिल है और तैयार पेट्रोलियम उत्पादों का बड़ा निर्यातक भी है. वर्ष 2025 में भारत ने करीब 11 लाख बैरल प्रतिदिन पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात किया था.
एलपीजी को लेकर ज्यादा चिंता क्यों?
दूसरी ओर रसोई गैस की स्थिति अलग है. भारत दुनिया में एलपीजी का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है. देश में हर महीने लगभग 30 लाख टन एलपीजी की खपत होती है.
इसमें से केवल 40 से 45 प्रतिशत गैस ही देश में तैयार होती है, जबकि 55 से 60 प्रतिशत एलपीजी विदेशों से आयात करनी पड़ती है. आयात होने वाली गैस का लगभग 85 से 90 प्रतिशत हिस्सा भी होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आता रहा है. इस मार्ग के प्रभावित होने से एलपीजी की आपूर्ति पर ज्यादा दबाव पड़ा है.
उत्पादन बढ़ाने के निर्देश
स्थिति को देखते हुए सरकार ने 9 मार्च को आवश्यक सेवाएं अनुरक्षण अधिनियम के तहत रिफाइनरियों को एलपीजी उत्पादन बढ़ाने के निर्देश दिए थे. सरकार का कहना है कि इसके बाद उत्पादन में लगभग 29 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है.
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इसके बावजूद देश में कुल मांग का लगभग आधा हिस्सा ही पूरा हो पाएगा. पश्चिम एशिया के अलावा अन्य क्षेत्रों से एलपीजी मंगाई जा सकती है, लेकिन इसमें अधिक समय लगता है.
रणनीतिक भंडार की कमी
एक और महत्वपूर्ण कारण यह है कि भारत में कच्चे तेल की तरह एलपीजी का बड़ा रणनीतिक भंडार नहीं है. देश में कच्चे तेल के लिए मैंगलोर, पादुर और विशाखापत्तनम में बड़े भंडारण केंद्र हैं, जिनमें मिलाकर लगभग 10 करोड़ बैरल का अतिरिक्त पेट्रोलियम भंडार रखा जा सकता है.
इसके विपरीत एलपीजी के लिए केवल मैंगलुरु और विशाखापत्तनम में दो भूमिगत भंडार मौजूद हैं. इनकी कुल क्षमता लगभग 1.4 लाख टन है, जो देश की खपत के मुकाबले बहुत कम है और मुश्किल से दो दिन की जरूरत ही पूरी कर सकती है.
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