नई दिल्ली: पूर्व सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने पाकिस्तान को लेकर भारत को सतर्क रहने की सलाह दी है. उन्होंने कहा कि हाल के कुछ घटनाक्रम और रिपोर्ट से पाकिस्तान में जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास पैदा हो सकता है. ऐसे में वह फिर कोई गलत कदम उठा सकता है. इसलिए भारत को पाकिस्तान के मामले में पूरी सावधानी बरतनी होगी.
भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत स्मृति व्याख्यान में बोलते हुए जनरल चौहान ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर, सिंधु जल संधि को रोककर रखना और कुछ अन्य व्यावहारिक कदम इस उम्मीद को बढ़ाते हैं कि पाकिस्तान के व्यवहार में बदलाव आ सकता है. हालांकि, इसके बावजूद भारत को सतर्क रहना जरूरी है.
आतंकवाद और प्रॉक्सी वॉर अब भी बड़ी चुनौती
जनरल चौहान ने कहा कि पाकिस्तान की रणनीति में आतंकवाद और प्रॉक्सी का इस्तेमाल लंबे समय से अहम रहा है. किसी आतंकी संगठन को कमजोर करने के बाद भी उसका पूरा नेटवर्क दोबारा खड़ा हो सकता है. इसमें उसकी विचारधारा, आतंकियों की भर्ती, पैसे की व्यवस्था, प्रचार और राज्य का समर्थन शामिल है.
#WATCH | Delhi | Former CDS Anil Chauhan says, "Our relationship with China cannot be held hostage to only boundary issues... It is important China and India cooperate in some forms, compete for influence in markets and hold differing views on aspects of regional and global… pic.twitter.com/2IiWJkQuZx
— ANI (@ANI) September 5, 2026
उन्होंने कहा कि भारत को यह मानकर चलना चाहिए कि आतंकवाद और प्रॉक्सी वॉर की चुनौती आगे भी बनी रहेगी. इससे निपटने के लिए भारत के पास मजबूत और भरोसेमंद सैन्य क्षमता के साथ जरूरत पड़ने पर कार्रवाई करने की क्षमता भी होनी चाहिए.
भारत की प्रतिरोधक क्षमता मजबूत रखना जरूरी
पूर्व सीडीएस ने कहा कि बालाकोट और ऑपरेशन सिंदूर जैसी सीमा पार की कार्रवाइयों में भारत ने अपनी सैन्य क्षमता का प्रदर्शन किया है. ऐसे में देश की प्रतिरोधक क्षमता हर स्तर पर मजबूत और प्रभावी रहनी चाहिए.
उन्होंने कहा कि भारत को पाकिस्तान के लिए आतंकवाद और प्रॉक्सी वॉर की कीमत इतनी ज्यादा करनी होगी कि वह इसे सरकारी नीति के एक साधन के रूप में इस्तेमाल करने से पीछे हटे.
चीन के साथ रिश्तों पर भी बोले जनरल चौहान
भारत-चीन संबंधों पर जनरल चौहान ने कहा कि उत्तरी सीमा की चुनौतियां पाकिस्तान से अलग हैं और लंबे समय तक बनी रह सकती हैं. वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी को लेकर दोनों देशों की अलग-अलग समझ, सीमा के आसपास तेजी से बढ़ता बुनियादी ढांचा और सैन्य तैनाती तनाव बढ़ने की वजह बन सकते हैं.
उन्होंने कहा कि सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए लगातार सतर्कता, भरोसेमंद सैन्य क्षमता और दोनों देशों के बीच हुए समझौतों का पालन जरूरी है.
भारत-चीन संबंध सिर्फ सीमा विवाद तक सीमित नहीं
पूर्व सीडीएस ने कहा कि भारत और चीन के रिश्तों को केवल सीमा विवाद के नजरिए से नहीं देखा जा सकता. दोनों एशिया की बड़ी शक्तियां, बड़ी अर्थव्यवस्थाएं और प्राचीन सभ्यताएं हैं. कई क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच सहयोग है, लेकिन प्रभाव और बाजार को लेकर प्रतिस्पर्धा भी होती है.
उन्होंने कहा कि दोनों देशों की कुछ आंतरिक और स्थानीय शासन से जुड़ी सोच भी अलग है. ऐसे में चीन के साथ बातचीत और संपर्क बनाए रखना जरूरी है. भारत शंघाई सहयोग संगठन और ब्रिक्स जैसे मंचों के जरिए ऐसा कर भी रहा है.
जनरल चौहान ने कहा कि एशिया का भविष्य काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत और चीन अपने साझा हितों के साथ-साथ मतभेदों को किस तरह संभालते हैं.
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