मिडिल ईस्ट में बदलती कूटनीति: शांति से ज्यादा हावी हो रही डील और निवेश की राजनीति

US-Iran War: क्षेत्रीय संकट के बीच दो रियल एस्टेट डेवलपर प्रभावी रूप से व्यापारिक बातचीत कर रहे हैं, जबकि जरूरत शांति के लिए कूटनीति की है. यही धारणा अब मध्य पूर्व को लेकर तेजी से बन रही है.

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प्रतिकात्मक तस्वीर/ AI

लेखक- मोहम्मद आरिफ खान, मध्य पूर्व मामलों के विशेषज्ञ

US-Iran War: क्षेत्रीय संकट के बीच दो रियल एस्टेट डेवलपर प्रभावी रूप से व्यापारिक बातचीत कर रहे हैं, जबकि जरूरत शांति के लिए कूटनीति की है. यही धारणा अब मध्य पूर्व को लेकर तेजी से बन रही है. जो काम संतुलित तरीके से संघर्ष समाधान का होना चाहिए था, वह अब एक हाई-स्टेक डील जैसा दिख रहा है, जहां प्रभाव, पहुंच और मुनाफा सहमति और दीर्घकालिक स्थिरता पर भारी पड़ते नजर आ रहे हैं.

यह क्षेत्र अब केवल पारंपरिक कूटनीति से नहीं संभाला जा रहा है. इसे डील, पूंजी प्रवाह और प्रभावशाली गठजोड़ के जरिए फिर से गढ़ा जा रहा है. प्रभाव का लेन-देन हो रहा है, पहुंच को कमाई का जरिया बनाया जा रहा है, और स्थिरता अब निवेश के तर्क से जुड़ती जा रही है. इस बदलाव के केंद्र में डोनाल्ड ट्रंप, उनके दामाद जारेड कुशनर और रियल एस्टेट निवेशक स्टीव विटकॉफ जैसे लोग हैं, जो कूटनीति से ज्यादा व्यापारिक पृष्ठभूमि रखते हैं. आलोचकों के लिए यह एक बड़ा सवाल खड़ा करता है: क्या यह शांति की रणनीति है, या संघर्ष वाले क्षेत्र में डीलमेकिंग की प्राथमिकता?

कुशनर की यात्रा इस मॉडल को समझने में मदद करती है. राजनीति से पहले वह कुशनर कंपनियों में काम करते थे और बड़े रियल एस्टेट प्रोजेक्ट संभालते थे. व्हाइट हाउस में उन्होंने मध्य पूर्व नीति में अहम भूमिका निभाई और 2020 में अब्राहम समझौतों को कराने में मदद की. इन समझौतों के तहत इजरायल और यूएई व बहरीन जैसे अरब देशों के बीच संबंध सामान्य हुए. इसे बड़ी उपलब्धि माना गया, लेकिन इसके साथ एक बदलाव भी आया, जहां सामान्य संबंधों को फिलिस्तीन मुद्दे के समाधान से अलग कर दिया गया. कुशनर का तरीका सीधा नेतृत्व, आर्थिक फायदे और रणनीतिक तालमेल पर आधारित था, न कि पारंपरिक कूटनीतिक प्रक्रिया पर.

कुशनर की भूमिका में एक निजी पहलू भी था. एक ऑर्थोडॉक्स यहूदी होने के नाते और इजरायल से पारिवारिक व वैचारिक जुड़ाव के कारण, उनका नजरिया इजरायल के हितों के करीब माना गया. हालांकि यह अकेले नीति तय नहीं करता, लेकिन इससे उनके तरीके में एक अलग परत जुड़ गई, जहां निजी सोच, राजनीतिक पहुंच और डील करने की शैली साथ नजर आई.

पद छोड़ने के बाद कुशनर फिर बिजनेस में लौटे और एफिनिटी पार्टनर्स की शुरुआत की. जुलाई 2022 में इस फर्म को सऊदी अरब के पब्लिक इन्वेस्टमेंट फंड से 2 अरब डॉलर का निवेश मिला, जबकि अंदरूनी स्तर पर कुछ हिचकिचाहट की बात भी सामने आई थी. इसका महत्व सिर्फ आर्थिक नहीं था, बल्कि इसने यह धारणा मजबूत की कि राजनीतिक नजदीकी आर्थिक मौके में बदल सकती है.

स्टीव विटकॉफ भी इसी तरह की भूमिका में नजर आते हैं. वह लंबे समय से रियल एस्टेट डेवलपर हैं और ट्रंप के करीबी सहयोगी माने जाते हैं. उनका जुड़ाव फैसले लेने वाले लोगों से रहा है और क्षेत्रीय चर्चाओं में उनकी मौजूदगी यह दिखाती है कि अब व्यापारिक लोग भी भू-राजनीतिक मामलों में असर डाल रहे हैं. भले ही वह आधिकारिक राजनयिक नहीं हैं, लेकिन उनकी भूमिका डील आधारित प्रभाव को दर्शाती है.

अब्राहम समझौते इस बदलाव का अहम मोड़ थे. कई दशकों तक अरब-इजरायल संबंधों का सामान्य होना फिलिस्तीन राज्य के सवाल से जुड़ा रहा था. इन समझौतों ने उस कड़ी को तोड़ दिया और एक नया ढांचा सामने आया, बिना समाधान के संबंध सामान्य करना, राजनीतिक समझौते की जगह आर्थिक तालमेल, और जनता की सहमति की बजाय शीर्ष स्तर के समझौते. यूएई और बहरीन ने सबसे पहले कदम उठाया, क्योंकि वहां की व्यवस्था केंद्रीकृत है और अंदरूनी प्रतिक्रिया को नियंत्रित करना आसान है. वहीं सऊदी अरब और कतर जैसे देशों में धार्मिक और राजनीतिक स्थिति ज्यादा जटिल है, जिससे विरोध का खतरा बढ़ जाता है.

इसका नतीजा सिर्फ संबंधों का सामान्य होना नहीं था, बल्कि एक नया तरीका सामने आया. कूटनीति का फोकस विवाद सुलझाने से हटकर साझेदारी बनाने पर आ गया.
यह लेन-देन आधारित सोच एक सरल विचार पर टिकी है: हर चीज पर बातचीत हो सकती है. व्यक्तिगत संबंध संस्थाओं से ज्यादा अहम हो जाते हैं, आर्थिक फायदे विचारधारा से टक्कर लेते हैं, और तेजी कई बार प्रक्रिया पर भारी पड़ती है. समर्थक कहते हैं कि इससे जल्दी नतीजे मिलते हैं, जबकि आलोचक मानते हैं कि इससे पारदर्शिता कमजोर होती है और सार्वजनिक नीति व निजी हितों के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है.

इस बदलाव का आर्थिक पक्ष भी साफ दिख रहा है. 2023 से 2024 के बीच ट्रंप से जुड़े रियल एस्टेट प्रोजेक्ट खाड़ी देशों में तेजी से बढ़े, जिनमें सऊदी अरब में करीब 10 अरब डॉलर के प्रोजेक्ट शामिल हैं, साथ ही ओमान और कतर में भी निवेश हुआ है. ये सिर्फ अलग-अलग प्रोजेक्ट नहीं हैं, बल्कि यह दिखाते हैं कि जहां रणनीतिक फैसले हो रहे हैं, वहीं व्यापारिक हित भी मजबूत हो रहे हैं.

यह बदलाव भाषा में भी दिखता है. गाजा युद्ध के बाद की चर्चाओं में पुनर्निर्माण को निवेश के मौके के रूप में देखा जा रहा है, यहां तक कि इसे “रियल एस्टेट का बड़ा मौका” भी कहा गया. इसका मतलब है कि संकट को अवसर के रूप में देखा जा रहा है, जमीन को संपत्ति माना जा रहा है और पुनर्निर्माण को निवेश रणनीति के रूप में पेश किया जा रहा है. ऐसे में शांति पीछे छूट सकती है.

इन सभी बातों को मिलाकर एक साफ तस्वीर बनती है. अब्राहम समझौतों ने राजनीतिक आधार दिया. 2 अरब डॉलर के निवेश ने आर्थिक जुड़ाव दिखाया. रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स के विस्तार ने व्यापारिक भागीदारी को मजबूत किया. और कुशनर व विटकॉफ जैसे लोगों की भूमिका यह संकेत देती है कि अब भू-राजनीति में व्यापारिक सोच का असर बढ़ रहा है.

यह तरीका तेज नतीजे देता है और दिखने में असरदार लगता है, लेकिन यह कमजोर भी हो सकता है. जब जनता की भागीदारी कम हो, पुराने विवाद अधूरे रह जाएं और स्थिरता आर्थिक हितों पर टिकी हो, तो यह ढांचा जल्दी टूट भी सकता है. अब्राहम समझौतों ने दिखाया कि डील से बड़े बदलाव आ सकते हैं, लेकिन साथ ही यह भी बताया कि जो चीज फायदे पर टिकी हो, वह फायदे बदलने पर टूट भी सकती है.

डीलमेकिंग आकर्षक लगती है, क्योंकि यह जटिल चीजों को आसान बनाती है और फैसले जल्दी कराती है. लेकिन भू-राजनीति रियल एस्टेट नहीं है. देश कोई संपत्ति नहीं होते, लोग सिर्फ हिस्सेदार नहीं होते और शांति को सिर्फ पैसों के हिसाब से नहीं समझा जा सकता.

अब सवाल यह नहीं है कि यह तरीका काम करता है या नहीं, अभी के लिए यह काम कर रहा है. असली सवाल यह है कि क्या इस तरह की शांति लंबे समय तक टिक सकती है, जब डील बदल जाएं. क्योंकि अंत में, जो समझौते हितों पर आधारित होते हैं, चाहे आर्थिक हों या रणनीतिक, वे उतने ही मजबूत होते हैं, जितने मजबूत उन्हें बनाए रखने वाले कारण होते हैं.

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