बीजिंगः दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अब सादगी की राह पर चलने को मजबूर हो गई है. आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे चीन में अब सरकार ने अपने अधिकारियों को फिजूलखर्ची छोड़कर सादगी अपनाने का निर्देश दिया है. राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में मितव्ययिता का यह अभियान अचानक नहीं आया—बल्कि यह चीन की कमजोर होती अर्थव्यवस्था और बढ़ते वित्तीय दबावों का सीधा नतीजा है.
चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ की रिपोर्ट के अनुसार, देश में अब ‘अपव्यय’ को शर्म की बात माना जा रहा है और ‘सादगी’ को प्रशंसनीय बताया जा रहा है. यह संदेश सीधे सरकारी अधिकारियों को दिया गया है, जिनसे उम्मीद की जा रही है कि वे अब खाने-पीने, यात्रा और कार्यालयीय भव्यता पर होने वाले खर्चों में भारी कटौती करें.
आर्थिक संकट के बीच दिखी नीति में सख्ती
बीजिंग ने यह सख्त रुख ऐसे समय में अपनाया है जब स्थानीय सरकारों पर कर्ज का बोझ तेजी से बढ़ रहा है और रियल एस्टेट सेक्टर से होने वाली आमदनी में भारी गिरावट दर्ज की गई है. भूमि बिक्री—जो चीन के स्थानीय बजट का प्रमुख स्रोत रही है—अब ठप पड़ चुकी है. ऐसे में सरकार को वित्तीय अनुशासन की ओर रुख करना पड़ा है.
नई गाइडलाइंस के तहत अधिकारियों को न सिर्फ गैर-जरूरी यात्रा, होटल में ठहराव और महंगे खानपान से दूर रहने को कहा गया है, बल्कि दफ्तरों की सजावट, महंगे रिसेप्शन, शराब-सिगरेट की खरीद और फूलों पर खर्च भी हतोत्साहित किया गया है. यह अभियान 2023 में शुरू हुए बजट कटौती कार्यक्रम का ही विस्तार है, जिसे अब और अधिक सख्ती से लागू किया जा रहा है.
शेयर बाजार पर दिखा असर
इस फैसले का असर चीन के शेयर बाजार पर भी साफ नजर आया. खासकर उन कंपनियों को बड़ा झटका लगा जो आम तौर पर सरकारी आयोजनों और उपहारों का हिस्सा बनती थीं. चीन के प्रीमियम शराब ब्रांड क्वेचो माओताई और लूझो लाओजियाओ के शेयरों में तेज गिरावट दर्ज की गई. माओताई के शेयर सोमवार को 2.2% तक गिर गए—जो पिछले डेढ़ महीने की सबसे बड़ी गिरावट रही.
पृष्ठभूमि में चल रहे आर्थिक दबाव
चीन भले ही एक समय दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था रहा हो, लेकिन हाल के वर्षों में उस पर संकट के बादल मंडराते रहे हैं. अमेरिका के साथ जारी व्यापार युद्ध, घरेलू संपत्ति बाजार की गिरावट और कोविड-19 के बाद का आर्थिक ढांचा अभी भी अस्थिरता से गुजर रहा है.
हाल ही में स्विट्जरलैंड में हुए व्यापारिक समझौते से भले ही अमेरिका द्वारा लगाए गए कुछ शुल्कों में राहत मिली हो—जहां टैरिफ 145% से घटकर 30% पर आ गया—लेकिन चीन अब भी कई स्तरों पर दबाव में है. ऐसे में सरकार मितव्ययिता को एक स्थायी नीति के रूप में आगे बढ़ाने पर तुली हुई है.
ये भी पढ़ेंः पलायन नहीं तो तबाही! हर दिन हो रही 200 लोगों की मौत, यूरोप से लेकर अमेरिका तक हड़कंप